भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ११३


बिम्बं प्रति मेघाकाशादेरिवान्तःकरणाद्युपाधिप्रतिबिम्बं प्रति तदनन्तर्गतस्यैव बिम्बत्वं स्यादिति बिम्बभूतस्य विकारान्तरवस्थानायोगात् ईश्वरे अन्तर्यामिब्राह्मणाञ्जसस्याऽभावस्तुल्यः ।

एतेनाऽवच्छिन्नस्य जीवत्वे कर्तृभोक्तृसमययोस्तत्र तत्राऽन्तःकरणावच्छेद्यचैतन्यप्रदेशस्य भिन्नत्वात् कृतहानाकृताभ्यागमप्रसङ्ग इति निरस्तम् ।

प्रतिबिम्बपक्षेऽपि स्वानन्तर्गतस्य स्वसंनिहितस्य चैतन्यप्रदेशस्याऽन्तःकरणे प्रतिबिम्बस्य वक्तव्यतया तत्र तत्राऽन्तःकरणगमने बिम्बभेदात् तत्प्रतिबिम्बस्याऽपि भेदावश्यम्भावेन दोषतौल्यात् । न च 'अन्तःकरणप्रतिबिम्बो जीवः' इति पक्षे दोषतौल्येऽपि 'अविद्याप्रतिबिम्बो जीवः' । तस्य च तत्र तत्र गत्वरमन्तःकरणं जलाशयव्यापिनो महामेघमण्डलप्रतिबिम्बस्य


का ही उस उपाधिमें प्रतिबिम्ब होता है । इससे जलप्रतिबिम्बके प्रति जैसे मेघाकाश आदिमें बिम्बत्व है, वैसे ही अन्तःकरण आदि उपाधियोंमें रहनेवाले प्रतिबिम्बके प्रति अन्तःकरण आदिमें अनन्तर्भूत चैतन्यमें * बिम्बत्व होगा, इसलिए बिम्बभूत चैतन्यके विकारके अन्दर अवस्थानका अयोग होनेसे प्रतिबिम्बपक्षमें भी 'यो विज्ञाने तिष्ठन्' इत्यादि अन्तर्यामिब्राह्मणकी असमञ्जसता तुल्य ही है * ।

इससे अवच्छिन्न चैतन्यके जीवत्वपक्षमें कर्म करने और उसके फल भोगनेके समयमें पृथ्वी और स्वर्ग आदिमें अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य प्रदेशके भिन्न होनेपर भी कृतहान या अकृताभ्यागम रूप दोषका प्रसङ्ग—निरस्त हुआ ।

क्योंकि प्रतिबिम्बपक्षमें भी उपाधिमें अनन्तर्गत और उपाधिके सन्निहित चैतन्य प्रदेशका ही अन्तःकरणमें प्रतिबिम्ब होता है, ऐसा कहना होगा, इसलिए उस-उस स्थलमें अन्तःकरणके गमनमें बिम्बके भेदसे उसके प्रतिबिम्बका भेद भी अवश्यम्भावी है, अतः पूर्वोक्त कृतहान और अकृतका अभ्यागमरूप दोष समान ही है । शङ्का होती है कि अन्तःकरणमें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है, इस पक्षमें दोषकी समानता रहनेपर भी (हम) अविद्यामें चित्के प्रतिबिम्ब को जीव मानते हैं । जैसे तत्तत् जलाशयोंमें व्यास महा मेघमण्डलके प्रतिबिम्बकी


* अर्थात् लोकमें यही अनुभव होता है कि उपाधिकुक्षिमें अप्रविष्टका ही प्रतिबिम्ब देखा जाता है, उपाधिकुक्षिमें प्रविष्टका प्रतिबिम्ब नहीं देखा जाता, यह भाव है ।

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