सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 179, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृत्तिके साथविषयका सम्बन्ध-विचार] भाषानुवादसहित १४९ .
वच्छेदकलाभात् तदवच्छेदेन तदुपादानस्य जीवस्याऽपि संयोगजसंयोगः सम्भवति । कारणाकारणसंयोगात् कार्याकार्यसंयोगवत् कार्याकार्यसंयोगात् कारणाकारणसंयोगस्याऽपि युक्तितौल्येनाऽभ्युपगन्तुं युक्तत्वादित्याहुः ।
द्वितीयपक्षे जीवस्याऽसर्वगतत्वादसङ्करात् ।
विषयब्रह्मचैतन्याभेदाभिव्यक्त्यैव तं परे ॥ ६८ ॥
'अभेदाभिव्यक्त्यर्था वृत्तिः' इस द्वितीय पक्षमें जीवके अव्यापक होनेके कारण उसके साथ साङ्कर्य न होनेसे विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यके साथ अभेदाभिव्यक्तिकं द्वारा विषयके साथ तादात्म्य-सम्पादन ही वृत्तिका प्रयोजन है, ऐसा कोई लोग कहते हैं ॥ ६८ ॥
कर, कहींपर साक्षात्सम्बन्ध कहींपर परम्परासम्बन्ध माना जाय, तो कार्य-कारणभावोंमें भेद होनेसे गौरव ही होगा, इसलिए एक ही साक्षात्सम्बन्ध साक्षात्कारमें प्रयोजक है, परम्परासंसर्ग (विषयसंयुक्तवृत्तितादात्म्य) प्रयोजक नहीं है ] । इससे वृत्तिका विषयके साथ संयोग होनेके बाद वृत्तिरूप विशेषणका लाभ होनेसे वृत्त्यवच्छेदेन वृत्तिके उपादानभूत जीवका भी संयोगजन्य संयोग साक्षात् संसर्ग होता है [ तात्पर्य यह है कि वृत्ति जीवचैतन्यका कार्य है और विषय अकार्य है, जीवचैतन्य वृत्तिका उपादान कारण है और विषय वृत्तिका उपादान कारण नहीं है, इसलिए जीवचैतन्यके क्रमशः कार्य और अकार्यरूप जीवचैतन्य और विषयके संयोगसे वृत्तिके प्रति क्रमशः कारण और अकारणरूप जीवचैतन्य और विषयका संयोग होता है, यही संयोगज संयोगरूप साक्षात्सम्बन्ध अपरोक्षविषयक साक्षात्कारमें प्रयोजक है ] जैसे कारण और अकारणके संयोगसे कार्य और अकार्यका संयोग होता है, वैसे ही कार्य और अकार्यके संयोगसे कारण और अकारणका संयोग होता है, ऐसा तुल्य युक्तिसे माननेमें कोई दोष नहीं है * ।
* तात्पर्य यह है कि कारण और अकारणके संयोगसे कार्य और अकार्यका संयोग, तो नैयायिक लोगोंने माना है, जैसे—हस्त और वृक्षके संयोगसे काय और वृक्षका संयोग होता है, इसमें कायरूप ( शरीररूप ) कार्यके प्रति कारण है—हस्त और अकारण है—वृक्ष, इसी प्रकार हस्तका कार्य है—काय, और उसका अकार्य है—वृक्ष, शरीरके प्रति कारणीभूत हस्त और उसके प्रति अकारणीभूत वृक्षके संयोगसे हस्तके कार्य शरीरका और उसके (हस्तके) अकार्य वृक्षका संयोग होता है । परन्तु कार्य और अकार्यके संयोगसे कारण और अकारणका संयोग नहीं माना है, इसीपर मूलमें कहा गया कि उक्त रीति के समान होनेसे कार्याकार्यके संयोगसे कारण और अकारणका संयोग भी हो सकता है, क्योंकि ऐसा माननेमें कोई हरकत नहीं है ।