भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 20

[ १८ ]

अधिक कुछ लिखनेकी आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है। यही अद्वैतब्रह्म माया-शबलित होकर समस्त प्रपञ्चके प्रति अभिन्न निमित्तोपादान होता है।

श्रुतिसम्मत मायाका स्वरूप

कुछ लोग मायावादका, जिसका कि आचार्यपादने वर्णन किया है, खण्डन करनेके लिए प्रस्तुत होते हैं। परन्तु उनका वह कथन केवल अज्ञान-मूलक ही है। पहले जिस मायावादका वे खण्डन करनेके लिए प्रस्तुत होते हैं, उनको यदि धर्मिकुक्षिप्रविष्ट मायाका परिज्ञान है, तो वे किसका खण्डन करेंगे। यदि नहीं है, तो खण्डनमें खण्डनीय वस्तुके परिज्ञानकी, जो कि सर्वतन्त्र-सिद्धान्तसम्मत है, आवश्यकता होनेके कारण उसके अस्तित्वाभावमें उनका खण्डन केवल उपहासास्पद ही होगा।

अपि च भगवान् आचार्यपादने किस रूपमें मायाका अङ्गीकार किया है, उसे भी पहले समझना चाहिए, और उसे टटोलना चाहिए कि वह वेदसम्मत है ? या नहीं। अनन्तर उसकी परीक्षा की जाय तो परीक्षा ठीक होती है, परन्तु ऐसा नहीं किया जाता। ऋग्वेदादिमें मायाशब्दका आचार्यसम्मत अर्थमें प्रचुररूपसे प्रयोग किया गया है। जैसे कि —

मायाविनं वृत्रमस्फुरन्निः
मायिनो दानवस्य माया अपादयत् [ म० २ सू० ११ म० ९-१० ]

श्रुतस्य महीं मायाम्
कवितमस्य मायाम् [ म० ५ सू० ९६ ५-६ ]

निर्माया उत्ये असुरा अभूवन् त्वञ्च मा वरण कामयासे ।
ऋतेन राजन्ननृतं विविञ्चन्मम राष्ट्रस्याधिपत्यमेहि [म० १० सू० १२४ मन्त्र ५]

मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः [ म० १ सू० १२ ]

मायिनाममिनाः प्रोत मायाः [ म० १ सू० ३२ ]

इस प्रकारके मायाशब्दघटित अनेक वाक्य ऋग्वेदादिमें उपलब्ध होते हैं। उनका उपक्रमोपसंहार आदिके आधारपर निर्णय करनेसे वही मायाशब्दार्थ लब्ध होता है जो कि पूज्यपाद श्रीशङ्कराचार्यजीने माना है। आचार्यपादने बार-बार कहा है कि सत्यस्वरूप तत्त्वज्ञानसे असत्यस्वरूप मायाकी निवृत्ति होती है—यही बात ऋग्वेदके 'ऋतेन राजन्' (सत्यसे अनृतकी अर्थात् मायाकी निवृत्ति होती है) इत्यादि मन्त्रसे स्पष्ट भासती है; एवं—