भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 590 में से

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आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १६३


विशेषदर्शनाभावकूटात् संशयसम्भवात् ।
आवृतस्याऽप्रकाशाच्च पर्यायेणाऽऽवृतिं परे ॥ ७८ ॥

विशेषदर्शनके अभावसमुदायसे संशयका सम्भव है और आवृतका अप्रकाश होनेसे क्रमशः अज्ञान विषयको आवृत करते हैं, अर्थात् एक ज्ञानसे एक अज्ञानकी निवृत्ति होगी अनन्तर उसका उपशम होनेपर अन्य अज्ञान आवरण करेगा, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं ॥ ७८ ॥

अन्ये तु—आवृतस्याऽऽपरोक्ष्यं विरुद्धम् । एकज्ञानोदये च प्राग्भावान्तरसत्त्वेऽपि यावद्विशेषदर्शनाभावकूटरूपमावरणं विशेषदर्शनान्नास्तीति मन्यमाना वदन्ति—यदा यदज्ञानमावृणोति, तदा तेन ज्ञानेन तस्यैव नाशः । सर्वं च सर्वदा नाऽऽवृणोति, वैयर्थ्यात् । किन्त्वावरकाज्ञाने वृत्त्या नाशिते तद्वृत्त्युपशमे अज्ञानान्तरमावृणोति ।

पर्वतीय वह्नि आदि जो आवृत हैं, उनका आपरोक्ष्य नहीं माना जाता है, किन्तु सिद्धान्तमें उनका परोक्ष ज्ञान ही माना गया है । एक ज्ञानके उदित होनेपर अन्य प्राग्भावोंकी सत्तामें भी * सम्पूर्ण विशेषदर्शनका अभाव-समुदायरूप जो आवरण है, वह विशेषके दर्शनसे है ही नहीं, ऐसा मानते हुए कुछ लोग कहते हैं कि जिस कालमें जो अज्ञान जिस वस्तुका आवरण करता है, उस कालमें उस वस्तुके ज्ञानसे उसी अज्ञानका नाश होता है। सब अज्ञान सर्वदा आवृत्त नहीं करते, क्योंकि ऐसा मानना व्यर्थ है, परन्तु अन्य वृत्तिसे आवरण करनेवाले अज्ञानका नाश होनेपर, उस वृत्तिका जब उपशम होता है, तब अन्य अज्ञान उसको आवृत्त करता है ।


* भाव यह है कि स्थाणु आदिमें अर्थात् स्थाणु आदिविषयक—संशयात्मक ज्ञानको उत्पन्न करनेमें—संशय आदिके प्रति विरोधिभूत विशेष दर्शनका प्राग्भावमात्र समर्थ नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर 'अयं स्थाणुः' ( यह स्थाणु है ) इस प्रकारके निश्चयकालमें भी समानविषयक अन्य निश्चयका प्राग्भाव होनेसे पुरुषत्वकी स्मृतिवाले पुरुषको फिर संशयकी आपत्ति होगी, इसलिए नैयायिक यह मानते हैं कि संशय आदिके समानविषयक जितने निश्चयात्मक ज्ञान हैं, उन सबके प्राग्भावोंका समुदाय संशय आदिकी उत्पत्तिमें समर्थ है और वही आवरण है । एकके निश्चयकालमें आवरणरूपसे सम्मत सम्पूर्ण विशेष दर्शन प्राग्भावकूटरूप विशेषदर्शनका अभाव होनेसे पुनः संशयकी आपत्ति नहीं हो सकती है और प्राथमिक घटज्ञानकालमें न्यायमतमें विषयप्रकाशकी अनुपपत्ति भी नहीं हो सकती है, क्योंकि प्राग्भावकूटरूप आवरण नहीं है । इसलिए 'संशयादिजनक-