भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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विधिविचार ] भाषानुवादसहित


[ वेदान्तसूक्तिमञ्जरी ]

तरणिशतसवर्णं कर्णघूर्णद्दिरेफा-
वलिवलितकपोलोद्दामदानाभिरामम् ॥
गिरिशगिरिसुताभ्यां लालितं नित्यमङ्के
स्वजनभरणशीलं शीलये विघ्नराजम् ॥ १ ॥

श्रीमद्गुरुपदाम्भोजद्वन्द्वमानम्य भक्तितः ॥
सिद्धान्तलेशसिद्धान्तान् कारिकाभिर्निदर्शये ॥ २ ॥

अपूर्वो नियमोऽन्यस्य परिसङ्ख्येति च क्रमात् ॥
त्रयो हि विधयस्तेषु श्रोतव्य इति को विधिः ॥ ३ ॥

सैकड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी, कानोंके आघातसे इधर उधर उड़ते हुए भँवरोंसे आच्छादित गण्डस्थलोंसे अप्रतिहत गतिसे बहते हुए मदजलसे सुशोभित, अपने भक्तोंका भरण-पोषण करनेवाले, श्रीमहादेवजी तथा पार्वतीजी दोनों अपनी गोदमें बैठाकर जिनका नित्य लालन-पालन करते हैं ऐसे श्रीगणेशजी का मैं ध्यान करता हूँ ॥ १ ॥

मैं श्रीगुरुजीके सुन्दर चरणकमलोंमें भक्तिपूर्वक प्रणाम करके सिद्धान्तलेशमें संगृहीत सिद्धान्तोंको कारिकाओंसे दर्शाता हूँ ॥ २ ॥

अपूर्वविधि, नियमविधि और परिसङ्ख्याविधि इस प्रकार क्रमसे तीन विधियाँ कही गई हैं, उनमेंसे 'श्रोतव्यः' (ब्रह्मसाक्षात्कारके लिए श्रवण करना चाहिए) यह कौन विधि है ॥ ३ ॥


(१) तत्र तावत् 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः' इति अधीतसाङ्गस्वाध्यायस्य वेदान्तैरापातप्रतिपन्ने ब्रह्मात्मनि समुदितजिज्ञासस्य तज्ज्ञानाय वेदान्तश्रवणे विधिः प्रतीयमानः किंविध इति चिन्त्यते—

सर्व प्रथम यहांपर यह विचार किया जाता है कि जिसको अङ्गोंके साथ समग्र वेदका अध्ययन करनेसे वेदान्तवाक्यों द्वारा साधारणरूपसे ब्रह्मरूप आत्मा ज्ञात है और विशेषरूपसे ब्रह्मको जाननेकी प्रबल इच्छा हुई है, उस पुरुषके विशेषरूपसे ब्रह्मज्ञानके लिए 'आत्मा वा अरे०' (हे मैत्रेयि ! आत्माका अपरोक्ष—साक्षात्कार करना चाहिए, श्रवण करना चाहिए और मनन करना चाहिए) इत्यादि श्रुतिसे वेदान्तोंके श्रवणमें विधिकी प्रतीति होती है, वह विधि किस प्रकारकी है ?


सांख्यका—प्रदर्शन भी किया है। 'तातचरण' इत्यादिवाक्यसे ग्रन्थकारका वेदान्त-ज्ञान आचार्यपरम्पराप्राप्त है, यह भी सूचित होता है ।

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