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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

प्राचीनैर्व्यवहारसिद्धविषयेष्वात्मैक्यसिद्धौ परं
सन्नह्यद्भिरनादरात् सरणयो नानाविधा दर्शिताः ।
तन्मूलानिह सङ्ग्रहेण कतिचित् सिद्धान्तभेदान् धिय-
श्शुद्ध्यै सङ्कलयामि तातचरणव्याख्यावचःख्यापितान् ॥ २ ॥
तेषूपपादनापेक्षान् पक्षान् प्रायो यथामति ।
युक्त्योपपादयन्नेव लिखाम्यनतिविस्तरम् ॥ ३ ॥

आत्माके ऐक्यकी अर्थात् अद्वितीय आत्मतत्त्वकी सिद्धिमें परम तात्पर्य ( अत्यन्त आदर ) रखनेवाले प्राचीन आचार्योंने केवल भ्रमसे प्रतीत होनेवाले जीव, ईश्वर और जगत्रूप पदार्थोंमें आदर न होनेसे परस्पर विरुद्ध अनेक प्रकार—मार्ग दिखलाये हैं । इस ग्रन्थमें, प्राचीन आचार्यों द्वारा प्रदर्शित उन्हीं अनेक मार्गोंके आधारपर पूज्य पिताजीके व्याख्यारूप वचनोंसे बोधित कुछ सिद्धान्तोंका, अपनी बुद्धिकी विशदताके लिए, मैं संकलन करता हूँ ॥ २ ॥ *

प्राचीन आचार्यों द्वारा प्रदर्शित उन विविध सिद्धान्तोंमेंसे उपपत्तिकी अपेक्षा रखनेवाले सिद्धान्तोंका अपनी बुद्धिके अनुसार युक्तिसे उपपादन करता हुआ मैं संक्षेपसे चित्रण करता हूँ ॥ ३ ॥


* यहाँपर शङ्का होती है कि जैसे भिन्न-भिन्न वस्तुओंमें अभिनिवेश होनेसे भेदवादियोंके वचनोंमें प्रामाण्य नहीं है, वैसे ही अद्वैतियोंमें कोई आचार्य एक जीव मानते हैं, तो कोई अनेक जीव मानते हैं, कोई जीवको प्रतिबिम्ब मानते हैं, तो किसीके मतमें प्रतिबिम्ब ही ईश्वर है और किसीके मतमें बिम्ब ईश्वर है इत्यादि विरुद्ध पक्षोंमें अभिनिवेश रखनेवाले प्राचीन आचार्योंके मतमें भी आस्था कैसे हो सकती है। परन्तु इस शङ्काका परिहार श्लोकमें कहे हुए 'अनादरात्' शब्दसे हो जाता है । उन उपर्युक्त पक्षोंमें आचार्योंका आदर—तात्पर्य नहीं है, किन्तु विवक्षित जो जीव और ब्रह्मका अभेद है, उसके यथार्थ ज्ञानके लिए उपायरूपसे वे बतलाये गये हैं । अतः वे अनेक मार्ग दोषावह नहीं हैं, प्रत्युत अलङ्कारके लिए ही हैं, क्योंकि मनुष्योंकी बुद्धि भिन्न-भिन्न है । अत एव किसी एकको किसी एक प्रकारसे और अन्यको अन्य प्रकारसे ब्रह्मात्मत्वका ज्ञान होगा। अतः उक्त शङ्काका अवसर नहीं है। 'यया यया भवेत् पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि । सा सैव प्रक्रियेह स्यात् साध्वी सा चानवस्थिता।' यह सुरेश्वराचार्यका वाक्य भी इसी अर्थका समर्थक है, इसका भाव यही है कि जिस जिस प्रक्रियासे पुरुषोंको आत्म-सम्बन्धी ज्ञान हो, वही प्रक्रिया उनके लिए निर्दुष्ट है । और वह प्रक्रिया अनेक प्रकारकी हो सकती है । [ क्योंकि संसारमें मनुष्योंकी बुद्धि एक प्रकारकी नहीं है ] । इस श्लोकसे ग्रन्थकारने अपने चिकीर्षितका—अभीष्ट

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