सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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सत्यम्' इस श्रुतिकी आचार्यपादकी प्रणालीके सिवा अन्य प्रणालीसे उपपत्ति नहीं हो सकती है। इस श्रुतिमें एकविज्ञानसे सर्वविज्ञान जो प्रतिज्ञात है, वह तत्-तत् व्यक्तित्त्वरूपसे विवक्षित नहीं है, किन्तु मुमुक्षुके लिए जो अभीष्ट ज्ञान है, उसका प्रतिपादन करती है। वह है—मोक्षसाधनीभूत अद्वितीय ब्रह्मज्ञान । श्रुति जिसका प्रतिपादन करना चाहती है, उसमें शिष्यको शङ्का हो कि द्वैत प्रपञ्च तो विद्यमान है, फिर कैसे अद्वितीयत्त्वका ज्ञान हो सकता है ? तो इस शङ्काका परिहार करनेके लिए 'यथा सोम्यैकेन' इत्यादि श्रुतिकी प्रवृत्ति हुई है। तात्पर्य यह हुआ कि जैसे शुक्तिमें आरोपित रजतादिका और रज्जुमें आरोपित सर्पादिका स्वरूप शुक्ति आदि ही हैं, क्योंकि आरोपितकी अधिष्ठानसे अतिरिक्त सत्ता नहीं हो सकती । अतः शुक्ति आदिके तत्त्व-ज्ञानसे उनमें आरोपित सकल पदार्थोंका सत्त्व विदित हो जाता है, आरोपित रजतादिका तत्त्व शुक्ति आदि है और यथार्थ ज्ञान भी वही हो सकता है, जो तत्त्वावगाही हो । जो तत्त्वावगाही ज्ञान नहीं होता, वह मिथ्याज्ञान है । अतः शुक्तिमें रजतका ज्ञान मिथ्याज्ञान है, इसलिए उक्त श्रुतिमें एक विज्ञानसे सर्वविज्ञानका जो कथन है, वह भी अधिष्ठानभूत सत्य वस्तुके विज्ञानसे आरोपित पदार्थोंका स्वरूपविज्ञान विवक्षित है याने ब्रह्मभूत अधिष्ठानकी सत्तासे पृथक् द्वैतपदार्थोंकी वास्तविक सत्ता नहीं है, अतः वे मिथ्याभूत ही हैं। इस प्रकारका ज्ञान विवक्षित है, । 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' इत्यादि छान्दोग्योपनिषद्का उपक्रम भी उक्त ज्ञानकी सम्पत्तिके लिए ही है, यह समझना चाहिए। विस्तारभयसे प्रकृतमें विचार नहीं करते । यदि इतरमतोंका अवलम्बन किया जाय, तो श्रुतिका प्रतिज्ञा-दृष्टान्तवाक्य कभी नहीं युक्तियुक्त होगा। इसलिए जिनकी आशङ्का है कि निर्विशेष अद्वैतवाद सूत्रकारको सम्मत नहीं है, उसका 'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञा' इत्यादि सूत्रोंसे स्पष्ट खण्डन हो जाता है, अतः उनका कथन भ्रान्त है ।
यदि विवर्तवाद न मान कर परिणामवाद माना जाय, तो यह प्रश्न भी उपस्थित हो सकता है—ब्रह्म एक देशसे परिणत होता है, या सर्वात्मना परिणत होता है ? यदि प्रथम पक्ष माना जायगा, तो सावयवत्त्वकी प्रसक्ति होगी और निरवयवप्रतिपादक श्रुतियाँ विरुद्ध होंगी। यदि द्वितीयपक्ष माना जायगा, तो ब्रह्मसे अतिरिक्त विकारकी अनवस्थिति और ब्रह्मका अभाव प्रसक्त होगा ।