सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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अतः इसी पूर्वपक्षकी ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’ इस सूत्रसे उत्थान करके ‘श्रुतेस्तु शब्दमूलत्वात्’ इससे आपाततः समाधान करके ‘आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि’ इस सूत्रसे सूत्रकारने विवर्तवादके आश्रयणसे ही समाधान किया है कि जैसे स्वप्नद्रष्टा जीवका उसके स्वरूपके अनुपमर्दसे परिणाम न होनेपर भी अनेक प्रकारकी रथादि सृष्टिका प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही ब्रह्ममें भी स्वरूपके अनुपमर्दसे अनेकाकार सृष्टिका भास होता है । वाचस्पतिमिश्रने भी कहा है कि ‘अनेन स्फुटितो मायावादः’ अर्थात् इससे मायावादका स्पष्टीकरण हो ही जाता है ।
यद्यपि सूत्रकारका अभिमत मायावाद ( विवर्तवाद ) अत्यन्त स्पष्ट है, तथापि प्राक्तन कर्मविशेषोंके प्रभावसे और सम्प्रदायशुद्ध शास्त्रीय परिज्ञान न होनेके कारण मनुष्यस्वभावोचित भ्रमका होना स्वाभाविक है; फिर भी उपक्रम आदि तात्पर्यनिश्थायक प्रमाणके अनुसार विज्ञ जनोंसे साम्प्रदायिक अध्ययन करनेपर उक्त भ्रम अपने-आप मिट जाता है ।
कुछ लोगोंकी इस विषय में भी विप्रतिपत्ति है कि ब्रह्मसूत्रोंमें ब्रह्मज्ञानसे मोक्षरूप फल नहीं बतलाया गया है, अतः ब्रह्मजिज्ञासा क्यों करनी चाहिए ? परन्तु यह भी असङ्गत है, क्योंकि उपक्रम और उपसंहारके सूत्रोंको देखनेसे यह शङ्का विलीन हो जाती है । जैसे—पहले उपक्रमका सूत्र है—‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ । साधन चतुष्टय सम्पन्न पुरुषोंको ब्रह्मजिज्ञासा क्यों करनी चाहिए ? इस प्रकारकी शङ्काका समाधान उपसंहारके ‘अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्’ इस सूत्रसे स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि ब्रह्मजिज्ञासा करनेसे उस पुरुषकी संसारमें आवृत्ति नहीं होती है, ऐसा ‘न स पुनरावर्तते’ इस श्रुतिसे ज्ञात होता है ।
सूक्ष्म विचारसे इन सब पूर्वपक्षोंका समाधन हो सकता है, अतः मायावाद श्रुति-स्मृति-सूत्र-सम्मत है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं करना चाहिए, और उसीका आचार्य गौडपाद और आचार्य शङ्कराचार्यजी द्वारा विस्तार किया गया है, जिससे कि साधारण मनुष्योंका उपकार हो ।
भगवदवतार श्रीआचार्यपादके मुखाम्बुजसे निकले हुए वचनोंके अनुसार अद्वैततत्त्वके प्रतिपादनके लिए भिन्न-भिन्न शैलियोंसे जिन आचार्योंने सिद्धान्त-भेद बतलाये हैं, उनका तत्-तत् ग्रन्थोंसे शब्दसंक्षेप द्वारा सङ्ग्रह करके श्रीअप्पय्यदीक्षितने इस ग्रन्थमें संग्रह किया है । इस ग्रन्थकी उपयोगिता,