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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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यही कारण है कि उक्त चार प्रकारके बौद्धोंको उपदेश देनेवाले मूलभूत बुद्धके एक होनेपर भी तत्-तत् स्वोपदिष्टव्य शिष्योंकी मतिके वैचित्र्यसे चार प्रकारके बौद्ध कहलाते हैं ।

जैनमत

इस मतको आर्हत मत भी कहते हैं, क्योंकि इसके प्रवर्तक 'अर्हत्' नामके आदि पुरुष थे । ये आत्माको स्थायी मानते हैं । इस मतमें पहले जीव और अजीव भेदसे दो तत्त्व माने गये हैं ।

फिर इसीका विस्तार जीव, आकाश, धर्म, अधर्म और पुद्गलास्तिकायसे भी किया गया है । अस्तिकायशब्द पदार्थवाची है । ये संसारी और मुक्तभेदसे दो प्रकारके जीव मानते हैं । अजीव पदार्थका ही आकाश, धर्म, अधर्म और पुद्गल विस्तार है ।

और जैनोंने प्रकारान्तरसे जीव, अजीव, आस्रव, संवर, निर्जर, बन्ध और मोक्ष, इस प्रकार सात पदार्थ माने हैं । परोक्ष और अपरोक्ष दो प्रकारके इनके मतमें प्रमाण हैं । इनके मतमें श्वेताम्बर और दिगम्बर आदि अनेक अवान्तर भेद हैं । स्याद्वाद सभी जैनोंको सम्मत होनेपर भी क्रियांशमें इन मतोंकी भिन्नता है । सम्पूर्ण कर्मबन्धनोंसे छूट जानेके बाद असङ्गरूपसे जीवकी अवस्थिति ही इनका मोक्षपदार्थ है । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र मोक्षप्राप्तिके मार्ग माने गये हैं ।

पूर्वोक्त प्रकारसे आस्तिक और नास्तिक दर्शनोंका अत्यन्त सूक्ष्म रीतिसे विभाग किया गया है । परन्तु उनका अधिक विस्तार तत्-तत् ग्रन्थोंमें अधिक विस्तृतरूपसे मिलता है । प्रकृतमें सूक्ष्मरीत्या इसलिए बतलाए गये हैं कि उनके अभिमत पदार्थोंका आकलन सूत्ररूपसे तत्-तत् दर्शनशास्त्रोदितपदार्थजिज्ञासुओंको हो सके ।

दर्शनशास्त्रोंकी रचनामें आचार्योंकी प्रवृत्तिका कारण

प्रत्येक दर्शनकारोंकी दर्शनरचनामें प्रवृत्ति इसलिए हुई कि अनेक प्रकारके दुःखोंसे परिपीडित सांसारिक जीवोंकी दुःखोंसे मुक्ति हो और उन्हें सुख प्राप्त हो । तब तक मनुष्योंको चिरस्थायिनी शान्ति प्राप्त नहीं होती है, जब तक कि उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त नहीं होता । यद्यपि व्यावहारिक साधन-