भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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[ १९ ]

इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते । मायांन्तु प्रकृतिं विद्यात् मायिनन्तु महेश्वरम् । मायामेतां तरन्ति । अनृतेन ही प्रत्यूढाः ।

इत्यादि अन्यान्य श्रुतिवाक्य भी उक्तार्थमें ही प्रमाण हैं । और मायाको अनिर्वचनीय मानना भी श्रुतिने ही बतलाया है—'न सत् तन्नासदुच्यते' अर्थात् माया सत्त्व और असत्त्वसे रहित है—अनिर्वचनीय है ।

पूर्वापरभावका विचार न करके जो लोग अपनी निरालम्ब बुद्धिके आधारपर विचार करते हैं, उनसे वेदके यथार्थ अर्थकी आशा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ऐसे पुरुषोंसे हमेशा श्रुति डरा करती है, इस अर्थका पोषक—

‘बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरेदिति । इतिहास-पुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् ॥’

इस प्रकार प्रसिद्ध वचन भी मिलता है ।

और मायाशब्दका लोकप्रसिद्ध अर्थ किया जाय, तो भी वही अर्थ होता है, जो कि आचार्यचरणने माना है, क्योंकि कोषकारोंने मायाशब्दके छद्म, कापट्य, इन्द्रजाल और मिथ्याबुद्धिहेतु अज्ञान अर्थ माने हैं । यदि माया-शब्द उक्त अर्थवाला नहीं होता, तो इस अनादिप्रवाहकी गति कैसे होती ?

और सूत्रकार बादरायणको भी यही बात सम्मत है, क्योंकि यह बात वेदान्तजगत्में प्रसिद्ध है कि एकके विज्ञानसे सभी वस्तुका विज्ञान हो जाता है । इसी विचारको लेकर सूत्रकारने 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्' 'तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः' प्रतिज्ञाहानिर्व्यतिरेकाच्छब्देभ्यः' इत्यादि सूत्रोंसे प्रतिज्ञा और दृष्टान्तके अनुसार ब्रह्मको जगत्की प्रकृति माना है और कार्यकी ब्रह्मसत्तासे पृथक् सत्ताका खण्डन किया है । एवमेव आकाशादिकी ब्रह्ममें अध्यस्तता मानी है । इसीसे यह परिस्फुट है कि प्रतिज्ञावाक्य औरोंसे प्रधान है, उस प्रतिज्ञावाक्यकी तभी उपपत्ति हो सकती है जब कि विवर्तवादका आश्रयण किया जाय, अन्यथा नहीं हो सकती, कारण कि एकके विज्ञानसे सर्वविज्ञानकी प्रतिज्ञा करके दृष्टान्त दिया गया है कि 'यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव

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