भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 590 में से

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विशेषोंकी सम्पत्ति कुछ व्यावहारिक अड़चनोंको हटा सकती है, तथापि उससे पारमार्थिक चिरस्थायिनी शान्ति नहीं मिलती है, अतः जगत्के साधारण जनोंके उपकारको मनमें रखकर तत्-तत् दर्शनकारोंने सूत्ररूपसे अधिकारि-विशेषोंके लिए तत्-तत् प्रकारोंका अनेक युक्ति-प्रयुक्तियोंसे दिग्दर्शन इसलिए कराया है कि उतने दरजेके अधिकारी पुरुषोंको कुछ-न-कुछ शान्ति अवश्य मिल जाय, और उन्हींके मूलभूत सिद्धान्त या सूत्रोंके आधारपर आगेके व्याख्यानकारोंने भी विशद व्याख्या की है ।

अब इस विषयमें समझनेकी आवश्यकता है कि किसी खास वस्तुको प्राप्त करनेके लिए उसके भिन्न-भिन्न मार्ग हो सकते हैं, परन्तु उस वस्तुके स्वरूपमें सैद्धान्तिक भेद नहीं हो सकता । जैसे कि कोई लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिए अनेक मार्गोंका अनुसरण कर सकता है, परन्तु उससे प्राप्तव्य लक्ष्मीरूप अर्थके स्वरूपमें भिन्नता नहीं हो सकती है । वैसे ही तृप्त्यर्थ भोजनके मार्ग भले ही अनेक प्रकारके हों, परन्तु उससे साध्य तृप्तिके स्वरूपमें भेद नहीं हो सकता । बस, इसी दृष्टान्तको लेकर ठीक-ठीक यदि विचार किया जाय, तो भले ही मानसिक निरवधिक शान्ति या मोक्षके लिए अनेक मार्ग मिल जायँ, परन्तु लक्ष्यके स्वरूपमें उनका भेद नहीं हो सकता । यदि उसीके स्वरूपमें भेद हो गया, तो उसे मोक्ष या मानसिक शान्ति कैसे कह सकते हैं ?

पूर्वोद्धृत दर्शनोंके विषयमें यही गड़बड़ी भरी पाई जाती है, अर्थात् उनमेंसे किसीने मोक्षका एक-सा रूप नहीं बतलाया है, प्रत्युत अपने-अपने वैयक्तिक भावसे प्रेरित होकर मोक्षके भिन्न-भिन्न स्वरूप निर्धारण किये हैं । जो आस्तिक-दर्शनविभागमें मत उपन्यस्त किये गये हैं, उनमें श्रुतिवाक्योंकी खींचातानी ही की गई है । और नास्तिक-दर्शनोंका तो कोई मूलभूत आधार ही नहीं है, अतः उनमें तो दर्शनत्व भी सन्दिग्ध है ।

यद्यपि कुछ महापुरुष उक्त सभी दर्शनोंका एक-सा समन्वय करनेके लिए भी प्रवृत्त होते हैं, परन्तु उनका वह समन्वय केवल उसी प्रकारका होता है— जैसा कि कोई घट और पटको द्रव्यत्वरूपसे एक स्वरूप बना कर जलाहरणक्रिया पटसे करनेकी ईच्छा करता हो । और उस प्रकारका समन्वय दर्शनकारोंने अपनी किसी भी पंक्तिमें नहीं बतलाया है ।

और दूसरी बात यह भी है कि वेदान्तदर्शनको छोड़कर न्याय आदि