भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 178

१४८. सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद


वृत्तेर्विषयसंयोगे तस्याऽपि तद्द्वारकः परम्परासम्बन्धो लभ्यते इति स एव चिदुपरागोऽभिसंहित इत्याहुः।

तरङ्गतत्संस्पर्शान्निदीस्पर्शं तराविव।
विषये वृत्तिसंसर्गाज्जीवसङ्गं परे विदुः ॥६७॥

जैसे तरङ्ग और तरुके स्पर्शसे वृक्षमें नदीका स्पर्श होता है, वैसे ही विषयमें वृत्तिके सम्बन्धसे जीवका सम्बन्ध होता है, ऐसा भी कोई कहते हैं ॥६७॥

अपरे तु—साक्षादपरोक्षचैतन्यसंसर्गिण एव सुखादेरापरोक्ष्यदर्शनात् अपरोक्षविषये साक्षात्संसर्ग एष्टव्यः। तस्माद् वृत्तेर्विषयसंयोगे वृत्तिरूपा-


बिना ही विषयविषयिभाव सम्बन्ध है—ऐसा माना गया है। परोक्षस्थलमें जैसे वृत्तिका बाहर निर्गमन न मान करके जीवचैतन्यका विषयके साथ सम्बन्ध माना जाता है, वैसे ही अपरोक्षस्थलमें भी वृत्तिके निर्गमनके विना जीवचैतन्यका विषयके साथ विषयविषयिभाव सम्बन्ध मान करके 'जीवकी वृत्ति जिस अर्थको विषय करेगी उसी अर्थका जीव प्रकाश करेगा अन्यका नहीं' इस नियमसे एक विषयके प्रकाशनकालमें अन्य विषयका प्रकाश प्रसक्त नहीं होगा, अतः अपरोक्षस्थलके लिए भी वृत्तिनिर्गमन व्यर्थसा है, इस प्रकार विचार करते हुए विवरणाचार्य, जो वृत्तिका निर्गम मानते हैं, विषय-विषयिभाव सम्बन्धको वृत्ति-जन्य नहीं मानते हैं, ] किन्तु विषयसन्निहितजीवचैतन्यके साथ तादात्म्यापन्न वृत्तिका विषयके साथ संयोग होनेपर विषयसन्निहितजीवचैतन्यका भी वृत्ति और विषयके संयोग द्वारा जो विषयसंयुक्तवृत्तितादात्म्यरूप परम्परासम्बन्ध प्राप्त होता है, वही चिदुपरागशब्दसे कहा गया है, ऐसा मानते हैं * ।

कोई लोग कहते हैं कि जीवचैतन्यके साथ साक्षात् सम्बद्ध ही सुख आदिका आपरोक्ष्य (प्रत्यक्ष) देखा जाता है, इससे अपरोक्ष विषयमें जीव-चैतन्यका (सर्वत्र) साक्षात्सम्बन्ध ही वाञ्छनीय है, परम्परासम्बन्ध नहीं। [ तात्पर्य यह है कि सुख आदि आभ्यन्तर पदार्थोंके साक्षात्कारमें जीवचैतन्यका उनके साथ साक्षात्सम्बन्ध ही देखा जाता है, इसलिए घट आदि अपरोक्ष विषयोंके साक्षात्कारमें भी साक्षात् सम्बन्धको ही प्रयोजक मानना चाहिए, यदि ऐसा न मान


* विषयको व्याप्त करनेवाली वृत्तिका अधिष्ठान है—विषयसमीपवर्ती जीवचैतन्य, इसलिए वृत्तिका तादात्म्य जीवचैतन्यमें है।