भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 191, कुल 590 में से

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आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १६१

ज्ञानमवस्थारूपं सादीत्यन्ये । नन्वनादित्वपक्षे घटे प्रथममुत्पन्नेनैव ज्ञानेन सर्वतदज्ञाननाशो भवेत्, विनिगमनाविरहात्; तदवच्छिन्नचैतन्यावरकसर्वाज्ञानानाशे विषयप्रकाशा-योगाच्च। अतः पाश्चात्त्यज्ञानानामावरणानभिभावकत्वं तदवस्थमेवेति चेत्,


है, इसीके समान अन्य घटादिविषयावच्छिन्न चैतन्यका आवरण करनेवाला अज्ञान भी सादि † है।

[ यदि अवस्थारूप अज्ञान सादि माने जायँ, तो प्रथम उत्पन्न घटज्ञानसे पूर्वकालिक घटका आवरण करके स्थित अज्ञानका नाश होनेपर भी पुनः उत्पन्न अवस्थारूप अज्ञानसे उसका आवरण होगा, इससे सादिपक्षमें तो व्यवस्था हो सकती है, परन्तु अनादित्वपक्षमें व्यवस्था नहीं हो सकती, यह शङ्का करते हैं—] अज्ञानके अनादित्वपक्षमें प्रथम उत्पन्न घटविषयक ज्ञानसे ही सम्पूर्ण घटविषयक अज्ञानका नाश होगा, क्योंकि 'प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे एक ही अज्ञान नष्ट होता है, अन्य अज्ञान नष्ट नहीं होते, इसमें कोई विनिगमक (युक्तिविशेष) नहीं है और घटावच्छिन्न चैतन्यका आवरण करनेवाले सम्पूर्ण अज्ञानका विनाश न माना जाय, अर्थात् प्रथम उत्पन्न घटज्ञानसे एक आवरण अज्ञानका नाश माना जाय, तो [ एक आवरणके विनष्ट होनेपर भी अन्य आवरणोंके रहनेसे ] विषय-प्रकाशकी अनुपपत्ति होगी, [ अर्थात् एक आवरणका नाश होनेपर भी अन्य आवरणोंसे घट आदिके आवृत होनेसे घटादिका कदापि प्रकाश होगा ही नहीं, अतः सम्पूर्ण आवरणोंका एक ज्ञानसे नाश मानना होगा, यह भाव है,]। इससे—प्रथम उत्पन्न ज्ञानसे सम्पूर्ण अज्ञानका नाश माननेसे—उत्तरकालीन ज्ञान आवरणके अभिभावक नहीं होंगे, यह दोष तदवस्थ ही है, अर्थात् प्रथम उत्पन्न घटज्ञानसे ही घटके सब आवरणोंका विनाश हुआ, तो उत्तरज्ञान—द्वितीय कालमें उत्पन्न हुआ घटज्ञान—किस आवरणका विनाश


† विमतानि अवस्थाऽज्ञानानि सादिमन्ति, अवस्थाज्ञानत्वात्, निद्रावत्, सुप्तिवच्च; अर्थात् अवस्थारूप अज्ञान सादि है, क्योंकि अवस्थारूप अज्ञानत्व धर्म उनमें है, निद्रा और सुप्ति रूप अवस्थाऽज्ञानके समान, इस अनुमानसे उन अवस्थारूप अज्ञानोंमें सादित्वकी सिद्धि की जाती है, पूर्वोक्त अनादित्वसाधक अनुमानसे विरोध नहीं है, क्योंकि वह अनुमान मूलाज्ञानमें ही अनादित्वका साधक है, अवस्थारूप अज्ञानमें नहीं। मूलाज्ञानमें अनादित्वका सिद्धान्तमें अभ्युपगम है, अतः सिद्धान्तसे विरोध नहीं है।
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