भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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यही कारण है कि उक्त चार प्रकारके बौद्धोंको उपदेश देनेवाले मूलभूत बुद्धके एक होनेपर भी तत्-तत् स्वोपदिष्टव्य शिष्योंकी मतिके वैचित्र्यसे चार प्रकारके बौद्ध कहलाते हैं ।

जैनमत

इस मतको आर्हत मत भी कहते हैं, क्योंकि इसके प्रवर्तक 'अर्हत्' नामके आदि पुरुष थे । ये आत्माको स्थायी मानते हैं । इस मतमें पहले जीव और अजीव भेदसे दो तत्त्व माने गये हैं ।

फिर इसीका विस्तार जीव, आकाश, धर्म, अधर्म और पुद्गलास्तिकायसे भी किया गया है । अस्तिकायशब्द पदार्थवाची है । ये संसारी और मुक्तभेदसे दो प्रकारके जीव मानते हैं । अजीव पदार्थका ही आकाश, धर्म, अधर्म और पुद्गल विस्तार है ।

और जैनोंने प्रकारान्तरसे जीव, अजीव, आस्रव, संवर, निर्जर, बन्ध और मोक्ष, इस प्रकार सात पदार्थ माने हैं । परोक्ष और अपरोक्ष दो प्रकारके इनके मतमें प्रमाण हैं । इनके मतमें श्वेताम्बर और दिगम्बर आदि अनेक अवान्तर भेद हैं । स्याद्वाद सभी जैनोंको सम्मत होनेपर भी क्रियांशमें इन मतोंकी भिन्नता है । सम्पूर्ण कर्मबन्धनोंसे छूट जानेके बाद असङ्गरूपसे जीवकी अवस्थिति ही इनका मोक्षपदार्थ है । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र मोक्षप्राप्तिके मार्ग माने गये हैं ।

पूर्वोक्त प्रकारसे आस्तिक और नास्तिक दर्शनोंका अत्यन्त सूक्ष्म रीतिसे विभाग किया गया है । परन्तु उनका अधिक विस्तार तत्-तत् ग्रन्थोंमें अधिक विस्तृतरूपसे मिलता है । प्रकृतमें सूक्ष्मरीत्या इसलिए बतलाए गये हैं कि उनके अभिमत पदार्थोंका आकलन सूत्ररूपसे तत्-तत् दर्शनशास्त्रोदितपदार्थजिज्ञासुओंको हो सके ।

दर्शनशास्त्रोंकी रचनामें आचार्योंकी प्रवृत्तिका कारण

प्रत्येक दर्शनकारोंकी दर्शनरचनामें प्रवृत्ति इसलिए हुई कि अनेक प्रकारके दुःखोंसे परिपीडित सांसारिक जीवोंकी दुःखोंसे मुक्ति हो और उन्हें सुख प्राप्त हो । तब तक मनुष्योंको चिरस्थायिनी शान्ति प्राप्त नहीं होती है, जब तक कि उन्हें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त नहीं होता । यद्यपि व्यावहारिक साधन-

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विशेषोंकी सम्पत्ति कुछ व्यावहारिक अड़चनोंको हटा सकती है, तथापि उससे पारमार्थिक चिरस्थायिनी शान्ति नहीं मिलती है, अतः जगत्के साधारण जनोंके उपकारको मनमें रखकर तत्-तत् दर्शनकारोंने सूत्ररूपसे अधिकारि-विशेषोंके लिए तत्-तत् प्रकारोंका अनेक युक्ति-प्रयुक्तियोंसे दिग्दर्शन इसलिए कराया है कि उतने दरजेके अधिकारी पुरुषोंको कुछ-न-कुछ शान्ति अवश्य मिल जाय, और उन्हींके मूलभूत सिद्धान्त या सूत्रोंके आधारपर आगेके व्याख्यानकारोंने भी विशद व्याख्या की है ।

अब इस विषयमें समझनेकी आवश्यकता है कि किसी खास वस्तुको प्राप्त करनेके लिए उसके भिन्न-भिन्न मार्ग हो सकते हैं, परन्तु उस वस्तुके स्वरूपमें सैद्धान्तिक भेद नहीं हो सकता । जैसे कि कोई लक्ष्मीकी प्राप्तिके लिए अनेक मार्गोंका अनुसरण कर सकता है, परन्तु उससे प्राप्तव्य लक्ष्मीरूप अर्थके स्वरूपमें भिन्नता नहीं हो सकती है । वैसे ही तृप्त्यर्थ भोजनके मार्ग भले ही अनेक प्रकारके हों, परन्तु उससे साध्य तृप्तिके स्वरूपमें भेद नहीं हो सकता । बस, इसी दृष्टान्तको लेकर ठीक-ठीक यदि विचार किया जाय, तो भले ही मानसिक निरवधिक शान्ति या मोक्षके लिए अनेक मार्ग मिल जायँ, परन्तु लक्ष्यके स्वरूपमें उनका भेद नहीं हो सकता । यदि उसीके स्वरूपमें भेद हो गया, तो उसे मोक्ष या मानसिक शान्ति कैसे कह सकते हैं ?

पूर्वोद्धृत दर्शनोंके विषयमें यही गड़बड़ी भरी पाई जाती है, अर्थात् उनमेंसे किसीने मोक्षका एक-सा रूप नहीं बतलाया है, प्रत्युत अपने-अपने वैयक्तिक भावसे प्रेरित होकर मोक्षके भिन्न-भिन्न स्वरूप निर्धारण किये हैं । जो आस्तिक-दर्शनविभागमें मत उपन्यस्त किये गये हैं, उनमें श्रुतिवाक्योंकी खींचातानी ही की गई है । और नास्तिक-दर्शनोंका तो कोई मूलभूत आधार ही नहीं है, अतः उनमें तो दर्शनत्व भी सन्दिग्ध है ।

यद्यपि कुछ महापुरुष उक्त सभी दर्शनोंका एक-सा समन्वय करनेके लिए भी प्रवृत्त होते हैं, परन्तु उनका वह समन्वय केवल उसी प्रकारका होता है— जैसा कि कोई घट और पटको द्रव्यत्वरूपसे एक स्वरूप बना कर जलाहरणक्रिया पटसे करनेकी ईच्छा करता हो । और उस प्रकारका समन्वय दर्शनकारोंने अपनी किसी भी पंक्तिमें नहीं बतलाया है ।

और दूसरी बात यह भी है कि वेदान्तदर्शनको छोड़कर न्याय आदि

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आस्तिक-दर्शनशास्त्र आत्मतत्त्वविज्ञानाख्य मोक्षके प्रतिपादनके लिए मुख्यरूपसे प्रवृत्त नहीं हुए हैं, परन्तु अन्यान्य द्रव्यादि पदार्थोंका निरूपण करनेके लिए प्रवृत्त हुए हैं। जैसे न्यायमें द्रव्यादि पदार्थोंका निरूपण, सांख्यमें प्रकृति, पुरुष और योगका निरूपण, पूर्वमीमांसामें धर्माधर्मका निरूपण किया गया है। उनमें आत्माका निरूपण खासरूपसे नहीं किया गया है, अतः उनसे साक्षात् आध्यात्मिक उन्नतिकी मनुष्यको आशा नहीं करनी चाहिए। हां, इतना अवश्य हो सकता है कि उनके अध्ययनसे व्युत्पत्ति हो जानेके कारण बुद्धिदोषकी निवृत्ति होनेसे वेदान्तके अध्ययनमें सरलता होती है। इसीलिए उनमें परम्परया—मोक्ष-शास्त्रव्युत्पादन द्वारा—मोक्षोपयुक्तज्ञानसाधनता आ सकती है, अतः हम उनके ऋणी हो सकते हैं।

आचार्यपाद श्रीशङ्करका श्रुतिसम्मत अद्वैततत्त्व

अब आइए वेदान्तदर्शनमें, वेदान्तमें भी आत्मस्वरूपके प्रतिपादनावसरमें श्रीशङ्कराचार्यके सिवा अन्यान्य आचार्योने श्रुतिके वास्तविक तात्पर्यको विरुद्धरूपसे ही बतलाया है, अतः उनके व्याख्यानसे आत्मतत्त्वप्रतिपत्तिकी आशा व्यर्थ है। जब हम भगवान् आचार्यपाद श्रीशङ्करके विस्तृत भाष्योंको देखते हैं, तभी हमें एक आशाका स्थान और सन्तोष प्राप्त होता है।

यह सर्वसाधारणको विदित है कि जो कोई पुरुष कपट आदि दोषोंसे रहित होता है, उसके कहे हुए वाक्यमें भी एकार्थता ही रहती है, भिन्नार्थता नहीं। यदि उस वाक्यको, जो उस निर्दुष्ट पुरुषने जिस अर्थके परिज्ञानके लिए प्रयुक्त किया है, बुद्धिकौशल्यसे अन्यार्थपरक मान लें, तो उस वक्ताके साथ अन्याय अवश्य होगा। इसी प्रकार वेदवाक्योंका, जो कि अपौरुषेय होनेके कारण सर्वथा दोषरहित हैं, मूल तात्पर्य छोड़ कर यदि अन्य स्वाभिमत ही अर्थ करें, तो अवश्य हम दोषी ठहरेंगे। भगवान् शङ्कराचार्यने उन श्रुतियोंका ऐसा ही व्याख्यान किया है, जो उनका वस्तुतः प्रतिपाद्य था। शङ्कराचार्य साक्षात् भगवान् ही थे, जिनमें छद्म या व्यर्थाभिमानका लेश भी नहीं था, अतः निर्दुष्ट अपौरुषेय वाक्योंका भगवान् ही ठीक-ठीक व्याख्यान कर सकते हैं।

.अपि च, श्रुतिके प्रत्येक वाक्योंके तात्पर्यका निर्णय करनेके लिए उपक्रमोपसंहार आदि छः प्रमाणोंकी अपेक्षा अवश्य होती है। उपक्रमोपसंहारादिषड्विध श्रुतितात्पर्यनिर्णायक प्रमाणोंकी उपेक्षा करके केवल यदि मनगढन्त अर्थ किया

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जाय, तो उन वाक्योंका वास्तविक अर्थ हाथमें नहीं आ सकता है । अतः इन प्रमाणोंके आधारपर ही श्रुतियोंका अर्थ निश्चय करना चाहिए । किसी प्रकार भी श्रुतिवाक्यार्थनिर्णयावसरमें इन प्रमाणोंकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि श्रुतिवाक्योंका यह स्वभाव है कि उनके स्वार्थनिर्णयमें उपक्रमोपसंहारादिकी अपेक्षा होती है । अतः श्रुत्यर्थनिर्णायकत्वरूपसे स्वभावतः प्राप्त उन प्रमाणोंकी यदि कोई उपेक्षा करे, तो इससे यही कहा जा सकता है कि वह वह्निके उष्णत्वस्वभावका भी अपलाप करता है ।

जब इस स्वभावस्थितिका अवलम्बन करके श्रुतियोंके अर्थका निर्णय किया जाता है, तब श्रुतियों द्वारा भगवान् शङ्कराचार्यपादने जिस निर्गुण सच्चिदानन्दस्वरूप अद्वैत अर्थका प्रतिपादन किया है, वही अद्वैत अर्थ श्रुतिवाक्योंसे अपने-आप प्राप्त हो जाता है, इतर नहीं, क्योंकि श्रुतिने बार-बार उक्त अद्वैतवस्तुका ही प्रतिपादन किया है, कारण कि निम्नलिखित—

द्वितीयाद्वै भयं भवति ।इदं सर्वं यदयमात्मा ।
एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म ।एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते अथ तस्य भयं भवति ।
नेह नानास्ति किञ्चन ।सलिल एको द्रष्टाद्वैतः ।
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ।अथात आदेशो नेति नेति ।
ऐतत्तादात्म्यमिदं सर्वम् ।एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ।
सर्वं खलु इदं ब्रह्म ।नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा ।
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् ।यत्र द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति, यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् ।
योऽन्यां देवतामुपास्ते न स वेद ।
अहं ब्रह्मास्मि ।
तत्त्वमसि ।

इत्यादि अनेक श्रुतियाँ अद्वैत—समस्त द्वैतप्रपञ्चसे शून्य—स्वतःप्रकाश आनन्दस्वरूप ब्रह्मका ही प्रतिपादन करती हैं और भ्रमसे प्रतीयमान द्वैत-वस्तुका निषेध करती हैं । इसी श्रुतिसम्मत अद्वैततत्त्वका भगवान् वादरायणने अपने ब्रह्मसूत्रोंसे भी प्रतिपादन किया है। और उसीको भगवत्पाद शङ्कराचार्यने लोक-कल्याणार्थ विशद किया है । अन्य मतावलम्बियोंने जो खींचा-तानी की है, उसका तो उक्त श्रुतियोंसे ही निराकरण हो जाता है, अतः उनके विषयमें

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अधिक कुछ लिखनेकी आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है। यही अद्वैतब्रह्म माया-शबलित होकर समस्त प्रपञ्चके प्रति अभिन्न निमित्तोपादान होता है।

श्रुतिसम्मत मायाका स्वरूप

कुछ लोग मायावादका, जिसका कि आचार्यपादने वर्णन किया है, खण्डन करनेके लिए प्रस्तुत होते हैं। परन्तु उनका वह कथन केवल अज्ञान-मूलक ही है। पहले जिस मायावादका वे खण्डन करनेके लिए प्रस्तुत होते हैं, उनको यदि धर्मिकुक्षिप्रविष्ट मायाका परिज्ञान है, तो वे किसका खण्डन करेंगे। यदि नहीं है, तो खण्डनमें खण्डनीय वस्तुके परिज्ञानकी, जो कि सर्वतन्त्र-सिद्धान्तसम्मत है, आवश्यकता होनेके कारण उसके अस्तित्वाभावमें उनका खण्डन केवल उपहासास्पद ही होगा।

अपि च भगवान् आचार्यपादने किस रूपमें मायाका अङ्गीकार किया है, उसे भी पहले समझना चाहिए, और उसे टटोलना चाहिए कि वह वेदसम्मत है ? या नहीं। अनन्तर उसकी परीक्षा की जाय तो परीक्षा ठीक होती है, परन्तु ऐसा नहीं किया जाता। ऋग्वेदादिमें मायाशब्दका आचार्यसम्मत अर्थमें प्रचुररूपसे प्रयोग किया गया है। जैसे कि —

मायाविनं वृत्रमस्फुरन्निः
मायिनो दानवस्य माया अपादयत् [ म० २ सू० ११ म० ९-१० ]

श्रुतस्य महीं मायाम्
कवितमस्य मायाम् [ म० ५ सू० ९६ ५-६ ]

निर्माया उत्ये असुरा अभूवन् त्वञ्च मा वरण कामयासे ।
ऋतेन राजन्ननृतं विविञ्चन्मम राष्ट्रस्याधिपत्यमेहि [म० १० सू० १२४ मन्त्र ५]

मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः [ म० १ सू० १२ ]

मायिनाममिनाः प्रोत मायाः [ म० १ सू० ३२ ]

इस प्रकारके मायाशब्दघटित अनेक वाक्य ऋग्वेदादिमें उपलब्ध होते हैं। उनका उपक्रमोपसंहार आदिके आधारपर निर्णय करनेसे वही मायाशब्दार्थ लब्ध होता है जो कि पूज्यपाद श्रीशङ्कराचार्यजीने माना है। आचार्यपादने बार-बार कहा है कि सत्यस्वरूप तत्त्वज्ञानसे असत्यस्वरूप मायाकी निवृत्ति होती है—यही बात ऋग्वेदके 'ऋतेन राजन्' (सत्यसे अनृतकी अर्थात् मायाकी निवृत्ति होती है) इत्यादि मन्त्रसे स्पष्ट भासती है; एवं—

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इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते । मायांन्तु प्रकृतिं विद्यात् मायिनन्तु महेश्वरम् । मायामेतां तरन्ति । अनृतेन ही प्रत्यूढाः ।

इत्यादि अन्यान्य श्रुतिवाक्य भी उक्तार्थमें ही प्रमाण हैं । और मायाको अनिर्वचनीय मानना भी श्रुतिने ही बतलाया है—'न सत् तन्नासदुच्यते' अर्थात् माया सत्त्व और असत्त्वसे रहित है—अनिर्वचनीय है ।

पूर्वापरभावका विचार न करके जो लोग अपनी निरालम्ब बुद्धिके आधारपर विचार करते हैं, उनसे वेदके यथार्थ अर्थकी आशा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसे पुरुषोंसे हमेशा श्रुति डरा करती है, इस अर्थका पोषक—

‘बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरेदिति । इतिहास-पुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ॥’

इस प्रकार प्रसिद्ध वचन भी मिलता है ।

और मायाशब्दका लोकप्रसिद्ध अर्थ किया जाय, तो भी वही अर्थ होता है, जो कि आचार्यचरणने माना है, क्योंकि कोषकारोंने मायाशब्दके छद्म, कापट्य, इन्द्रजाल और मिथ्याबुद्धिहेतु अज्ञान अर्थ माने हैं । यदि माया-शब्द उक्त अर्थवाला नहीं होता, तो इस अनादिप्रवाहकी गति कैसे होती ?

और सूत्रकार बादरायणको भी यही बात सम्मत है, क्योंकि यह बात वेदान्तजगत्में प्रसिद्ध है कि एकके विज्ञानसे सभी वस्तुका विज्ञान हो जाता है । इसी विचारको लेकर सूत्रकारने 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्' 'तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः' प्रतिज्ञाहानिर्व्यतिरेकाच्छब्देभ्यः' इत्यादि सूत्रोंसे प्रतिज्ञा और दृष्टान्तके अनुसार ब्रह्मको जगत्की प्रकृति माना है और कार्यकी ब्रह्मसत्तासे पृथक् सत्ताका खण्डन किया है । एवमेव आकाशादिकी ब्रह्ममें अध्यस्तता मानी है । इसीसे यह परिस्फुट है कि प्रतिज्ञावाक्य औरोंसे प्रधान है, उस प्रतिज्ञावाक्यकी तभी उपपत्ति हो सकती है जब कि विवर्तवादका आश्रयण किया जाय, अन्यथा नहीं हो सकती, कारण कि एकके विज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञा करके दृष्टान्त दिया गया है कि 'यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव

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सत्यम्' इस श्रुतिकी आचार्यपादकी प्रणालीके सिवा अन्य प्रणालीसे उपपत्ति नहीं हो सकती है। इस श्रुतिमें एकविज्ञानसे सर्वविज्ञान जो प्रतिज्ञात है, वह तत्-तत् व्यक्तित्त्वरूपसे विवक्षित नहीं है, किन्तु मुमुक्षुके लिए जो अभीष्ट ज्ञान है, उसका प्रतिपादन करती है। वह है—मोक्षसाधनीभूत अद्वितीय ब्रह्मज्ञान । श्रुति जिसका प्रतिपादन करना चाहती है, उसमें शिष्यको शङ्का हो कि द्वैत प्रपञ्च तो विद्यमान है, फिर कैसे अद्वितीयत्त्वका ज्ञान हो सकता है ? तो इस शङ्काका परिहार करनेके लिए 'यथा सोम्यैकेन' इत्यादि श्रुतिकी प्रवृत्ति हुई है। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे शुक्तिमें आरोपित रजतादिका और रज्जुमें आरोपित सर्पादिका स्वरूप शुक्ति आदि ही हैं, क्योंकि आरोपितकी अधिष्ठानसे अतिरिक्त सत्ता नहीं हो सकती । अतः शुक्ति आदिके तत्त्व-ज्ञानसे उनमें आरोपित सकल पदार्थोंका सत्त्व विदित हो जाता है, आरोपित रजतादिका तत्त्व शुक्ति आदि है और यथार्थ ज्ञान भी वही हो सकता है, जो तत्त्वावगाही हो । जो तत्त्वावगाही ज्ञान नहीं होता, वह मिथ्याज्ञान है । अतः शुक्तिमें रजतका ज्ञान मिथ्याज्ञान है, इसलिए उक्त श्रुतिमें एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानका जो कथन है, वह भी अधिष्ठानभूत सत्य वस्तुके विज्ञानसे आरोपित पदार्थोंका स्वरूपविज्ञान विवक्षित है याने ब्रह्मभूत अधिष्ठानकी सत्तासे पृथक् द्वैतपदार्थोंकी वास्तविक सत्ता नहीं है, अतः वे मिथ्याभूत ही हैं। इस प्रकारका ज्ञान विवक्षित है, । 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' इत्यादि छान्दोग्योपनिषद्का उपक्रम भी उक्त ज्ञानकी सम्पत्तिके लिए ही है, यह समझना चाहिए। विस्तारभयसे प्रकृतमें विचार नहीं करते । यदि इतरमतोंका अवलम्बन किया जाय, तो श्रुतिका प्रतिज्ञा-दृष्टान्तवाक्य कभी नहीं युक्तियुक्त होगा। इसलिए जिनकी आशङ्का है कि निर्विशेष अद्वैतवाद सूत्रकारको सम्मत नहीं है, उसका 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञा' इत्यादि सूत्रोंसे स्पष्ट खण्डन हो जाता है, अतः उनका कथन भ्रान्त है ।

यदि विवर्तवाद न मान कर परिणामवाद माना जाय, तो यह प्रश्न भी उपस्थित हो सकता है—ब्रह्म एक देशसे परिणत होता है, या सर्वात्मना परिणत होता है ? यदि प्रथम पक्ष माना जायगा, तो सावयवत्त्वकी प्रसक्ति होगी और निरवयवप्रतिपादक श्रुतियाँ विरुद्ध होंगी। यदि द्वितीयपक्ष माना जायगा, तो ब्रह्मसे अतिरिक्त विकारकी अनवस्थिति और ब्रह्मका अभाव प्रसक्त होगा ।


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अतः इसी पूर्वपक्षकी ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’ इस सूत्रसे उत्थान करके ‘श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात्’ इससे आपाततः समाधान करके ‘आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि’ इस सूत्रसे सूत्रकारने विवर्तवादके आश्रयणसे ही समाधान किया है कि जैसे स्वप्नद्रष्टा जीवका उसके स्वरूपके अनुपमर्दसे परिणाम न होनेपर भी अनेक प्रकारकी रथादि सृष्टिका प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही ब्रह्ममें भी स्वरूपके अनुपमर्दसे अनेकाकार सृष्टिका भास होता है । वाचस्पतिमिश्रने भी कहा है कि ‘अनेन स्फुटितो मायावादः’ अर्थात् इससे मायावादका स्पष्टीकरण हो ही जाता है ।

यद्यपि सूत्रकारका अभिमत मायावाद ( विवर्तवाद ) अत्यन्त स्पष्ट है, तथापि प्राक्तन कर्मविशेषोंके प्रभावसे और सम्प्रदायशुद्ध शास्त्रीय परिज्ञान न होनेके कारण मनुष्यस्वभावोचित भ्रमका होना स्वाभाविक है; फिर भी उपक्रम आदि तात्पर्यनिश्थायक प्रमाणके अनुसार विज्ञ जनोंसे साम्प्रदायिक अध्ययन करनेपर उक्त भ्रम अपने-आप मिट जाता है ।

कुछ लोगोंकी इस विषय में भी विप्रतिपत्ति है कि ब्रह्मसूत्रोंमें ब्रह्मज्ञानसे मोक्षरूप फल नहीं बतलाया गया है, अतः ब्रह्मजिज्ञासा क्यों करनी चाहिए ? परन्तु यह भी असङ्गत है, क्योंकि उपक्रम और उपसंहारके सूत्रोंको देखनेसे यह शङ्का विलीन हो जाती है । जैसे—पहले उपक्रमका सूत्र है—‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ । साधन चतुष्टय सम्पन्न पुरुषोंको ब्रह्मजिज्ञासा क्यों करनी चाहिए ? इस प्रकारकी शङ्काका समाधान उपसंहारके ‘अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्’ इस सूत्रसे स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि ब्रह्मजिज्ञासा करनेसे उस पुरुषकी संसारमें आवृत्ति नहीं होती है, ऐसा ‘न स पुनरावर्तते’ इस श्रुतिसे ज्ञात होता है ।

सूक्ष्म विचारसे इन सब पूर्वपक्षोंका समाधन हो सकता है, अतः मायावाद श्रुति-स्मृति-सूत्र-सम्मत है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं करना चाहिए, और उसीका आचार्य गौडपाद और आचार्य शङ्कराचार्यजी द्वारा विस्तार किया गया है, जिससे कि साधारण मनुष्योंका उपकार हो ।

भगवदवतार श्रीआचार्यपादके मुखाम्बुजसे निकले हुए वचनोंके अनुसार अद्वैततत्त्वके प्रतिपादनके लिए भिन्न-भिन्न शैलियोंसे जिन आचार्योंने सिद्धान्त-भेद बतलाये हैं, उनका तत्-तत् ग्रन्थोंसे शब्दसंक्षेप द्वारा सङ्ग्रह करके श्रीअप्पय्यदीक्षितने इस ग्रन्थमें संग्रह किया है । इस ग्रन्थकी उपयोगिता,

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मौलिकता आदिके विषयमें यही प्रमाण सर्वोच्च हो सकता है कि इसके प्रणेता अप्पय्य दीक्षित हैं । इस ग्रन्थमें अप्पय्यदीक्षितजीने निम्नलिखित मतोंका सङ्ग्रह किया है—

( १) प्रकटार्थकारका मत(२१) भारतीतीर्थका मत
( २) विवरणकारका मत(२२) तत्त्वशुद्धिकारका मत
( ३) विवरणके एकदेशियोंका मत(२३) न्यायचन्द्रिकाकारका मत
( ४) संक्षेपशारीरककारका मत(२४) पञ्चदशीकारका मत
( ५) वार्त्तिककारका मत(२५) तत्त्वप्रदीपिकाकारका मत
( ६) आचार्य वाचस्पतिमिश्रका मत(२६) तत्त्वशुद्धिकारका मत
( ७) कौमुदीकारका मत(२७) कवितार्किकका मत
( ८) माया और अविद्याके भेदवादियोंका मत(२८) पञ्चपादिकाकारका मत
( ९) उक्त भेदवादियोंके एकदेशीका मत(२९) न्यायसुधाकारका मत
(१०) माया और अविद्याके अभेदवादियोंका मत(३०) विवरणवार्त्तिककारका मत
(११) पदार्थतत्त्वनिर्णयकारका मत(३१) शास्त्रदीपिकाकारका मत
(१२) विवर्त्तवादियोंका मत(३२) न्यायरत्नमालाकारका मत
(१३) परिणामवादियोंका मत(३३) अद्वैतविद्याचार्यका मत
(१४) सिद्धान्तमुक्तावलीकारका मत(३४) विवरणोपन्यासकारका मत
(१५) प्रकटार्थविवरणकारका मत(३५) न्यायनिर्णयकारका मत
(१६) सत्त्व-विवेककारका मत(३६) वेदान्तकौमुदीकारका मत
(१७) नैष्कर्म्यसिद्धिकारका मत(३७) शास्त्रदर्पणकारका मत
(१८) ब्रह्मानन्दका मत(३८) चित्सुखाचार्यका मत
(१९) दृग्दृश्यविवेककारका मत(३९) रामाद्वयाचार्यका मत
(२०) कल्पतरुकारका मत(४०) आनन्दबोधाचार्यका मत
(४१) अद्वैतदीपिकाकारका मत
(४२) दृष्टिसृष्टिवादियोंका मत
(४३) सृष्टिदृष्टिवादियोंका मत

इनसे अन्य भी कई मतोंका उपन्यास किया है । भगवान् शङ्कराचार्यजी द्वारा प्रतिपादित अद्वैत सिद्धान्तोंका कितने गौरव और श्रद्धाके साथ अनेक आचार्योंने स्वीकार किया है, यह इसी ग्रन्थके

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अध्ययनसे ज्ञात हो सकता है। आचार्यपादके सिवा अन्य कोई सिद्धान्त नहीं है, जिसका कि इतने आदरसे अनेक प्रगल्भ पण्डितों द्वारा आदर किया गया हो।

ऐसे विशिष्ट ग्रन्थकी हिन्दी भाषा हो जानेसे उन लोगोंको अवश्य आनन्द मिलेगा जो लोग अनूदित हिन्दी भाषाके समझनेमें अच्छी व्युत्पत्ति रखते हैं। हिन्दी भाषाके सारल्यमें अत्यन्त ध्यान रखा गया है, और जहाँ मूलमें काठिन्य मालूम हुआ है, वहाँ टिप्पणी द्वारा उस अंशको ठीक-ठीक साफ करनेकी चेष्टा की है। विशेषतः टिप्पणीमें यह भी बतलानेका अधिक यत्न किया गया है कि जिन ग्रन्थोंसे मूलकारने मत लिया है, उन ग्रन्थोंकी अक्षरशः पङ्क्तियाँ रखकर उनके पृष्ठाङ्क भी दिये हैं और उनका भाव भी लिखा है।

दूसरी बात इस ग्रन्थमें आये हुए मतोंका संक्षेपसे आकलन हो, इसलिए साथ-साथ वेदान्तसूक्तिमञ्जरीका भी अनुवादके साथ समावेश किया गया है। इसके रचयिता श्रीपरमहंसपरिव्राजकाचार्य गङ्गाधरसरस्वतीथे। ये अच्छे शास्त्रवेत्ता होंगे, ऐसा उनकी सूक्तिमञ्जरीकी रचनासे ज्ञात होता है, इससे अधिक उनके विषयमें जाननेकी सामग्री नहीं मिल सकी है।

जिस आनन्दकन्द परमेश्वरकी असीम कृपासे इस सिद्धान्तलेशका अनुवाद-प्रकाशन कार्य निर्विघ्न समाप्त हुआ है, उसको सहस्रशः प्रणाम करते हुए विश्रान्ति लेते हैं।

काशी।
वसन्तपञ्चमी १९९३

मूलशङ्कर व्यास

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॥ श्रीः ॥

सिद्धान्तलेश-सङ्ग्रहकी विषय-सूची

प्रथम परिच्छेद [ पृ० १-२६२ ]

विषयपृष्ठ-पंक्ति
अपूर्वविधि, नियमविधि और परिसङ्ख्याविधिका निरूपण ...४ - १
श्रवणविधिमें अपूर्वविधित्वका निरूपण ... ...१० - ५
ब्रह्मके लक्षणका विचार ... ... ...५३ - ५
ब्रह्ममें कारणत्वका विचार ... ... ...५७ - १०
मायाके कारणत्वका विचार ... ... ...७४ - ६
जीव और ईश्वरके स्वरूपका विचार ... ... ...८१ - ९
जीवके एकत्व और अनेकत्व का विचार ... ...१२१ - १
ब्रह्ममें कर्तृत्वका प्रतिपादन ... ... ...१३२ - १२
ब्रह्मके सर्वज्ञत्वका समर्थन ... ... ...१३७ - ८
वृत्तिकी उपयोगिताका विचार ... ... ...१४३ - ३
वृत्तिका विषयके साथ सम्बन्ध-विचार ... ...१४६ - ८
अभेदकी अभिव्यक्तिके स्वरूपका निरूपण ... ...१५२ - ६
आवरणाभिभवके स्वरूपका निरूपण ... ...१५७ - ६
साक्षीके स्वरूपका निरूपण ... ... ...१८० - १
अज्ञानसे साक्षीके अनावृतत्वका निरूपण ... ...१९३ - १
साक्षीरूप आनन्दमें अनावृतत्वका निरूपण ... ...१९५ - ३
अहङ्कार आदिके अनुसन्धानका निरूपण ... ...२०६ - १
सकारण अध्यासका निरूपण ... ...२१४ - १
वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका निरूपण ... ...२४७ - ५

द्वितीय परिच्छेद [ पृ०२६३-४१४ ]

विषयपृष्ठ-पंक्ति
प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिके अवाधितत्वका निरूपण ... ...२६३ - ८
प्रत्यक्षसे आगमके प्राबल्यका विचार ... ...२७९ - ५
उपजीव्यत्वरूपसे भी प्रत्यक्षसे श्रुतिके अबाधितत्वका विचार ...३०८ - ५
प्रतिविम्बकी सत्यताका निराकरण ... ... ...३१६ - १
स्वाप्न पदार्थोंके अधिष्ठानका निरूपण ... ...३४० - ८

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( २ )

स्वाप्न पदार्थोंके अनुभव-प्रकारका निरूपण ... ... ३४१ - १५
सृष्टिके कल्पकका निरूपण ... ... ... ३५६ - ९
मिथ्या अर्थकी अर्थ-क्रियाकारिताका निरूपण ... ... ३६६ - ५
मिथ्याके मिथ्या होनेपर भी प्रपञ्चके मिथ्यात्वकी उपपत्ति ... ३७४ - ६
जीवोपाधिके भेदका विचार ... ... ... ३८० - ७
उपाधिके भेदसे भी 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि अनुसन्धानका विचार ... ३९४ - ७
जीवके अणुत्वका निराकरण-विचार ... ... ... ३९८ - ५

तृतीय परिच्छेद [ पृ० ४१५-५१० ]

ज्ञानकी उत्पत्तिमें कर्मोंकी उपयोगिताका विचार ... ... ४१५ - ९
श्रुति द्वारा विनियुक्त कर्मविशेषोंका प्रतिपादन ... ... ४२३ - ५
विद्यार्थकर्मोंमें त्रैवर्णिकोंके अधिकारका निरूपण ... ... ४३१ - १
विद्यार्थकर्मोंमें शूद्रके अनधिकारका कथन ... ... ४३५ - ८
संन्यासकी विद्योपयोगिताका निरूपण ... ... ४४१ - ८
श्रवण आदिमें क्षत्रिय और वैश्योंके अधिकारका कथन ... ४४६ - ५
अमुख्य अधिकारी द्वारा किये गये कर्मोंकी जन्मान्तरीय विद्यामें उपयोगिता ... ... ... ... ४५५ - ६
विद्योपयोगी योगमार्गका निरूपण ... ... ४६० - ८
ब्रह्मसाक्षात्कारमें करण-विचार ... ... ... ४६७ - ८
ब्रह्मसाक्षात्कारमें शाब्दापरोक्षत्वका विचार ... ... ४७४ - ५
अज्ञानके निवर्तकका निरूपण ... ... ... ४८४ - ८
ब्रह्मज्ञानके विनाशकका विचार ... ... ... ५०३ - ४

चतुर्थ परिच्छेद [ पृ० ५११-५५० ]

अविद्यालेशका निरूपण ... ... ... ५११ - ८
अविद्यानिवृत्तिके स्वरूपका विचार ... ... ... ५१४ - १०
मोक्षके स्वतःपुरुषार्थत्वका विचार ... ... ... ५२५ - ९
मोक्षके प्राप्यत्व और अप्राप्यत्व का विचार ... ... ५२९ - १
मुक्तके स्वरूपका विचार ... ... ... ५३३ - ८

इति ।

श्रीगणेशाय नमः।

सिद्धान्तलेशसङ्ग्रह

[ भाषानुवादसहित ]


प्रथम परिच्छेद

अधिगतभिदा पूर्वाचार्यानुपेत्य सहस्रधा
सरिदिव महीभेदान् सम्प्राप्य शौरिपदोद्गता ।
जयति भगवत्पादश्रीमन्मुखाम्बुजनिर्गता
जननहरणी सूक्तिर्ब्रह्माद्वयैकपरायणा ॥ १ ॥


जैसे भगवान् श्रीहरिके चरण-कमलसे निकली हुई गङ्गाजीने अनेक प्रदेशोंको प्राप्त होकर हजारों भेद धारण किये, वैसे ही व्याख्यान करनेवाले अनेक पूर्वाचार्योंको व्याख्येयरूपसे प्राप्त होकर हजारों भेदोंको प्राप्त हुई, शुद्ध अद्वितीय ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली अत एव जन्मका नाश करनेवाली भगवान् शङ्कराचार्यके सुन्दर मुख-कमलसे निकली हुई (भाष्यरूपा) सुललित वाणी सर्वोत्कृष्ट है अर्थात् मैं उसे प्रणाम करता हूँ * ॥ १ ॥


* ग्रन्थाध्ययनमें मनुष्योंकी प्रवृत्ति होनेके लिए ग्रन्थके आरम्भमें विषय, प्रयोजन, अधिकारी और सम्बन्ध ये चार अनुबन्ध बतलाये जाते हैं। प्रकृत श्लोकमें 'ब्रह्माद्वयैकपरायणा' विशेषणसे प्रपञ्चशून्य सच्चिदानन्द ब्रह्म सूक्तिपदसे सूचित भाष्यका विषय तथा 'जननहरणी' पदसे मुक्तिरूप प्रयोजन बतलाया गया है। मुक्तिको चाहनेवाला इसका अधिकारी है और मुक्ति प्राप्य और अधिकारी प्राप्त करने वाला है इस प्रकार प्राप्यप्रापकभाव सम्बन्ध है, यह अर्थतः सूचित होता है। अतः निरवधिक सुख चाहनेवालेको इस ग्रन्थके अध्ययनमें अवश्य प्रवृत्त होना चाहिए, क्योंकि 'यह मेरा इष्ट साधन है' ऐसा ज्ञान प्रवर्तक होता है। निरवधिक सुखसे बढ़कर अन्य कोई इष्ट नहीं हो सकता। इस प्रकार भाष्यरूप शास्त्रके विषय, प्रयोजन आदि अनुबन्धोंका प्रतिपादन करते हुए ग्रन्थकारने भाष्यके प्रकरण—एकदेशरूप होनेसे अपने ग्रन्थके भी वे ही विषय, प्रयोजन आदि हैं, यह सूचित किया है।

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सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

प्राचीनैर्व्यवहारसिद्धविषयेष्वात्मैक्यसिद्धौ परं
सन्नह्यद्भिरनादरात् सरणयो नानाविधा दर्शिताः ।
तन्मूलानिह सङ्ग्रहेण कतिचित् सिद्धान्तभेदान् धिय-
श्शुद्ध्यै सङ्कलयामि तातचरणव्याख्यावचःख्यापितान् ॥ २ ॥
तेषूपपादनापेक्षान् पक्षान् प्रायो यथामति ।
युक्त्योपपादयन्नेव लिखाम्यनतिविस्तरम् ॥ ३ ॥

आत्माके ऐक्यकी अर्थात् अद्वितीय आत्मतत्त्वकी सिद्धिमें परम तात्पर्य ( अत्यन्त आदर ) रखनेवाले प्राचीन आचार्योंने केवल भ्रमसे प्रतीत होनेवाले जीव, ईश्वर और जगत्रूप पदार्थोंमें आदर न होनेसे परस्पर विरुद्ध अनेक प्रकार—मार्ग दिखलाये हैं । इस ग्रन्थमें, प्राचीन आचार्यों द्वारा प्रदर्शित उन्हीं अनेक मार्गोंके आधारपर पूज्य पिताजीके व्याख्यारूप वचनोंसे बोधित कुछ सिद्धान्तोंका, अपनी बुद्धिकी विशदताके लिए, मैं संकलन करता हूँ ॥ २ ॥ *

प्राचीन आचार्यों द्वारा प्रदर्शित उन विविध सिद्धान्तोंमेंसे उपपत्तिकी अपेक्षा रखनेवाले सिद्धान्तोंका अपनी बुद्धिके अनुसार युक्तिसे उपपादन करता हुआ मैं संक्षेपसे चित्रण करता हूँ ॥ ३ ॥


* यहाँपर शङ्का होती है कि जैसे भिन्न-भिन्न वस्तुओंमें अभिनिवेश होनेसे भेदवादियोंके वचनोंमें प्रामाण्य नहीं है, वैसे ही अद्वैतियोंमें कोई आचार्य एक जीव मानते हैं, तो कोई अनेक जीव मानते हैं, कोई जीवको प्रतिबिम्ब मानते हैं, तो किसीके मतमें प्रतिबिम्ब ही ईश्वर है और किसीके मतमें बिम्ब ईश्वर है इत्यादि विरुद्ध पक्षोंमें अभिनिवेश रखनेवाले प्राचीन आचार्योंके मतमें भी आस्था कैसे हो सकती है। परन्तु इस शङ्काका परिहार श्लोकमें कहे हुए 'अनादरात्' शब्दसे हो जाता है । उन उपर्युक्त पक्षोंमें आचार्योंका आदर—तात्पर्य नहीं है, किन्तु विवक्षित जो जीव और ब्रह्मका अभेद है, उसके यथार्थ ज्ञानके लिए उपायरूपसे वे बतलाये गये हैं । अतः वे अनेक मार्ग दोषावह नहीं हैं, प्रत्युत अलङ्कारके लिए ही हैं, क्योंकि मनुष्योंकी बुद्धि भिन्न-भिन्न है । अत एव किसी एकको किसी एक प्रकारसे और अन्यको अन्य प्रकारसे ब्रह्मात्मत्वका ज्ञान होगा। अतः उक्त शङ्काका अवसर नहीं है। 'यया यया भवेत् पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि । सा सैव प्रक्रियेह स्यात् साध्वी सा चानवस्थिता।' यह सुरेश्वराचार्यका वाक्य भी इसी अर्थका समर्थक है, इसका भाव यही है कि जिस जिस प्रक्रियासे पुरुषोंको आत्म-सम्बन्धी ज्ञान हो, वही प्रक्रिया उनके लिए निर्दुष्ट है । और वह प्रक्रिया अनेक प्रकारकी हो सकती है । [ क्योंकि संसारमें मनुष्योंकी बुद्धि एक प्रकारकी नहीं है ] । इस श्लोकसे ग्रन्थकारने अपने चिकीर्षितका—अभीष्ट

विधिविचार ] भाषानुवादसहित


[ वेदान्तसूक्तिमञ्जरी ]

तरणिशतसवर्णं कर्णघूर्णद्दिरेफा-
वलिवलितकपोलोद्दामदानाभिरामम् ॥
गिरिशगिरिसुताभ्यां लालितं नित्यमङ्के
स्वजनभरणशीलं शीलये विघ्नराजम् ॥ १ ॥

श्रीमद्गुरुपदाम्भोजद्वन्द्वमानम्य भक्तितः ॥
सिद्धान्तलेशसिद्धान्तान् कारिकाभिर्निदर्शये ॥ २ ॥

अपूर्वो नियमोऽन्यस्य परिसङ्ख्येति च क्रमात् ॥
त्रयो हि विधयस्तेषु श्रोतव्य इति को विधिः ॥ ३ ॥

सैकड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी, कानोंके आघातसे इधर उधर उड़ते हुए भँवरोंसे आच्छादित गण्डस्थलोंसे अप्रतिहत गतिसे बहते हुए मदजलसे सुशोभित, अपने भक्तोंका भरण-पोषण करनेवाले, श्रीमहादेवजी तथा पार्वतीजी दोनों अपनी गोदमें बैठाकर जिनका नित्य लालन-पालन करते हैं ऐसे श्रीगणेशजी का मैं ध्यान करता हूँ ॥ १ ॥

मैं श्रीगुरुजीके सुन्दर चरणकमलोंमें भक्तिपूर्वक प्रणाम करके सिद्धान्तलेशमें संगृहीत सिद्धान्तोंको कारिकाओंसे दर्शाता हूँ ॥ २ ॥

अपूर्वविधि, नियमविधि और परिसङ्ख्याविधि इस प्रकार क्रमसे तीन विधियाँ कही गई हैं, उनमेंसे 'श्रोतव्यः' (ब्रह्मसाक्षात्कारके लिए श्रवण करना चाहिए) यह कौन विधि है ॥ ३ ॥


(१) तत्र तावत् 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः' इति अधीतसाङ्गस्वाध्यायस्य वेदान्तैरापातप्रतिपन्ने ब्रह्मात्मनि समुदितजिज्ञासस्य तज्ज्ञानाय वेदान्तश्रवणे विधिः प्रतीयमानः किंविध इति चिन्त्यते—

सर्व प्रथम यहांपर यह विचार किया जाता है कि जिसको अङ्गोंके साथ समग्र वेदका अध्ययन करनेसे वेदान्तवाक्यों द्वारा साधारणरूपसे ब्रह्मरूप आत्मा ज्ञात है और विशेषरूपसे ब्रह्मको जाननेकी प्रबल इच्छा हुई है, उस पुरुषके विशेषरूपसे ब्रह्मज्ञानके लिए 'आत्मा वा अरे०' (हे मैत्रेयि ! आत्माका अपरोक्ष—साक्षात्कार करना चाहिए, श्रवण करना चाहिए और मनन करना चाहिए) इत्यादि श्रुतिसे वेदान्तोंके श्रवणमें विधिकी प्रतीति होती है, वह विधि किस प्रकारकी है ?


सांख्यका—प्रदर्शन भी किया है। 'तातचरण' इत्यादिवाक्यसे ग्रन्थकारका वेदान्त-ज्ञान आचार्यपरम्पराप्राप्त है, यह भी सूचित होता है ।

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सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

तिस्रः खलु विधेर्विधाः—अपूर्वविधिः, नियमविधिः, परिसङ्ख्याविधिश्चेति। तत्र कालत्रयेऽपि कथमप्यप्राप्तस्य प्राप्तिफलको विधिराद्यः, यथा 'व्रीहीन् प्रोक्षति' इति। नाऽत्र व्रीहीणां प्रोक्षणस्य संस्कारकर्मणो विना नियोगं मानान्तरेण कथमपि प्राप्तिरस्ति।

पक्षप्राप्तस्याऽप्राप्तांशपरिपूरणफलको विधिर्द्वितीयः। यथा 'व्रीहीन-


विधिके तीन भेद होते हैं—अपूर्वविधि, नियमविधि और परिसंख्याविधि। इन तीनोंमें से—[ दृष्ट या अदृष्ट अर्थके लिए ] तीनों कालोंमें किसी भी प्रमाणसे जो प्राप्त नहीं है, उसकी प्राप्ति करानेवाली विधि अपूर्वविधि है। जैसे 'व्रीहीन् प्रोक्षति' (व्रीहियोंका—धानोंका प्रोक्षण करे) यहाँ व्रीहियोंका प्रोक्षणरूप संस्कार-कर्म विधायक श्रुतिके बिना अन्य किसी प्रमाणसे प्राप्त नहीं है। [ तात्पर्य यह है कि दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें पुरोडाशके लिए व्रीहियोंकी—धानोंकी अपेक्षा होती है। पुरोडाशके लिए अपेक्षित धानोंका जलसे प्रोक्षण करना पड़ता है। दृष्ट या अदृष्ट किसी भी प्रयोजनके लिए अन्य प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे व्रीहि-प्रोक्षणकी प्राप्ति नहीं है, केवल 'व्रीहीन् प्रोक्षति' इस विधायक वाक्यसे ही उसकी प्राप्ति है, इसलिए वह विधायक शब्द अपूर्वविधि है ]।

पक्षमें जो प्राप्त है उसके अप्राप्त अंशकी परिपूर्ति करनेवाली विधि नियमविधि कहलाती है। [ अपूर्वविधिसे नियमविधिमें यह विशेषता है कि नियमविधिमें श्रुतिके बिना भी अन्य प्रमाणसे एक पक्षमें क्रिया प्राप्त होती है। जब एक वस्तुमें एक क्रिया की जायगी, तब उस कालमें उसमें अन्य क्रिया नहीं की जा सकती, क्योंकि एक कालमें एक वस्तुमें दो क्रियाएँ नहीं हो सकतीं हैं, इसलिए पक्षान्तरमें ही भिन्न-भिन्न क्रियाएँ होंगी, जैसे चावल निकालनेके लिए जिस क्षणमें धान मूसलसे कूटे जाते हैं, उस क्षणमें नखोंसे उनका विदारण नहीं कर सकते और जिस क्षणमें नखोंसे विदारण किया जाय, उस क्षणमें कूटना नहीं बन सकता। इसलिए अन्य-अन्य पक्षमें ही उन क्रियाओंकी प्रसक्ति है। दर्शपूर्णमासमें आये हुए पुरोडाशके लिए धानोंका छिलका अवश्य निकालना पड़ेगा, अन्यथा पुरोडाश ही नहीं बन सकेगा। अतः अर्थापत्तिरूप प्रमाणसे अवघात आदिकी विधायक श्रुतिके बिना भी प्राप्ति है। अपूर्वविधिमें ऐसा नहीं है।


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विधिविचार ] भाषानुवादसहित ५


वहन्ति' इति । अत्र विध्यभावेऽपि पुरोडाशप्रकृतिद्रव्याणां व्रीहीणां तण्डुलनिष्पत्त्याऽऽक्षेपादेवाऽवहननप्राप्तिर्भविष्यतीति न तत्प्राप्त्यर्थोऽयं विधिः, किन्त्वाक्षेपादवहननप्राप्तौ तद्वदेव लोकावगतकारणत्वाविशेषात् नखविदलनादिरपि पक्षे प्राप्नुयादिति अवहननाप्राप्तांशस्य सम्भवात् तदंशपरिपूरणफलकः ।


इसी भावको 'यथा' इत्यादिसे ग्रन्थकार कहते हैं] जैसे 'व्रीहीनवहन्ति' (व्रीहियों-का अवघात करे अर्थात् चावल निकालनेके लिए मूसलसे धानोंको कूटे ) ऐसा विधिवाक्य है । 'प्रकृतमें अवघातका विधान न भी किया जाय, तो भी व्रीहियोंका, जो पुरोडाशके प्रकृतिद्रव्य हैं, अवहनन तण्डुलनिष्पत्तिसे आक्षेप द्वारा ही प्राप्त हो जायगा, इसलिए अवघातकी अपूर्व प्राप्ति करानेके लिए यह विधि नहीं है। [ स्पष्टार्थ यह है कि दर्श और पूर्णमास यागमें आग्नेय आदि यागोंके उत्पत्तिवाक्यमें (आग्नेयोऽष्टाकपालो भवति) पुरोडाशद्रव्यका विधान किया गया है और उस स्थलमें यागका अनुवाद कर व्रीहियोंका भी विधान है। यद्यपि व्रीहि यागके साक्षात् साधन नहीं हैं, तो भी पुरोडाशके प्रकृतिद्रव्य होनेसे व्रीहियोंमें परम्परासे यागसाधनत्व है, क्योंकि व्रीहिसे उत्पादित चावलोंका बना हुआ पुरोडाश ही यागका साक्षात् कारण है। इसी प्रकार चावलकी उत्पत्ति अवघातके बिना नहीं हो सकती है, इसलिए वह तण्डुलोत्पत्ति भी अवश्य अपने अवघातरूप कारणका आक्षेप करेगी, क्योंकि अन्वय और व्यतिरेकसे चावलके उत्पादनमें अवघात कारणरूपसे निश्चित है, अतः 'व्रीहीनवहन्ति' विधिके बिना भी पूर्वोक्त प्रणालीसे व्रीहिका अवघात प्राप्त है, अतः उक्त वाक्य अपूर्व अर्थका प्रतिपादक नहीं हो सकता । यदि अवहनन लोकसे प्राप्त है, तो उसीसे नित्य प्राप्त हो ? इसपर 'किन्तु' इत्यादि-से कहते हैं] परन्तु जैसे तण्डुलनिष्पत्तिसे आक्षेप द्वारा अवहननकी प्राप्ति होगी, वैसे ही लोकमें [ चावल बनानेमें ] ज्ञात जो कारण हैं, उनके सामान्य होनेसे पक्षमें नखविदलन [ नखोंसे छिलना ] आदि भी प्राप्त होंगे, इससे अवहननके अप्राप्तांशका सम्भव होनेसे अप्राप्तांशकी परिपूर्तिके लिए यह 'व्रीहीनवहन्ति' नियमविधि है। [ अर्थात् पुरोडाशके लिए तण्डुलकी उत्पत्ति अवघातसे ही करनी चाहिए, न कि नखविदलनसे । इस नियमविधिसे

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सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथमपरिच्छेदं


द्वयोः शेषिनोरेकस्य शेषस्य वा एकस्मिञ्छेपिणि द्वयोः शेषयोर्वा नित्यप्राप्तौ शेष्यन्तरस्य शेषान्तरस्य वा निवृत्तिफलको विधिस्तृतीयः। यथा अग्निचयने—'इमामगृभ्णन्रशनामृतस्येत्यश्वाभिधानीमादत्ते' इति, यथा वा चातुर्मास्यान्तर्गतेष्टिविशेषे गृहमेधीये 'आज्यभागौ यजति' इति। अग्निचयने अश्वरशनाग्रहणम्, गर्दभरशनाग्रहणं चेति द्वयमनुष्ठेयम्।


अप्राप्तांशकी परिपूर्ति होती है—सर्वदा अवघात ही प्राप्त होता है और दूसरे नखविदलन आदिकी अर्थात् निवृत्ति होती है।]

दो शेषियोंमें—अङ्गियोंमें एक शेषकी—अङ्गकी नित्य प्राप्ति होनेपर एक शेषीकी निवृत्ति करनेवाली विधि परिसंख्याविधि है तथा एक शेषीमें दो शेषोंकी नित्य प्राप्ति होनेपर अन्य शेषकी निवृत्ति करनेवाली विधि भी परिसंख्याविधि है। जैसे अग्निचयनमें* 'इमामगृभ्णन्रशनामृतस्येत्यश्वाभिधानीमादत्ते ('इमामगृभ्णन्' इत्यादि मन्त्रसे अश्वकी रशनाका—रस्सीका ग्रहण करे) अथवा चातुर्मास्ययागके† अन्तर्गत गृहमेधीय‡ इष्टिमें 'आज्यभागौ यजति' (आज्यभाग याग करे) यह विधि है। अग्निचयनमें दोनोंका—अश्वरशनाग्रहण


* अग्निचयन नामका एक स्थण्डिल होता है। यह सोमयागका अङ्ग है। चयन—ईंटोंसे बनाया हुआ स्थलविशेष। सोमयागकी उत्तर वेदीको बढ़ाकर वहाँ ईंटोंसे चयनका निर्माण कर उसके ऊपर आहवनीय अग्निको रखकर उसमें होम किया जाता है। यह स्थण्डिल अग्निका आधार है, इसलिए उसका नाम भी अग्निचयन हुआ और उस स्थण्डिलपर किया जानेवाला यागविशेष भी अग्निचयन है, जिसका वर्णन (का० श्रौ० सू० १६।१ आदिमें) विस्तारसे है। अग्निके पांच भेद हैं—आवहनीय, आवसथ्य, सभ्य, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि, इनका अग्निहोत्र आदिमें उपयोग होता है।

† चातुर्मास्य नामके याग हैं, ये याग चार मासोंमें अनुष्ठित होते हैं, अतः 'चातुर्मास्य' शब्दसे इनका व्यवहार किया जाता है। इसमें चार पर्व होते हैं—वैश्वदेव, वरुणप्रघास, साकमेधाः और शुनासीरीय। पहला पर्व फाल्गुनकी पूर्णिमामें, दूसरा चार मास बीतनेके बाद आषाढ़की पूर्णिमामें, तीसरा कार्तिककी पूर्णिमामें और चौथा फाल्गुनकी शुक्ल प्रतिपदामें पड़ता है, इस प्रकार वारंवार अनुष्ठानका आवर्त्तन होता है।

‡ गृहमेधीय नामकी इष्टि होती है। यह चातुर्मास्यान्तर्गत साकमेधाख्यपर्वके, जो दो दिनमें निष्पन्न होता है, अनुष्ठानके पहले दिन सायंकालमें 'मरुद्भ्यो गृहमेधिभ्यः सर्वासां दुग्धे सायमोदनम्' इस वाक्यसे विहित है, इसमें गृहमेधी मरुत् देवता है, दूधमें पकाया हुआ चरु द्रव्य है और ऋषभ दक्षिणा है।

विधिविचार ] भाषानुवादसहित


तत्राऽश्वरशनाग्रहणे 'इमामगृभ्णन्' इति मन्त्रो लिङ्गादेव रशनाग्रहणप्रकाशनसामर्थ्यरूपान्नित्यं प्राप्नोतीति न तत्प्राप्त्यर्थः, तदप्राप्तांशपरिपूरणार्थो वा विधिः, किन्तु लिङ्गाविशेषात् गर्दभरशनाग्रहणेऽपि मन्त्रः प्राप्नुयादिति तन्निवृत्त्यर्थः। तथा गृहमेधीयस्य दर्शपूर्णमासप्रकृतिकत्वादतिदेशादेवाऽऽज्यभागौ नित्यं प्राप्नुत इति न तत्र विधिः तत्प्राप्त्यर्थः,


और गर्दभरशनाग्रहणका अनुष्ठान होता है। ऐसी स्थितिमें रशनाके ग्रहणरूप अर्थके प्रकाशनसामर्थ्यरूप लिङ्गप्रमाणसे ही 'इमामगृभ्णन्' इत्यादि मन्त्रकी अश्वरशनाग्रहणमें नित्य प्राप्ति है। इससे 'अश्वाभिधानीमादत्ते' यह विधि अश्वरशनाग्रहणमें उक्त मन्त्रकी अपूर्वप्राप्ति करानेके लिए अपूर्वविधि नहीं है। अथवा उसके अप्राप्तांशके परिपूरणरूप प्रयोजनके लिए नियमविधि भी नहीं है, किन्तु अर्थप्रकाशनरूप लिङ्गके सामान्य होनेसे गर्दभकी रशना (रस्सी) के ग्रहणमें भी 'इमाम०' इत्यादि मन्त्र प्राप्त होगा, इसलिए रासभकी रशनाके ग्रहणमें उस मन्त्रकी प्राप्तिकी निवृत्ति करनेके लिए 'अश्वाभिधानी०' इत्यादि परिसंख्याविधि है। [ परिसंख्याविधिके प्रथम लक्षणका समन्वय इस प्रकार करना चाहिए—दो शेषी हैं—अश्वरशनाग्रहण और रासभरशनाग्रहण, उन दोनों शेषियोंमें लिङ्गप्रमाणसे 'इमामगृभ्णन्' इत्यादि शेषरूप मन्त्र नित्य प्राप्त है और शेषीकी—गर्दभरशनाके ग्रहणकी निवृत्ति भी होती है—'इमामगृभ्णन्' इत्यादि मन्त्रसे अश्वरशनाग्रहण ही करना चाहिए, गर्दभरशनाका ग्रहण नहीं करना चाहिए ] उसी प्रकार दर्श और पूर्णमास* गृहमेधीय इष्टिकी प्रकृति हैं, इसलिए प्रकृतिवत् विकृतिः कर्तव्या (प्रकृति यागमें जो उपयुक्त है, वही विकृति यागमें भी लेना चाहिए) इस प्रकारके अतिदेश वाक्यसे प्रकृति यागमें प्राप्त आज्यभाग गृहमेधीय विकृति यागमें प्राप्त होंगे ही, इसलिए


* दर्श-पूर्णमास शब्दसे छः याग लिए जाते हैं—आग्नेय याग, उपांशु याग, अग्नीषोमीय याग, आग्नेय याग और दो सांनाय्य याग। प्रथम तीन याग पूर्णिमाके दिन होते हैं और अन्तिम तीन याग अमावास्याके दिन होते हैं। आग्नेय याग पूर्णिमा और अमावास्या दोनों दिन होता है, इसलिए 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत' इत्यादिमें दर्शपूर्णमासशब्दसे उक्त छः यागोंका ग्रहण है। द्विवचनकी उपपत्ति दो त्रिकमें रहनेवाले त्रित्व-त्रित्वरूप दो धर्मोंके अभिप्रायसे विवक्षित है। दर्श और पूर्णमास सभी दृष्टियोंकी प्रकृति हैं, क्योंकि 'दर्शपूर्णमासाविष्टौनां प्रकृतिः' [ आप० श्रौ० २४।३।३२ ] इत्यादि सूत्र इस अर्थमें प्रमाणभूत है।