सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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जाय, तो उन वाक्योंका वास्तविक अर्थ हाथमें नहीं आ सकता है । अतः इन प्रमाणोंके आधारपर ही श्रुतियोंका अर्थ निश्चय करना चाहिए । किसी प्रकार भी श्रुतिवाक्यार्थनिर्णयावसरमें इन प्रमाणोंकी उपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि श्रुतिवाक्योंका यह स्वभाव है कि उनके स्वार्थनिर्णयमें उपक्रमोपसंहारादिकी अपेक्षा होती है । अतः श्रुत्यर्थनिर्णायकत्वरूपसे स्वभावतः प्राप्त उन प्रमाणोंकी यदि कोई उपेक्षा करे, तो इससे यही कहा जा सकता है कि वह वह्निके उष्णत्वस्वभावका भी अपलाप करता है ।
जब इस स्वभावस्थितिका अवलम्बन करके श्रुतियोंके अर्थका निर्णय किया जाता है, तब श्रुतियों द्वारा भगवान् शङ्कराचार्यपादने जिस निर्गुण सच्चिदानन्दस्वरूप अद्वैत अर्थका प्रतिपादन किया है, वही अद्वैत अर्थ श्रुतिवाक्योंसे अपने-आप प्राप्त हो जाता है, इतर नहीं, क्योंकि श्रुतिने बार-बार उक्त अद्वैतवस्तुका ही प्रतिपादन किया है, कारण कि निम्नलिखित—
| द्वितीयाद्वै भयं भवति । | इदं सर्वं यदयमात्मा । |
| एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म । | एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते अथ तस्य भयं भवति । |
| नेह नानास्ति किञ्चन । | सलिल एको द्रष्टाद्वैतः । |
| मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति । | अथात आदेशो नेति नेति । |
| ऐतत्तादात्म्यमिदं सर्वम् । | एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् । |
| सर्वं खलु इदं ब्रह्म । | नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा । |
| आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् । | यत्र द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति, यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत् केन कं पश्येत् । |
| योऽन्यां देवतामुपास्ते न स वेद । | |
| अहं ब्रह्मास्मि । | |
| तत्त्वमसि । |
इत्यादि अनेक श्रुतियाँ अद्वैत—समस्त द्वैतप्रपञ्चसे शून्य—स्वतःप्रकाश आनन्दस्वरूप ब्रह्मका ही प्रतिपादन करती हैं और भ्रमसे प्रतीयमान द्वैत-वस्तुका निषेध करती हैं । इसी श्रुतिसम्मत अद्वैततत्त्वका भगवान् वादरायणने अपने ब्रह्मसूत्रोंसे भी प्रतिपादन किया है। और उसीको भगवत्पाद शङ्कराचार्यने लोक-कल्याणार्थ विशद किया है । अन्य मतावलम्बियोंने जो खींचा-तानी की है, उसका तो उक्त श्रुतियोंसे ही निराकरण हो जाता है, अतः उनके विषयमें
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