भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 176
१४६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

व्यक्तस्तमेव विषयं प्रकाशयति । एवं च चिदुपरागार्थत्वेन, विषयचैतन्याभेदाभिव्यक्त्यर्थत्वेन, आवरणाभिभवार्थत्वेन वा वृत्तिनिर्गममपेक्ष्य तत्संसृष्टविषयमात्रावभासकत्वात् जीवस्य किञ्चिज्ज्ञत्वमप्युपपद्यते इति ॥ १० ॥

वृत्तेश्चिदुपरागो वा अभेदव्यक्तिरेव वा ।
फलमावृतिभङ्गो वा तत्राऽऽद्यं कीदृशं भवेत् ॥ ६५ ॥

वृत्तिका प्रयोजन—चित्के साथ सम्बन्ध, अभेदाभिव्यक्ति अथवा आवरणका भङ्ग—है, उनमें से चित्के साथ सम्बन्ध कैसा होता है ? ॥६५॥

अत्र प्रथमपक्षे सर्वगतस्य जीवस्य वृत्त्यधीनः को विषयोपरागः ? वृत्त्याऽपि हि पूर्वसिद्धयोर्निष्क्रिययोर्विषयजीवचैतन्ययोस्तादात्म्यस्य संयोगस्य वा न सम्भवत्याधानम् ।

नैयायिकादिवत् केचिद्विषयत्वं स्वभावतः ।

कोई लोग कहते हैं कि जैसे नैयायिक लोग विषय-विषयिभाव सम्बन्ध स्वभावसे मानते हैं, वैसे ही वृत्तिसे विषयविषयिभाव सम्बन्ध उत्पन्न होता है ।


अप्रकाशमान है, इससे विषयोंका अवभास न करता हुआ किसी एक विषयमें वृत्तिके सम्बन्धसे आवरणका विनाश होनेके अनन्तर उसी विषयमें अभिव्यक्त होकर उसी विषयको प्रकाशित करता है। वृत्तिके बिना जीवचैतन्य विषयका अवभासक नहीं होता है, ऐसा सिद्ध होनेपर चित्के साथ सम्बन्धके लिए, विषय-चैतन्य और जीवचैतन्यके अभेदके लिए और आवरणके विनाशके लिए वृत्तिनिर्गमकी अपेक्षा करके वृत्तिके साथ सम्बद्धमात्र विषयका जीव प्रकाश करता है, इसलिए जीवमें अल्पज्ञत्वकी भी उपपत्ति होती है ॥१०॥

इन पूर्वोक्त तीन पक्षोंमें से प्रथम पक्षमें अर्थात् 'चिदुपरागार्था वृत्ति:'( चैतन्य-के साथ सम्बन्धके लिए वृत्ति है ) इस पक्षमें सर्वतः व्यापक जीवका वृत्तिजन्य कौनसा सम्बन्ध है ? अर्थात् कोई भी सम्बन्ध नहीं है, कारण कि क्रियारहित विषयचैतन्य और जीवचैतन्यका वृत्तिसे भी तादात्म्य या संयोग नहीं हो सकता है [ भाव यह है कि जिनका तादात्म्य व्यवहारमें देखा जाता है, वह पहलेसे ही रहता है, बीचमें कहींसे नहीं आता है, अतः विषय या जीवचैतन्यका तादात्म्य सम्बन्ध प्रथमसे ही रहेगा, आगन्तुक नहीं होगा अर्थात् वृत्तिसे उत्पादित नहीं होगा और संयोग सम्बन्ध एककी क्रियासे या उभयकी क्रियासे उत्पन्न होता है;

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