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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ
सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

प्राचीनैर्व्यवहारसिद्धविषयेष्वात्मैक्यसिद्धौ परं
सन्नह्यद्भिरनादरात् सरणयो नानाविधा दर्शिताः ।
तन्मूलानिह सङ्ग्रहेण कतिचित् सिद्धान्तभेदान् धिय-
श्शुद्ध्यै सङ्कलयामि तातचरणव्याख्यावचःख्यापितान् ॥ २ ॥
तेषूपपादनापेक्षान् पक्षान् प्रायो यथामति ।
युक्त्योपपादयन्नेव लिखाम्यनतिविस्तरम् ॥ ३ ॥

आत्माके ऐक्यकी अर्थात् अद्वितीय आत्मतत्त्वकी सिद्धिमें परम तात्पर्य ( अत्यन्त आदर ) रखनेवाले प्राचीन आचार्योंने केवल भ्रमसे प्रतीत होनेवाले जीव, ईश्वर और जगत्रूप पदार्थोंमें आदर न होनेसे परस्पर विरुद्ध अनेक प्रकार—मार्ग दिखलाये हैं । इस ग्रन्थमें, प्राचीन आचार्यों द्वारा प्रदर्शित उन्हीं अनेक मार्गोंके आधारपर पूज्य पिताजीके व्याख्यारूप वचनोंसे बोधित कुछ सिद्धान्तोंका, अपनी बुद्धिकी विशदताके लिए, मैं संकलन करता हूँ ॥ २ ॥ *

प्राचीन आचार्यों द्वारा प्रदर्शित उन विविध सिद्धान्तोंमेंसे उपपत्तिकी अपेक्षा रखनेवाले सिद्धान्तोंका अपनी बुद्धिके अनुसार युक्तिसे उपपादन करता हुआ मैं संक्षेपसे चित्रण करता हूँ ॥ ३ ॥


* यहाँपर शङ्का होती है कि जैसे भिन्न-भिन्न वस्तुओंमें अभिनिवेश होनेसे भेदवादियोंके वचनोंमें प्रामाण्य नहीं है, वैसे ही अद्वैतियोंमें कोई आचार्य एक जीव मानते हैं, तो कोई अनेक जीव मानते हैं, कोई जीवको प्रतिबिम्ब मानते हैं, तो किसीके मतमें प्रतिबिम्ब ही ईश्वर है और किसीके मतमें बिम्ब ईश्वर है इत्यादि विरुद्ध पक्षोंमें अभिनिवेश रखनेवाले प्राचीन आचार्योंके मतमें भी आस्था कैसे हो सकती है। परन्तु इस शङ्काका परिहार श्लोकमें कहे हुए 'अनादरात्' शब्दसे हो जाता है । उन उपर्युक्त पक्षोंमें आचार्योंका आदर—तात्पर्य नहीं है, किन्तु विवक्षित जो जीव और ब्रह्मका अभेद है, उसके यथार्थ ज्ञानके लिए उपायरूपसे वे बतलाये गये हैं । अतः वे अनेक मार्ग दोषावह नहीं हैं, प्रत्युत अलङ्कारके लिए ही हैं, क्योंकि मनुष्योंकी बुद्धि भिन्न-भिन्न है । अत एव किसी एकको किसी एक प्रकारसे और अन्यको अन्य प्रकारसे ब्रह्मात्मत्वका ज्ञान होगा। अतः उक्त शङ्काका अवसर नहीं है। 'यया यया भवेत् पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि । सा सैव प्रक्रियेह स्यात् साध्वी सा चानवस्थिता।' यह सुरेश्वराचार्यका वाक्य भी इसी अर्थका समर्थक है, इसका भाव यही है कि जिस जिस प्रक्रियासे पुरुषोंको आत्म-सम्बन्धी ज्ञान हो, वही प्रक्रिया उनके लिए निर्दुष्ट है । और वह प्रक्रिया अनेक प्रकारकी हो सकती है । [ क्योंकि संसारमें मनुष्योंकी बुद्धि एक प्रकारकी नहीं है ] । इस श्लोकसे ग्रन्थकारने अपने चिकीर्षितका—अभीष्ट

विधिविचार ] भाषानुवादसहित


[ वेदान्तसूक्तिमञ्जरी ]

तरणिशतसवर्णं कर्णघूर्णद्दिरेफा-
वलिवलितकपोलोद्दामदानाभिरामम् ॥
गिरिशगिरिसुताभ्यां लालितं नित्यमङ्के
स्वजनभरणशीलं शीलये विघ्नराजम् ॥ १ ॥

श्रीमद्गुरुपदाम्भोजद्वन्द्वमानम्य भक्तितः ॥
सिद्धान्तलेशसिद्धान्तान् कारिकाभिर्निदर्शये ॥ २ ॥

अपूर्वो नियमोऽन्यस्य परिसङ्ख्येति च क्रमात् ॥
त्रयो हि विधयस्तेषु श्रोतव्य इति को विधिः ॥ ३ ॥

सैकड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी, कानोंके आघातसे इधर उधर उड़ते हुए भँवरोंसे आच्छादित गण्डस्थलोंसे अप्रतिहत गतिसे बहते हुए मदजलसे सुशोभित, अपने भक्तोंका भरण-पोषण करनेवाले, श्रीमहादेवजी तथा पार्वतीजी दोनों अपनी गोदमें बैठाकर जिनका नित्य लालन-पालन करते हैं ऐसे श्रीगणेशजी का मैं ध्यान करता हूँ ॥ १ ॥

मैं श्रीगुरुजीके सुन्दर चरणकमलोंमें भक्तिपूर्वक प्रणाम करके सिद्धान्तलेशमें संगृहीत सिद्धान्तोंको कारिकाओंसे दर्शाता हूँ ॥ २ ॥

अपूर्वविधि, नियमविधि और परिसङ्ख्याविधि इस प्रकार क्रमसे तीन विधियाँ कही गई हैं, उनमेंसे 'श्रोतव्यः' (ब्रह्मसाक्षात्कारके लिए श्रवण करना चाहिए) यह कौन विधि है ॥ ३ ॥


(१) तत्र तावत् 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः' इति अधीतसाङ्गस्वाध्यायस्य वेदान्तैरापातप्रतिपन्ने ब्रह्मात्मनि समुदितजिज्ञासस्य तज्ज्ञानाय वेदान्तश्रवणे विधिः प्रतीयमानः किंविध इति चिन्त्यते—

सर्व प्रथम यहांपर यह विचार किया जाता है कि जिसको अङ्गोंके साथ समग्र वेदका अध्ययन करनेसे वेदान्तवाक्यों द्वारा साधारणरूपसे ब्रह्मरूप आत्मा ज्ञात है और विशेषरूपसे ब्रह्मको जाननेकी प्रबल इच्छा हुई है, उस पुरुषके विशेषरूपसे ब्रह्मज्ञानके लिए 'आत्मा वा अरे०' (हे मैत्रेयि ! आत्माका अपरोक्ष—साक्षात्कार करना चाहिए, श्रवण करना चाहिए और मनन करना चाहिए) इत्यादि श्रुतिसे वेदान्तोंके श्रवणमें विधिकी प्रतीति होती है, वह विधि किस प्रकारकी है ?


सांख्यका—प्रदर्शन भी किया है। 'तातचरण' इत्यादिवाक्यसे ग्रन्थकारका वेदान्त-ज्ञान आचार्यपरम्पराप्राप्त है, यह भी सूचित होता है ।

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सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

तिस्रः खलु विधेर्विधाः—अपूर्वविधिः, नियमविधिः, परिसङ्ख्याविधिश्चेति। तत्र कालत्रयेऽपि कथमप्यप्राप्तस्य प्राप्तिफलको विधिराद्यः, यथा 'व्रीहीन् प्रोक्षति' इति। नाऽत्र व्रीहीणां प्रोक्षणस्य संस्कारकर्मणो विना नियोगं मानान्तरेण कथमपि प्राप्तिरस्ति।

पक्षप्राप्तस्याऽप्राप्तांशपरिपूरणफलको विधिर्द्वितीयः। यथा 'व्रीहीन-


विधिके तीन भेद होते हैं—अपूर्वविधि, नियमविधि और परिसंख्याविधि। इन तीनोंमें से—[ दृष्ट या अदृष्ट अर्थके लिए ] तीनों कालोंमें किसी भी प्रमाणसे जो प्राप्त नहीं है, उसकी प्राप्ति करानेवाली विधि अपूर्वविधि है। जैसे 'व्रीहीन् प्रोक्षति' (व्रीहियोंका—धानोंका प्रोक्षण करे) यहाँ व्रीहियोंका प्रोक्षणरूप संस्कार-कर्म विधायक श्रुतिके बिना अन्य किसी प्रमाणसे प्राप्त नहीं है। [ तात्पर्य यह है कि दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें पुरोडाशके लिए व्रीहियोंकी—धानोंकी अपेक्षा होती है। पुरोडाशके लिए अपेक्षित धानोंका जलसे प्रोक्षण करना पड़ता है। दृष्ट या अदृष्ट किसी भी प्रयोजनके लिए अन्य प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे व्रीहि-प्रोक्षणकी प्राप्ति नहीं है, केवल 'व्रीहीन् प्रोक्षति' इस विधायक वाक्यसे ही उसकी प्राप्ति है, इसलिए वह विधायक शब्द अपूर्वविधि है ]।

पक्षमें जो प्राप्त है उसके अप्राप्त अंशकी परिपूर्ति करनेवाली विधि नियमविधि कहलाती है। [ अपूर्वविधिसे नियमविधिमें यह विशेषता है कि नियमविधिमें श्रुतिके बिना भी अन्य प्रमाणसे एक पक्षमें क्रिया प्राप्त होती है। जब एक वस्तुमें एक क्रिया की जायगी, तब उस कालमें उसमें अन्य क्रिया नहीं की जा सकती, क्योंकि एक कालमें एक वस्तुमें दो क्रियाएँ नहीं हो सकतीं हैं, इसलिए पक्षान्तरमें ही भिन्न-भिन्न क्रियाएँ होंगी, जैसे चावल निकालनेके लिए जिस क्षणमें धान मूसलसे कूटे जाते हैं, उस क्षणमें नखोंसे उनका विदारण नहीं कर सकते और जिस क्षणमें नखोंसे विदारण किया जाय, उस क्षणमें कूटना नहीं बन सकता। इसलिए अन्य-अन्य पक्षमें ही उन क्रियाओंकी प्रसक्ति है। दर्शपूर्णमासमें आये हुए पुरोडाशके लिए धानोंका छिलका अवश्य निकालना पड़ेगा, अन्यथा पुरोडाश ही नहीं बन सकेगा। अतः अर्थापत्तिरूप प्रमाणसे अवघात आदिकी विधायक श्रुतिके बिना भी प्राप्ति है। अपूर्वविधिमें ऐसा नहीं है।


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विधिविचार ] भाषानुवादसहित ५


वहन्ति' इति । अत्र विध्यभावेऽपि पुरोडाशप्रकृतिद्रव्याणां व्रीहीणां तण्डुलनिष्पत्त्याऽऽक्षेपादेवाऽवहननप्राप्तिर्भविष्यतीति न तत्प्राप्त्यर्थोऽयं विधिः, किन्त्वाक्षेपादवहननप्राप्तौ तद्वदेव लोकावगतकारणत्वाविशेषात् नखविदलनादिरपि पक्षे प्राप्नुयादिति अवहननाप्राप्तांशस्य सम्भवात् तदंशपरिपूरणफलकः ।


इसी भावको 'यथा' इत्यादिसे ग्रन्थकार कहते हैं] जैसे 'व्रीहीनवहन्ति' (व्रीहियों-का अवघात करे अर्थात् चावल निकालनेके लिए मूसलसे धानोंको कूटे ) ऐसा विधिवाक्य है । 'प्रकृतमें अवघातका विधान न भी किया जाय, तो भी व्रीहियोंका, जो पुरोडाशके प्रकृतिद्रव्य हैं, अवहनन तण्डुलनिष्पत्तिसे आक्षेप द्वारा ही प्राप्त हो जायगा, इसलिए अवघातकी अपूर्व प्राप्ति करानेके लिए यह विधि नहीं है। [ स्पष्टार्थ यह है कि दर्श और पूर्णमास यागमें आग्नेय आदि यागोंके उत्पत्तिवाक्यमें (आग्नेयोऽष्टाकपालो भवति) पुरोडाशद्रव्यका विधान किया गया है और उस स्थलमें यागका अनुवाद कर व्रीहियोंका भी विधान है। यद्यपि व्रीहि यागके साक्षात् साधन नहीं हैं, तो भी पुरोडाशके प्रकृतिद्रव्य होनेसे व्रीहियोंमें परम्परासे यागसाधनत्व है, क्योंकि व्रीहिसे उत्पादित चावलोंका बना हुआ पुरोडाश ही यागका साक्षात् कारण है। इसी प्रकार चावलकी उत्पत्ति अवघातके बिना नहीं हो सकती है, इसलिए वह तण्डुलोत्पत्ति भी अवश्य अपने अवघातरूप कारणका आक्षेप करेगी, क्योंकि अन्वय और व्यतिरेकसे चावलके उत्पादनमें अवघात कारणरूपसे निश्चित है, अतः 'व्रीहीनवहन्ति' विधिके बिना भी पूर्वोक्त प्रणालीसे व्रीहिका अवघात प्राप्त है, अतः उक्त वाक्य अपूर्व अर्थका प्रतिपादक नहीं हो सकता । यदि अवहनन लोकसे प्राप्त है, तो उसीसे नित्य प्राप्त हो ? इसपर 'किन्तु' इत्यादि-से कहते हैं] परन्तु जैसे तण्डुलनिष्पत्तिसे आक्षेप द्वारा अवहननकी प्राप्ति होगी, वैसे ही लोकमें [ चावल बनानेमें ] ज्ञात जो कारण हैं, उनके सामान्य होनेसे पक्षमें नखविदलन [ नखोंसे छिलना ] आदि भी प्राप्त होंगे, इससे अवहननके अप्राप्तांशका सम्भव होनेसे अप्राप्तांशकी परिपूर्तिके लिए यह 'व्रीहीनवहन्ति' नियमविधि है। [ अर्थात् पुरोडाशके लिए तण्डुलकी उत्पत्ति अवघातसे ही करनी चाहिए, न कि नखविदलनसे । इस नियमविधिसे

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सिद्धान्तलेशसंग्रह [प्रथमपरिच्छेदं


द्वयोः शेषिनोरेकस्य शेषस्य वा एकस्मिञ्छेपिणि द्वयोः शेषयोर्वा नित्यप्राप्तौ शेष्यन्तरस्य शेषान्तरस्य वा निवृत्तिफलको विधिस्तृतीयः। यथा अग्निचयने—'इमामगृभ्णन्रशनामृतस्येत्यश्वाभिधानीमादत्ते' इति, यथा वा चातुर्मास्यान्तर्गतेष्टिविशेषे गृहमेधीये 'आज्यभागौ यजति' इति। अग्निचयने अश्वरशनाग्रहणम्, गर्दभरशनाग्रहणं चेति द्वयमनुष्ठेयम्।


अप्राप्तांशकी परिपूर्ति होती है—सर्वदा अवघात ही प्राप्त होता है और दूसरे नखविदलन आदिकी अर्थात् निवृत्ति होती है।]

दो शेषियोंमें—अङ्गियोंमें एक शेषकी—अङ्गकी नित्य प्राप्ति होनेपर एक शेषीकी निवृत्ति करनेवाली विधि परिसंख्याविधि है तथा एक शेषीमें दो शेषोंकी नित्य प्राप्ति होनेपर अन्य शेषकी निवृत्ति करनेवाली विधि भी परिसंख्याविधि है। जैसे अग्निचयनमें* 'इमामगृभ्णन्रशनामृतस्येत्यश्वाभिधानीमादत्ते ('इमामगृभ्णन्' इत्यादि मन्त्रसे अश्वकी रशनाका—रस्सीका ग्रहण करे) अथवा चातुर्मास्ययागके† अन्तर्गत गृहमेधीय‡ इष्टिमें 'आज्यभागौ यजति' (आज्यभाग याग करे) यह विधि है। अग्निचयनमें दोनोंका—अश्वरशनाग्रहण


* अग्निचयन नामका एक स्थण्डिल होता है। यह सोमयागका अङ्ग है। चयन—ईंटोंसे बनाया हुआ स्थलविशेष। सोमयागकी उत्तर वेदीको बढ़ाकर वहाँ ईंटोंसे चयनका निर्माण कर उसके ऊपर आहवनीय अग्निको रखकर उसमें होम किया जाता है। यह स्थण्डिल अग्निका आधार है, इसलिए उसका नाम भी अग्निचयन हुआ और उस स्थण्डिलपर किया जानेवाला यागविशेष भी अग्निचयन है, जिसका वर्णन (का० श्रौ० सू० १६।१ आदिमें) विस्तारसे है। अग्निके पांच भेद हैं—आवहनीय, आवसथ्य, सभ्य, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि, इनका अग्निहोत्र आदिमें उपयोग होता है।

† चातुर्मास्य नामके याग हैं, ये याग चार मासोंमें अनुष्ठित होते हैं, अतः 'चातुर्मास्य' शब्दसे इनका व्यवहार किया जाता है। इसमें चार पर्व होते हैं—वैश्वदेव, वरुणप्रघास, साकमेधाः और शुनासीरीय। पहला पर्व फाल्गुनकी पूर्णिमामें, दूसरा चार मास बीतनेके बाद आषाढ़की पूर्णिमामें, तीसरा कार्तिककी पूर्णिमामें और चौथा फाल्गुनकी शुक्ल प्रतिपदामें पड़ता है, इस प्रकार वारंवार अनुष्ठानका आवर्त्तन होता है।

‡ गृहमेधीय नामकी इष्टि होती है। यह चातुर्मास्यान्तर्गत साकमेधाख्यपर्वके, जो दो दिनमें निष्पन्न होता है, अनुष्ठानके पहले दिन सायंकालमें 'मरुद्भ्यो गृहमेधिभ्यः सर्वासां दुग्धे सायमोदनम्' इस वाक्यसे विहित है, इसमें गृहमेधी मरुत् देवता है, दूधमें पकाया हुआ चरु द्रव्य है और ऋषभ दक्षिणा है।

विधिविचार ] भाषानुवादसहित


तत्राऽश्वरशनाग्रहणे 'इमामगृभ्णन्' इति मन्त्रो लिङ्गादेव रशनाग्रहणप्रकाशनसामर्थ्यरूपान्नित्यं प्राप्नोतीति न तत्प्राप्त्यर्थः, तदप्राप्तांशपरिपूरणार्थो वा विधिः, किन्तु लिङ्गाविशेषात् गर्दभरशनाग्रहणेऽपि मन्त्रः प्राप्नुयादिति तन्निवृत्त्यर्थः। तथा गृहमेधीयस्य दर्शपूर्णमासप्रकृतिकत्वादतिदेशादेवाऽऽज्यभागौ नित्यं प्राप्नुत इति न तत्र विधिः तत्प्राप्त्यर्थः,


और गर्दभरशनाग्रहणका अनुष्ठान होता है। ऐसी स्थितिमें रशनाके ग्रहणरूप अर्थके प्रकाशनसामर्थ्यरूप लिङ्गप्रमाणसे ही 'इमामगृभ्णन्' इत्यादि मन्त्रकी अश्वरशनाग्रहणमें नित्य प्राप्ति है। इससे 'अश्वाभिधानीमादत्ते' यह विधि अश्वरशनाग्रहणमें उक्त मन्त्रकी अपूर्वप्राप्ति करानेके लिए अपूर्वविधि नहीं है। अथवा उसके अप्राप्तांशके परिपूरणरूप प्रयोजनके लिए नियमविधि भी नहीं है, किन्तु अर्थप्रकाशनरूप लिङ्गके सामान्य होनेसे गर्दभकी रशना (रस्सी) के ग्रहणमें भी 'इमाम०' इत्यादि मन्त्र प्राप्त होगा, इसलिए रासभकी रशनाके ग्रहणमें उस मन्त्रकी प्राप्तिकी निवृत्ति करनेके लिए 'अश्वाभिधानी०' इत्यादि परिसंख्याविधि है। [ परिसंख्याविधिके प्रथम लक्षणका समन्वय इस प्रकार करना चाहिए—दो शेषी हैं—अश्वरशनाग्रहण और रासभरशनाग्रहण, उन दोनों शेषियोंमें लिङ्गप्रमाणसे 'इमामगृभ्णन्' इत्यादि शेषरूप मन्त्र नित्य प्राप्त है और शेषीकी—गर्दभरशनाके ग्रहणकी निवृत्ति भी होती है—'इमामगृभ्णन्' इत्यादि मन्त्रसे अश्वरशनाग्रहण ही करना चाहिए, गर्दभरशनाका ग्रहण नहीं करना चाहिए ] उसी प्रकार दर्श और पूर्णमास* गृहमेधीय इष्टिकी प्रकृति हैं, इसलिए प्रकृतिवत् विकृतिः कर्तव्या (प्रकृति यागमें जो उपयुक्त है, वही विकृति यागमें भी लेना चाहिए) इस प्रकारके अतिदेश वाक्यसे प्रकृति यागमें प्राप्त आज्यभाग गृहमेधीय विकृति यागमें प्राप्त होंगे ही, इसलिए


* दर्श-पूर्णमास शब्दसे छः याग लिए जाते हैं—आग्नेय याग, उपांशु याग, अग्नीषोमीय याग, आग्नेय याग और दो सांनाय्य याग। प्रथम तीन याग पूर्णिमाके दिन होते हैं और अन्तिम तीन याग अमावास्याके दिन होते हैं। आग्नेय याग पूर्णिमा और अमावास्या दोनों दिन होता है, इसलिए 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत' इत्यादिमें दर्शपूर्णमासशब्दसे उक्त छः यागोंका ग्रहण है। द्विवचनकी उपपत्ति दो त्रिकमें रहनेवाले त्रित्व-त्रित्वरूप दो धर्मोंके अभिप्रायसे विवक्षित है। दर्श और पूर्णमास सभी दृष्टियोंकी प्रकृति हैं, क्योंकि 'दर्शपूर्णमासाविष्टौनां प्रकृतिः' [ आप० श्रौ० २४।३।३२ ] इत्यादि सूत्र इस अर्थमें प्रमाणभूत है।

८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद


तन्नियमार्थो वा, किन्त्वतिदेशात् प्रयाजादिकमपि प्राप्नुयादिति तन्नि- वृत्त्यर्थः । गृहमेधीयाधिकरण-( १०-७-९ )-पूर्वपक्षरीत्येदमुदाहरणं यत्र क्वचिदुदाहर्तव्यमित्युदाहृतम् ।

न च नियमविधावपि पक्षप्राप्तावहननस्याऽप्राप्तांशपरिपूरणे कृते तदवरुद्धत्वात् पाक्षिकसाधनान्तरस्य नखविदलनादेर्निवृत्तिरपि लभ्यते इतीतरनिवृत्तिफलकत्वाविशेषान्नियमपरिसङ्ख्ययोः फलतो विवेको न युक्त


'आज्यभागौ यजति' यह विधि अपूर्व आज्यभागकी प्राप्ति करानेके लिए नहीं है, अथवा अप्राप्त अंशके पूरणरूप नियमके लिए भी नहीं है, किन्तु अतिदेशवाक्यके साधारण होनेसे आज्यभागके समान प्रयाज आदिकी भी प्राप्ति होगी, इसलिए प्रयाज आदिकी निवृत्ति 'आज्यभागौ' इत्यादि विधिका प्रयोजन है । [यहांपर परिसंख्याविधिके द्वितीय लक्षणकी सङ्गति इस प्रकार है—एक शेषी है—गृहमेधीय इष्टि, उसमें आज्यभाग और प्रयाज आदिरूप दो शेषोंकी अति- देशवाक्यसे प्राप्ति होनेपर उनमेंसे एक प्रयाज आदिरूप शेषकी निवृत्ति होती है, अतः द्वितीय लक्षण घट गया । यद्यपि अन्यतरत्वरूपसे परिसंख्याका एक ही लक्षण है, तो भी सुगमतासे लक्षणसमन्वय बतलानेके लिए विभाग करके दो लक्षण कहे गये हैं, यह जानना चाहिए । परन्तु पूर्वमीमांसामें सिद्धान्तरूपसे 'आज्यभागौ यजति' यह परिसंख्याविधि नहीं मानी गई है, अतः यहां इसका उदाहरण देना उचित नहीं है ? यदि इस प्रकारकी शङ्का किसीको हो, तो उसका निराकरण करनेके लिए 'गृहमेधीयाधिकरण' इत्यादिसे कहते हैं ] यद्यपि गृहमेधीयाधिकरणमें यह पूर्वपक्षरूपसे उदाहरण है, तथापि [ परिसंख्याविधिके स्वरूपके प्रदर्शनमें ] कहीं भी उदाहरण दे सकते हैं, इसलिए यहां इसका उदाहरणरूपसे कथन किया गया है ।

यदि कोई शङ्का करे कि नियमविधिमें भी एक पक्षमें प्राप्त जो अवघात है, उसके अप्राप्तांशकी परिपूर्ति करनेपर तदवरुद्ध होनेसे— अवघातसे ही तण्डुलकी उत्पत्तिसे होनेवाले आक्षेपकी शान्ति होनेसे— पाक्षिक नखविदलन आदि अन्य ( व्रीहिके छिलके दूर करके अन्य ) साधनोंकी निवृत्ति भी होती है, इससे—नियमविधिमें इतरकी निवृत्तिरूप

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विधिविचार ] भाषानुवादसहित ९


इति शङ्क्यम्, विधितोऽवहनननियमं विना आक्षेपलभ्यस्य नखविदल- नादेर्निवर्तयितुमशक्यतया अप्राप्तांशपरिपूरणरूपस्य नियमस्य प्राथम्यात् विधेयावहननगतत्वेन प्रत्यासन्नतयाच तस्यैव नियमविधिफलत्वोपगमात् । तदनुनिष्पादिन्या अविधेयगतत्वेन विप्रकृष्टाया इतरनिवृत्तेः सन्निकृष्टफल- सम्भवे फलत्वानौचित्यात् । एवं विविक्तासु तिसृषु विधेर्विधासु किंविधः श्रवणविधिरश्रीयते ।


प्रयोजनका भी लाभ होनेसे फलतः नियमविधि और परिसंख्याविधिमें कोई भेद नहीं है ? [ फलतः कहनेसे नियम और परिसंख्यामें स्वरूपतः भेद है, यह मालूम होता है, क्योंकि नियमविधि पक्षमें प्राप्त अवघातक्रियाका विधान करती है और परिसंख्याविधि नित्य प्राप्त क्रियाका विधान करती है, इसलिए स्वरूपतः भेद होनेपर भी फलतः भेद नहीं है, यह शङ्का हो सकती है] परन्तु ऐसी शङ्का करना युक्त नहीं है, क्योंकि विधिसे जब तक अवघातका नियम न किया जाय, तब तक तण्डुलनिष्पत्तिसे होनेवाले आक्षेपसे प्राप्त नखविदलन आदिकी निवृत्ति नहीं की जा सकती, इससे अप्राप्तांशका परिपूरणरूप नियम ही प्रथम उपस्थित है, और साक्षात् विधिसे लभ्य अवघातमें ही ( अप्राप्तांशकी पूर्ति होनेसे ) अप्राप्तांशपरिपूरणरूप नियम ही विधिके प्रति प्रत्यासन्न — निकटवर्ती है, इसलिए अप्राप्तांशपरिपूरणरूप नियमको ही नियमविधिका फल मानना चाहिए, इतरनिवृत्ति नियमविधिका फल नहीं है, क्योंकि इतरनिवृत्ति अप्राप्तांश- परिपूरणकी उपस्थितिके अनन्तर उपस्थित होती है और अविधेय जो नखविदलन है, उसमें रहनेके कारण निकटवर्ती नहीं है, इसलिए सन्निकृष्ट वस्तुमें जब तक फलत्वका सम्भव हो, तब तक असन्निकृष्टमें ( नखविदलन आदिकी निवृत्तिमें ) फलत्वकी कल्पना करना उचित नहीं है ?

पूर्वोक्त तीन प्रकारकी विधियोंमें से श्रवणविधि कौन विधि है ? [ग्रन्थके इतने अंशसे अपूर्व, नियम और परिसंख्या विधिका निरूपण किया गया, परन्तु 'श्रोतव्यः' यह श्रवणविधि अपूर्वविधि है या नियमविधि है अथवा परिसंख्या विधि है, इसका विचार नहीं हुआ, इसलिए पूर्वपक्षी पूछता है कि 'श्रोतव्यः' यह श्रवणविधि किस विधिके अन्तर्गत है अर्थात् उसको अपूर्वविधि मानना चाहिए या नियमविधि मानना चाहिए अथवा परिसंख्याविधि मानना चाहिए ? ]

१०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

तत्रोपायापरिज्ञानादलौकिकसमीक्षणे ॥
प्रकटार्थकृतः प्राहुर्पूर्वं श्रवणे विधिम् ॥ ४ ॥

प्रकटार्थकार कहते हैं कि ब्रह्मसाक्षात्कारमें श्रवणरूप उपायका किसी प्रमाणसे परिज्ञान न होनेके कारण उक्त तीन विधियोंमें से श्रवणमें अपूर्वविधि है ॥ ४ ॥

अत्र प्रकटार्थकारादयः केचिदाहुः—अपूर्वविधिरयम् , अप्राप्तत्वात् । नहि 'वेदान्तश्रवणं ब्रह्मसाक्षात्कारहेतुः' इत्यत्र अन्वयव्यतिरेकप्रमाण-

इसपर प्रकटार्थकार आदि कहते हैं—'श्रोतव्यः' यह अपूर्वविधि है, क्योंकि वेदान्तश्रवण अप्राप्त है, अर्थात् वेदान्तश्रवण ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारण है, यह 'श्रोतव्यः' इस विधिको छोड़कर अन्य किसी प्रत्यक्ष आदि प्रमाणसे नहीं जाना जाता । [ परन्तु वेदान्तश्रवणमें ब्रह्मसाक्षात्कारकी हेतुता अन्य प्रमाणसे प्राप्त नहीं है, यह कहना युक्त नहीं है, क्योंकि वक्ष्यमाण अन्वय और व्यतिरेकरूप* प्रमाणसे वेदान्तश्रवणमें ब्रह्मसाक्षात्कारकी हेतुता प्राप्त है इसपर 'नहि' इत्यादिसे कहते हैं ] वेदान्तका श्रवण ब्रह्मसाक्षात्कारका कारण है, इस कार्यकारणभावमें अन्वय या व्यतिरेक-


* कार्य और कारणके अवधारणमें अर्थात् यह इसका कारण है और यह इसका कार्य है, इस प्रकारके कार्यकारणभावका निश्चय करनेमें अन्वय और व्यतिरेककी आवश्यकता होती है । अन्वयके लिए बहुत जगहोंमें अन्वयसहचार और अन्वयव्याप्तिका भी प्रयोग देखा जाता है, इसी तरह व्यतिरेकके लिए व्यतिरेकव्याप्ति और व्यतिरेकसहचारका प्रयोग भी देख पड़ता है । इसलिए कहींपर ऐसे शब्द आवें, तो घबराना नहीं चाहिए । कारणके रहनेपर कार्यका अवश्य रहना अन्वय है, जैसे—दण्डके रहनेपर घटका रहना । कारणके अभावमें कार्यका अभाव होना व्यतिरेक है; जैसे—दण्डरूप कारणके अभावमें घटरूप कार्यका अभाव होना अर्थात् दण्डके बिना घट कदापि उत्पन्न नहीं हो सकता । अतः इस प्रकारके अन्वय और व्यतिरेकके होनेसे दण्डमें घटकारणत्वका निश्चय होता है । यदि अन्वय और व्यतिरेक न हों, तो किसी भी वस्तुमें कारणत्वका निश्चय नहीं होगा । अन्वय और व्यतिरेकका अभाव होनेपर यदि वस्तुमें कारणत्व माना जाय, तो अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेक-व्यभिचार दोष प्राप्त होते हैं। अन्वयव्यभिचारका अर्थ है—अन्वय न होना अर्थात् कारणके रहनेपर भी कार्योत्पत्ति न होना और व्यतिरेकव्यभिचार—व्यतिरेकव्याप्तिका न रहना अर्थात् कारणके अभावमें भी कार्यकी उत्पत्ति होना । वे दोनों—अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेक-व्यभिचार दोष क्रमशः अन्यथासिद्धत्वज्ञानद्वारा और साक्षात् प्रतियोगित्वज्ञानद्वारा कारणत्व-ज्ञानमें प्रतिबन्धक होते हैं। भाव यह है कि पहला अन्वयव्यभिचार परम्परासे कारणत्वका विरोधी है और दूसरा व्यतिरेकव्यभिचार साक्षात् कारणत्वका विरोधी है, क्योंकि कारण उसे कहते हैं जो अनन्यथासिद्ध होकर पूर्वक्षणमें कार्यके अधिकरणमें रहे, इसलिए

विधिविचार ] भाषानुवादसहित ११


मस्ति । लोके कृतश्रवणस्याऽपि बहुशस्तदनुत्पत्तेः, अकृतश्रवणस्याऽपि गर्भगतस्य वामदेवस्य तदुत्पत्तेरुभयतो व्यभिचारात् । न वा 'श्रवणमात्रं


रूप कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि लोकमें प्रायः देखा जाता है कि वेदान्तश्रवण करनेपर भी आत्मसाक्षात्कार नहीं होता । और वेदान्तश्रवण न करनेपर भी गर्भाशयमें ही वामदेव मुनिको आत्माका साक्षात्कार हुआ था । इसलिए दोनों अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेकव्यभिचार हैं । [ वामदेवके विषयमें श्रुति है कि 'गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच' ( गर्भमें ही सोते हुए वामदेवने आत्म-ज्ञानके बलसे अपनी शक्तिका परिचय दिया—मैं मनु हुआ इत्यादि ) इससे यह बात स्पष्ट होती है कि श्रवण न होनेपर भी वामदेवको आत्मज्ञान हुआ । यह कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि गर्भमें उसने श्रवण किया होगा, अत एव उसको आत्मज्ञान हुआ, क्योंकि गर्भमें श्रावयिताके अभावसे यह सब होना असम्भव है । परन्तु यहाँपर यह शङ्का होती है कि गान्धर्वशास्त्रके ( गानशास्त्रके ) श्रवणसे षड्ज आदि स्वरोंका साक्षात्कार होता है, और गान्धर्वशास्त्रका श्रवण न होनेपर उन स्वरोंका साक्षात्कार नहीं होता, यह बात निर्विवाद है, इस परिस्थितिमें श्रोतव्य अर्थविशेषके—स्वरोंके साक्षात्कारके प्रति गान्धर्वशास्त्रविचाररूप श्रवणको कारण माननेकी अपेक्षा लाघवप्रमाणसे 'श्रोतव्य जितने अर्थ हैं उन सभीके साक्षात्कारके प्रति श्रवणमात्र कारण है, ऐसे कार्यकारणभावका ग्रहण करना उचित है, अतः ब्रह्मसाक्षात्कार और वेदान्त-वाक्यश्रवणका विशेषरूपसे कार्यकारणभाव न होनेपर भी सामान्यरूपसे आत्म-साक्षात्कार और वेदान्तश्रवणका परस्पर कार्यकारणभाव है, क्योंकि आत्म-साक्षात्कार श्रोतव्य अर्थका साक्षात्कार है और वेदान्तका विचार श्रवण है, इसलिए श्रोतव्य ( विचारने योग्य ) आत्मरूप अर्थके साक्षात्कारके प्रति वेदान्त-


यदि अन्वयव्यभिचार होगा, तो अनन्यथासिद्ध नहीं होगा, और व्यतिरेकव्यभिचार होगा तो कार्यके अधिकरणमें नहीं रहेगा । प्रकृतमें वेदान्तश्रवणके रहते भी अनेक मनुष्योंको आत्माका साक्षात्कार नहीं होता और वेदान्तश्रवणके अभावमें भी वामदेव ऋषिको आत्माका साक्षात्कार हुआ था, अतः वेदान्तश्रवणमें अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेक-व्यभिचार दोष होनेसे लोकतः वह आत्म-साक्षात्कारके प्रति कारण नहीं है, यह भाव है । इसलिए श्रवणविधिको अपूर्वविधि मानना चाहिए यह प्रकटार्थकार आदिका अभिप्राय है ।

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१२सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ प्रथम परिच्छेदं

श्रोतव्यार्थसाक्षात्कारहेतुः' इति शास्त्रान्तरश्रवणे गृहीतः सामान्यनियमोऽस्ति । येनाऽत्र विशिष्य हेतुत्वग्राहकाभावेऽपि सामान्यमुखेनैव हेतुत्वं प्राप्यत इत्याशङ्क्येत । गान्धर्वादिशास्त्रश्रवणस्य षड्जादिसाक्षात्कारहेतुत्वाभ्युपगमेऽपि कर्मकाण्डादिश्रवणात् तदर्थधर्मादिसाक्षात्कारादर्शनेन व्यभिचारात् । तस्मादपूर्वविधिरेवाऽयम् ।

विचारमें हेतुता प्राप्त ही है, तो 'श्रोतव्यः' यह अपूर्वविधि नहीं हो सकती है*, इस शङ्काका 'न वा' इत्यादिसे परिहार करते हैं ] और श्रोतव्यरूप अर्थके साक्षात्कारके प्रति श्रवणमात्र कारण है, इस प्रकारका सामान्य नियम भी गान्धर्व आदि अन्य शास्त्रके श्रवणमें गृहीत नहीं है, जिससे कि इस स्थलमें विशेषरूपसे हेतुताका ग्रहण करानेवाले प्रमाणके न रहनेपर भी सामान्यरूपसे [ वेदान्तश्रवणमें आत्मसाक्षात्कारकी ] हेतुता प्राप्त होगी, इस प्रकारकी आशङ्का की जाय, क्योंकि षड्ज आदि साक्षात्कारके प्रति गान्धर्व आदि शास्त्रके श्रवणको हेतुरूपसे स्वीकार करनेपर भी कर्मकाण्ड आदि शास्त्रके श्रवणसे उसके धर्म आदि अदृष्ट अर्थका साक्षात्कार नहीं देखा जाता, इसलिए पूर्वकथित सामान्य नियममें व्यभिचार है । इससे 'श्रोतव्यः' यह अपूर्वविधि ही है । [ यद्यपि पूर्वमें सामान्य नियमके विषयमें लाघव बतलाया गया है तो भी धर्मके श्रवणस्थलमें अदृष्ट रूपधर्म अथवा अलौकिक स्वर्गके साधनत्वसे विशिष्ट याग आदि धर्मका, प्रत्यक्षके अयोग्य होनेसे, साक्षात्कार नहीं देखा जाता ] इससे पूर्वोक्त


* षड्जादि सात प्रकारके स्वरोंका संगीतशास्त्रमें वर्णन मिलता है—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और निषाद । इसकी उत्पत्ति श्रुतियोंसे मानी गई है । इस विषयमें संगीतरत्नाकरमें यों कहा गया है—
श्रुतिभ्यः स्युः स्वराः षड्जर्षभगान्धारमध्यमाः ।
पञ्चमो धैवतश्चाथ निषाद इति सप्त ते ॥
षड्जशब्दका लक्षण भी संगीतरत्नाकरके टीकाकारने बतलाया है—
षण्णां स्वराणां जनकः षड्भिर्वा जन्यते स्वरैः ।
षड्भ्यो वा जायतेऽङ्गेभ्यः षड्ज इत्यभिधीयते ॥
इसका अर्थ—इतर छः स्वरोंका कारण, छः स्वरोंसे प्रकाशित होनेवाला अथवा कण्ठ आदि छः स्थानोंसे उत्पन्न होनेवाला स्वर षड्ज कहलाता है । इसी प्रकार ऋषभ आदिके भी लक्षण संगीतरत्नाकरमें [ पृ० ३९ आनन्दाश्रम पूना, संस्करण ] बतलाये गये हैं ।

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विधिविचार ] भाषानुवादसहित १३


भाष्येऽपि 'सहकार्यन्तरविधिः पक्षेण तृतीयं तद्वतो विध्यादिवत्' ( ३-४-४७ ) इत्यधिकरणे 'विद्यासहकारिणो मौनस्य बाल्यपाण्डित्यवद्विधिरेवाऽऽश्रयितव्यः, अपूर्वत्वाद्' इति—पाण्डित्यशब्दशन्दिते श्रवणे अपूर्वविधिरेवाऽङ्गीकृत इति ।

सामान्य कार्यकारणभावमें व्यभिचार दोष है, अतः लाघव अप्रयोजक है अर्थात् लाघवके रहनेपर भी व्यभिचारके भयसे सामान्य नियम नहीं मान सकते । प्रत्युत गान्धर्वशास्त्रश्रवणका और षड्ज आदि साक्षात्कारका परस्पर कार्यकारणभाव है, क्योंकि उन्हींका अन्वय और व्यतिरेक देखनेमें आता है, यह भाव है, और इस विषयमें भाष्यकारकी सम्मति भी देते हैं—'भाष्येऽपि' इत्यादिसे ] ।

भाष्यमें भी 'सहकार्यन्तरविधिः'* इस अधिकरणमें 'विद्याके सहकारी कारण निदिध्यासनकी भी बाल्य और पाण्डित्यके समान विधि ही माननी चाहिए, क्योंकि बाल्य और पाण्डित्यके समान निदिध्यासन भी अपूर्व है अर्थात् विद्याके साधनरूपसे अन्य प्रमाणसे प्राप्त नहीं है' इस प्रकार पाण्डित्य कहलानेवाले श्रवणमें अपूर्वविधिको ही अङ्गीकार किया गया है ।


* इस अधिकरणमें भाष्यका अभिप्राय यह है—बृहदारण्यक उपनिषद्में इस प्रकारकी श्रुति है कि 'तस्मात् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् बाल्यञ्च पाण्डित्यं च निर्विद्य थ मुनिः'—चूँकि भूतकालीन ब्राह्मणोंने श्रवण आदि साधनोंसे आत्माका साक्षात्कार करके सम्पूर्ण विक्षेपोंसे रहित जीवन्मुक्तिका व्यञ्जक परमहंसाश्रम प्राप्त किया था, इससे ब्रह्मसाक्षात्कारके अभिलाषी आधुनिक ब्राह्मण भी पाण्डित्य प्राप्त करके बालभावसे रहनेकी इच्छा करें और बाल्य और पाण्डित्यका सम्पादन करके मुनि—ध्यानशील हों । पण्डाशब्दका अर्थ है—विचार करनेके लिए उपयुक्त साधारण बुद्धि, वह जिस पुरुषको प्राप्त है, वह पण्डितशब्दसे कहा जाता है । उस पण्डितका कार्य पाण्डित्य कहा जाता है । और छोटे बच्चेका जो कृत्य—दम्भ आदिका अभाव है, वह बाल्य कहलाता है, यद्यपि यथेष्ट चेष्टा करना भी बालभाव है, तथापि विद्यामें उपयुक्त न होनेसे उसका यहाँ ग्रहण नहीं करना चाहिए । इसी प्रकार मुनिशब्दका अर्थ—ध्यान है, क्योंकि व्यास प्रभृति ध्याननिष्ठोंमें ही मुनिशब्दका प्रयोग देखा जाता है । और ध्यानके बिना विचार मात्रसे शान्ति रखनेवाले पुरुषमें मुनिशब्दका प्रयोग नहीं देखा जाता । इस परिस्थितिमें जैसे अपूर्व होनेसे श्रवण विधि माना जाता है, वैसे ही विद्याकी उत्पत्तिमें सहकारी कारण मौनकी भी विधि माननी चाहिए, यह भाव है । सूत्रका अर्थ है—तद्वतः—श्रवण और मननके प्रभावसे जिसको तत्त्वनिर्णयरूप विद्या प्राप्त हुई है, ऐसे तत्त्वसाक्षात्कारकी अभिलाषा करनेवाले संन्यासीके लिए पाण्डित्य और बाल्यकी अपेक्षासे तीसरे मौनका-ध्यानका भी विधान किया जाता है । यहाँ-

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१४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

विचारस्य विचार्यार्थनिर्णयं प्रति हेतुता ॥
अपरोक्षप्रमाणस्य तत्साक्षात्कारहेतुता ॥ ५ ॥
प्राप्तैव, किन्त्वनियता भ्रान्तिः प्राप्ताऽन्यसाधनैः ॥
ततो नियम इत्याहुः सर्वे विवरणानुगाः ॥ ६ ॥

विचार विचारणीय अर्थके निश्चयके प्रति हेतु है, इस प्रकार अपरोक्षार्थविषयक प्रमाण अपरोक्षार्थसाक्षात्कारके प्रति हेतु है, यह प्राप्त ही है, किन्तु अनियत प्राप्ति है, अतः अन्य साधनोंके साथ श्रवणकी प्राप्ति होनेसे सन्देह होगा कि यह साधन है अथवा यह ? अतएव विवरणानुयायी सब आचार्य श्रवणको नियमविधि कहते हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥

अन्ये तु—वेदान्तश्रवणस्य नित्यापरोक्षब्रह्मसाक्षात्कारहेतुत्वं न अप्रा-

कुछ लोगोंका मत है कि वेदान्तके श्रवणमें नित्य अपरोक्ष अर्थात् सदा प्रत्यक्षरूपसे भासमान आत्माके साक्षात्कारकी कारणता प्राप्त नहीं है, ऐसा नहीं है, अर्थात् विचारसे युक्त वेदान्तरूप श्रवणमें ब्रह्मसाक्षात्कारकी कारणता


पर यह शङ्का होती है कि ध्यानकी विधि माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जैसे रत्नके यथार्थ स्वरूपकी जिज्ञासा करनेवाला पुरुष स्वयं ही रत्नतत्त्वके ज्ञानके प्रवाहमें अर्थात् रत्नकी ठीक पहचान करनेके लिए बार बार उसके परिदर्शनमें तत्पर होता है, वैसे ही आत्मतत्त्वसाक्षात्कारका अभिलाषी भी स्वयं ही ध्यानमें प्रवृत्त होगा, अतः मौनविधि व्यर्थ है ? इसपर कहते हैं—'पक्षेण' अर्थात् सूत्रकार कहते हैं कि विद्यामें सहकारिभूत मौनकी—निदिध्यासनकी विधिको भी स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि पक्षमें उसकी अप्राप्ति है। यद्यपि साक्षात्कारके लिए मनुष्य स्वतः ध्यानमें प्रवृत्त होता है, तो भी विषयदर्शनके प्रभावसे कदाचित् ध्यानकी अप्राप्तिका भी सम्भव है, अतः मौनविधि अपूर्वविधि नहीं है; परन्तु नियमविधि है, यह सिद्ध होता है। जब नियम-विधि सिद्ध हुई, तो उसके अतिक्रमण करनेपर नियमादृष्टका लाभ नहीं होगा और उसके अलाभसे साक्षात्कारका भी उदय नहीं होगा, इसलिए स्वभावसे प्राप्त विषयदर्शनका प्रयत्नसे निवारण करके ध्यानमें ही प्रवृत्त होता है, यह 'पक्षेण' इसका भाव है। परन्तु ब्रह्मविद्याके प्रकरणमें ध्यानविधि कैसे होगी ? यदि मानोगे, तो वाक्यभेद होगा, इसपर कहते हैं—विद्यादिवत्—अङ्गविधिके समान—जैसे प्रधानविधिके प्रकरणमें अवान्तरवाक्यभेदसे प्रयाजादि अङ्गकी विधि है, वैसे ही ब्रह्मविद्याके अङ्गभूत ध्यान आदिकी भी विधि है, यह भाव है। इस रीतिसे मौन विधिके नियमत्वकी सिद्धि होनेपर भाष्यमें जो 'अपूर्वत्व' शब्दका कथन है, वह पाक्षिक अप्राप्तिके सद्भावमें है। सूत्रके अनुसार 'पक्षमें प्राप्ति नहीं होनेसे' इस प्रकार न कहकर भाष्यमें 'अपूर्वत्वात्' (अपूर्व होनेसे) यह जो कहा है वह श्रवणको अपूर्वविधि बतलानेके लिए कहा गया है, और दृष्टान्त-दार्ष्टान्तिकका सद्भाव केवल अप्राप्तिमात्रमें ही विवक्षित है।

विधिविचार ] भाषानुवादसहित १५


सम् ; अपरोक्षवस्तुविषयकप्रमाणत्वावच्छेदेन साक्षात्कारहेतुत्वस्य प्राप्तेः शाब्दापरोक्षवादे व्यवस्थापनात् । तदर्थमेव हि तत्प्रस्तावः । न च तावता ब्रह्मप्रमाणत्वेनाऽऽपातदर्शनसाधारणब्रह्मसाक्षात्कारहेतुत्वप्राप्तावप्यविद्यानिवृत्त्यर्थमिष्यमाणसत्तानिश्चयरूपतत्साक्षात्कारहेतुत्वं श्रवणस्य न प्राप्तमिति


विधिके बिना भी प्राप्त है, क्योंकि अपरोक्ष वस्तुओंको विषय करनेवाले सभी प्रमाण साक्षात्कारके हेतु हैं, इसका शब्दापरोक्षवादमें ( जिसमें शब्दसे भी अपरोक्ष ज्ञान होता है ऐसा प्रतिपादन किया गया है, उस प्रकरणमें ) प्रतिपादन किया गया है। वेदान्तवाक्य ब्रह्मके अपरोक्ष साक्षात्कारके जनक हैं, इस प्रकारकी वेदान्तोंमें अपरोक्षसाक्षात्कारकी कारणतासिद्धिके लिए ही शाब्दापरोक्षवादका उपक्रम है। [ परन्तु इसपर यह शङ्का होती है कि शाब्दापरोक्षवादमें इसीकी सिद्धि की गई है कि अपरोक्ष वस्तुको विषय करनेवाला प्रमाण अपने विषयकी अपरोक्षप्रमा उत्पन्न करता है, इसलिए वेदान्तवाक्योंमें भी नित्य अपरोक्ष ब्रह्मरूप अपने विषयके सामान्य अपरोक्ष ज्ञानकी कारणता प्राप्त होगी, किन्तु ब्रह्मसत्ताका निश्चयात्मक जो साक्षात्कार है, उसकी कारणता वेदान्तोंमें प्राप्त नहीं होगी, और यह साक्षात्कार अर्थात् ब्रह्मसत्ताका निश्चयात्मक साक्षात्कार विचारविशिष्ट वेदान्तरूप श्रवणसे ही हो सकता है, अन्यथा— यदि ऐसा स्वीकार न किया जाय, तो विचारके बिना भी ब्रह्मसत्ताका निश्चयात्मक साक्षात्कार उत्पन्न होगा। परन्तु ऐसा नहीं देखा जाता । जिसको अविद्याकी निवृत्ति करनी है, उसे तो ब्रह्म-सत्ताका निश्चयात्मक ज्ञान ही अपेक्षित है, क्योंकि साधारण ज्ञानसे अविद्याकी निवृत्ति नहीं हो सकती। इसीसे श्रुतियोंमें बार बार प्रश्न और प्रतिवचनोंसे सत्ता-निश्चयरूप ब्रह्मसाक्षात्कार ही अविद्याका निवर्तक कहा गया है। अतः सत्तानिश्चयरूप ब्रह्मसाक्षात्कारके हेतु रूपसे वेदान्तश्रवण प्राप्त नहीं है, उसीका विधान करनेके लिए 'श्रोतव्यः' यह अपूर्वविधि है, इस प्रकार 'न च' इत्यादिसे शङ्का करते हैं ] यद्यपि वेदान्तवाक्य ब्रह्मज्ञानके साधन हैं, इससे वेदान्तोंमें संशयात्मक और निश्चयात्मक ब्रह्मज्ञानसामान्यके प्रति हेतुता प्राप्त है, तथापि अविद्याकी निवृत्ति करनेमें समर्थ अभिलषित जो ब्रह्मसत्तानिश्चयात्मक साक्षात्कार है, उसके प्रति वेदान्तश्रवण कारण हैं, ऐसा प्राप्त नहीं है, इस प्रकारकी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि

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१६ सिद्धांतलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद


वाच्यम् ; विचारमात्रस्य विचार्यनिर्णयहेतुत्वस्य ब्रह्मप्रमाणस्य तत्सा- क्षात्कारहेतुत्वस्य च प्राप्तौ विचारितवेदान्तशब्दज्ञानरूपस्य श्रवणस्य तद्धेतुत्वप्राप्तेः । न चोक्त उभयतो व्यभिचारः, सहकारिवैकल्येनाऽन्वयव्य-

विचारमात्रमें विचारविषयके निर्णयात्मक ज्ञानके प्रति हेतुता प्राप्त है, और ब्रह्मप्रमाण वेदान्तमें ब्रह्मसाक्षात्कारकी हेतुता प्राप्त है, इससे विचारित वेदान्ता- त्मक शब्दोंसे होनेवाले ज्ञानरूप श्रवणमें भी सत्ता-निश्चयात्मक ब्रह्मसाक्षात्कारकी कारणता प्राप्त ही है। [भाव यह है कि अन्वय और व्यतिरेकसे दो कार्यकारण- भाव प्राप्त हैं—एक तो जिसके विषयमें विचार होता है, वह विचार उस विषयके निर्णयात्मक ज्ञानके प्रति कारण है और दूसरा अपरोक्ष वस्तुके विषयमें प्रवृत्त प्रमाण अपरोक्षसाक्षात्कारके प्रति कारण है, इन दो कार्यकारणभावोंके मिला देनेसे इस स्थलमें विचारित वेदान्तका ज्ञानरूप जो श्रवण है, वह सत्ता- निश्चयरूप ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारण है, यह कार्यकारणभाव सिद्ध होता है, इसलिए सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मसाक्षात्कार विचारे हुए वेदान्तोंके श्रवणसे प्राप्त ही है और उससे अविद्याकी निवृत्ति भी हो सकती है, तो ‘श्रोतव्यः’ यह विधायकशब्द अपूर्व अर्थका विधान नहीं करता, अतः अपूर्वविधि नहीं है] परन्तु यहाँपर शङ्का होती है कि पहले अन्वय और व्यतिरेक व्यभिचार कहा गया है, अर्थात् आत्मसाक्षात्कारके प्रति वेदान्तश्रवण कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वेदान्तश्रवण करनेपर भी अनेक मनुष्योंको आत्मज्ञान नहीं होता और वामदेवको वेदान्तश्रवण न करनेपर भी आत्मज्ञान हुआ था, इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक व्यभिचारके होनेसे विचारित वेदान्तश्रवण भी आत्मसत्ताके निश्चयात्मक ज्ञानके प्रति कारण नहीं हो सकता है। यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अन्य सहकारी कारणके न रहनेसे अन्वय व्यभि- चार दोष नहीं है। [भाव यह है कि आत्मसाक्षात्कारके प्रति केवल वेदान्त- श्रवण ही कारण नहीं है किन्तु चित्तकी एकाग्रता आदि भी कारण हैं। इससे वेदान्तश्रवण करनेपर यदि ब्रह्मसाक्षात्कार नहीं हुआ, तो कल्पना करनी चाहिए कि चित्तकी एकाग्रता आदि जो सहकारी कारण हैं, वे वहाँ नहीं रहे होंगे, इसलिए आत्मसाक्षात्कार नहीं हुआ, अतः अन्वयव्यभिचार नहीं है। इसीसे दण्ड आदि सहकारी कारणके न रहते मिट्टीसे घटके उत्पन्न

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विधिविचार ] भाषानुवादसहित १७


भिचारस्याऽदोषत्वात् । जातिस्मरस्य जन्मान्तरश्रवणात् फलसम्भवेन व्यतिरेकव्यभिचाराभावात् । अन्यथा व्यभिचारेणैव हेतुत्ववाधे श्रुत्याऽपि तत्साधनताज्ञानासम्भवात् । घटसाक्षात्कारे चक्षुरतिरेकेण त्वगिन्द्रियमिव ब्रह्मसाक्षात्कारे श्रवणातिरेकेण उपायान्तरमस्तीति शङ्कायां व्यतिरेकव्यभिचारस्याऽप्यदोषत्वात् । तथा च प्राप्तत्वान्नाऽपूर्वविधिः ।


न होनेपर भी मिट्टीमें अन्वयव्यभिचार नहीं है ।] पूर्वजन्मके वेदान्तश्रवणसे आत्मसाक्षात्काररूप फलका संभव होनेसे पूर्व जन्मका स्मरण करनेवाले वामदेवमें व्यतिरेकव्यभिचार नहीं है । यदि इस रीतिसे अन्वय और व्यतिरेक व्यभिचारका परिहार न माना जाय, तो इन दो व्यभिचारोंसे ही वेदान्तश्रवणमें आत्मसाक्षात्कारकी साधनताका बाध होनेसे श्रुतिसे भी वेदान्तश्रवणमें साक्षात्कारकी साधनताका ज्ञान नहीं हो सकेगा * । [ब्रह्मके साक्षात्कारमें जैसे श्रवण कारण है, वैसे ही तपश्चर्या या उत्तमजन्मप्राप्ति आदि अन्य कारण भी हैं । ऐसी परिस्थितिमें 'वामदेवको उत्तमजन्मप्राप्ति आदि अन्य कारणोंसे ज्ञान उत्पन्न हुआ होगा' इस प्रकारकी शङ्का होनेसे वामदेवमें श्रवणका व्यतिरेकव्यभिचारज्ञान श्रवणकी साक्षात्कारसाधनताका प्रतिबन्धक नहीं हो सकता । एक पदार्थके ज्ञानमें परस्पर निरपेक्ष दो कारणोंके न होनेसे ब्रह्मसाक्षात्कारमें कारणान्तर नहीं है, यह बात नहीं है; क्योंकि लोकमें एक पदार्थके परिज्ञानमें परस्पर निरपेक्ष दो कारण भी देखे जाते हैं, इस भावको 'घटसाक्षात्कारे' इत्यादिसे बतलाते हैं—] जैसे घटके प्रत्यक्षमें चक्षुसे अन्य त्वगिन्द्रिय भी कारण है, वैसे ही ब्रह्मके साक्षात्कारमें श्रवणसे अतिरिक्त अन्य कारण है, इस प्रकारकी शङ्का होनेपर व्यतिरेकव्यभिचार भी दोषावह नहीं है । इससे—विधिके बिना भी श्रवणमें ब्रह्मसाक्षात्कारसाधनताके प्राप्त होनेसे श्रवणविधि अपूर्वविधि नहीं है अर्थात् नियमविधि है ।


* यह निश्चित है कि अन्वयव्यभिचार या व्यतिरेकव्यभिचारके निश्चयसे हेतुत्वका बाध होता है, अतः यदि प्रदर्शित रीतिसे अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेकव्यभिचारका परिहार न किया जाय, तो श्रवणविधिसे भी श्रवणमें तत्त्वज्ञानकी साधनता प्राप्त न होगी, अतः श्रवणकी अपूर्वविधि अप्रमाण होगी, यह भाव है ।

१८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद


अत एव 'आवृत्तिरसकृदुपदेशात्' (४।१।१) इत्यधिकरणभाष्ये 'दर्शनपर्यवसानानि हि श्रवणादीन्यावर्त्यमानानि दृष्टार्थानि भवन्ति, यथाऽवघातादीनि तण्डुलनिष्पत्तिपर्यवसानानि' इति श्रवणस्य ब्रह्मदर्शनार्थस्य दृष्टार्थतया दर्शपूर्णमासिकावघातन्यायप्राप्तावृत्त्युपदेशः। अपूर्वविधित्वे तु स न सङ्गच्छते, सर्वौषधावघातवत्। अग्निचयने—'सर्वौषधस्य पूरयित्वाऽवहन्ति अथैतदुपदधाति' इत्युपधेयोलूखलसंस्कारार्थत्वेन विहितस्याऽवघातस्य दृष्टार्थत्वाभावात् नाऽऽवृत्तिरिति हि तन्त्रलक्षणे (११।१।६) स्थितम्; अतो नियमविधिरेवाऽयम्। तदभावे हि यथा वस्तु किञ्चिच्चक्षुषा वीक्षमाणस्तत्र स्वागृहीते सूक्ष्मे विशेषान्तरे केनचित् कथिते तदवगमाय तस्यैव चक्षुषः पुनरपि सप्रणिधानं व्यापारे प्रवर्तते, एवं मनसा 'अहम्' इति गृह्यमाणे जीवे वेदान्तैरध्ययनगृहीतैरुपदिष्टं निर्विशेषब्रह्मचैतन्यरूपत्व-


इसीसे जैसे तण्डुलकी उत्पत्ति ही जिनका प्रयोजन है, ऐसे अवघात आदि दृष्टार्थक होनेसे जब तक चावल न निकलें तब तक पुनः पुनः किये जाते हैं, वैसे ही साक्षात्कार जिनका प्रयोजन है, ऐसे दृष्टार्थक श्रवण आदिकी ब्रह्मसाक्षात्कारपर्यन्त आवृत्ति होती है, इस प्रकार 'आवृत्तिरसकृदुपदेशात्' इस आवृत्त्यधिकरणके भाष्यमें ब्रह्मसाक्षात्कारके लिए किये गये श्रवणके दृष्टार्थक होनेसे दर्शपूर्णमाससम्बन्धी अवघातन्यायके आधारपर श्रवणादिकी आवृत्तिका उपदेश किया गया है। श्रवणमें यदि अपूर्वविधि मानी जाय, तो सब ओषधियोंके अवघातके समान आवृत्तिका उपदेश सङ्गत न होगा, क्योंकि अग्निचयनमें 'सर्वौषधस्य०' (ऊखलमें सब ओषधियोंको भरकर कूटे अनन्तर उस ऊखलका स्थापन करे) इस प्रकार उपधेय ऊखलके संस्कारके लिए विहित अवघात, दृष्टार्थक न होनेसे, पुनः पुनः नहीं किया जाता, इस प्रकार पूर्वमीमांसाके ग्यारहवें अध्यायमें विचार किया गया है। इससे श्रवणके प्राप्त होनेसे यह नियमविधि ही है। यदि नियमविधि न मानें, तो जैसे किसी रत्न आदि वस्तुका निरीक्षण करनेवाला पुरुष, किसी दूसरेके कहनेपर अपनेसे अदृष्ट उसकी अन्य सूक्ष्म विशेषताका परिज्ञान करनेके लिए, फिर भी उसी चक्षुके सप्रणिधान व्यापारमें प्रवृत्त होता है, वैसे अन्तःकरण द्वारा अहंरूपसे गृहीत जीवमें 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस अध्ययनविधिसे प्राप्त वेदान्तोंसे उपदिष्ट निर्विशेषब्रह्मचैतन्यस्वरूपताका

विधिविचार ] भाषानुवादसहित १९

माकर्ण्य तदवगमाय तत्र सावधानं मनस एव प्रणिधाने कदाचित् पुरुषः प्रवर्तेतेति वेदान्तश्रवणे प्रवृत्तिः पाक्षिकी स्यात् । 'अप्राप्य मनसा सह' इति श्रुतिः 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' 'दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या' इत्यपि श्रवणेनाऽनवहितमनोविषयेति शङ्कासम्भवात् । 

अथवा 'जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः'

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परोक्षज्ञान करनेके अन्तर उसी निर्विशेषस्वरूपके अपरोक्ष परिज्ञानके लिए अवधान पूर्वक मनके प्रणिधानमें ही कदाचित् पुरुष प्रवृत्त होगा, इससे श्रवणमें पाक्षिक प्रवृत्ति होगी । वेदान्तश्रवणके समान मनके व्यापारमें पुरुषकी प्रवृत्ति न होगी, क्योंकि 'अप्राप्य मनसा सह' (सत्य, ज्ञान आदि शब्द शक्तिवृत्तिसे ब्रह्मका प्रतिपादन न करके मनके साथ ही निवृत्त होते हैं- लक्षणावृत्तिका आश्रयण करते हैं) यह श्रुति ब्रह्मकी मनोविषयताका निषेध करती है अर्थात् ब्रह्मका ग्रहण मनसे नहीं हो सकता, यह स्पष्टरूपसे कहती है, अतः मनके व्यापारमें पुरुषकी प्रवृत्ति कैसे होगी ? ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' (मनसे ही ब्रह्म जानना चाहिए) 'दृश्यते०' (सावधान मनसे आत्मा देखा जाता है) इत्यादि श्रुतियोंके सद्भावसे 'मनसा सह' इत्यादि श्रुति अनवहित* मनका अवलम्बन करती है, इस प्रकार कल्पना हो सकती है† । 

अथवा‡ 'जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य०' (बड़े बड़े ऋषियों द्वारा सेवित

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\* अनवहित- एकाग्रतासे रहित ।

† 'निश्चयसम्भवात्' के स्थानमें 'शङ्कासम्भवात्' इस कथनका भाव यह है कि निर्गुण ब्रह्मके साक्षात्कारमें मन करण नहीं है, क्योंकि निर्गुण ब्रह्म औपनिषद- उपनिषत्प्रमाणमात्रसे वेद्य कहा गया है। सोपाधिक आत्माके साक्षात्कारमें भी मन कारण नहीं है, क्योंकि सोपाधिक आत्मसाक्षात्कार नित्यसाक्षिरूप है । इसलिए 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' इसमें 'मनसा' यह जो साधन तृतीया है, वह वाक्यजन्यवृत्तिसाक्षात्कारके प्रति साधनताके अभिप्रायसे है, यह शाब्दापरोक्षवादमें कहा जायगा । इससे- आत्मसाक्षात्कारके प्रति मनके करण न होनेसे 'मनके ही व्यापारमें कदाचित् पुरुषकी प्रवृत्ति होगी' इससे कहा गया नियमविधिका व्यावर्थ्य अयुक्त है ।

‡ इसका तात्पर्य यह है कि व्याकरण आदि छः अङ्गोंके साथ वेदाध्ययन करनेके बाद 'तरति शोकमात्मवित्' (आत्माको जाननेवाला दुःखसे मुक्त हो जाता है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे 'आत्माका यथार्थ ज्ञान मुक्तिका साधन है' यह ज्ञात होता है, परन्तु लोकमें प्रायः देखा जाता है कि साङ्गवेदका अध्ययन करनेपर भी विचारके बिना आत्मतत्त्वज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि अनेक अभिप्रायोंसे आत्मरूप अर्थका प्रतिपादन करनेवाले वेदान्तोंमें तात्पर्यकी

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२०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

इत्यादिश्रवणाद् भिन्नात्मज्ञानात् मुक्तिरिति भ्रमसम्भवेन मुक्तिसाधनज्ञानाय भिन्नात्मविचाररूपे शास्त्रान्तरश्रवणेऽपि पक्षे प्रवृत्तिस्स्यादित्यद्वैतात्मपर-वेदान्तश्रवणनियमविधिरयमस्तु। इहाऽऽत्मशब्दस्य 'इदं सर्वं यदय-

ईश्वरके स्वरूपको जब देखता है, तब ईश्वरकी महत्ताको प्राप्त करता है और शोक-दुःखसे निर्मुक्त हो जाता है ) इत्यादि श्रुतियोंके श्रवणसे जीवसे भिन्न—आत्माके ज्ञानसे मुक्ति होती है, इस प्रकारका भ्रमात्मक ज्ञान हो सकता है। जिनमें परमात्मा जीवसे पृथक् है, ऐसा विचार किया गया है, ऐसे अन्य शास्त्रों—न्याय, सांख्य आदिमें उक्त भ्रमसे ही मुक्तिके साधनीभूत ज्ञानके लिए प्रवृत्ति होगी, इससे अद्वैत आत्मतत्त्वका बोध करानेवाले वेदान्तके श्रवणमें मनुष्यकी प्रवृत्ति पक्षमें होगी, अतः उसकी व्यावृत्ति करनेके लिए यह श्रवणविधि नियमविधि है। प्रकृतमें 'आत्मा वा अरे' इत्यादि श्रुतिमें आत्मशब्द अद्वितीय आत्मपरक है, क्योंकि 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (जो सब यह चारों तरफ देखा जाता है, वह आत्मा


भ्रान्ति हो सकती है अर्थात् विचारके विना वेदान्तोंका ठीक तात्पर्य किसमें है, यह निर्णय नहीं हो सकता। इसलिए मुक्तिके साधनकी अन्वेषणा करनेवाला तथा तत्त्वज्ञानके प्रतिबन्धक तात्पर्याभ्रम और संशय आदिकी निवृत्ति करनेके लिए वेदान्तके विचारमें प्रवृत्त हुआ पुरुष जैसे उत्तरमीमांसाशास्त्रमें प्रवृत्त होता है, वैसे ही न्याय, सांख्य आदि शास्त्रोंमें भी प्रवृत्त होगा; क्योंकि उनमें भी उनके अभिप्रायानुकूल वेदान्तका विचार है। यद्यपि सांख्य आदि शास्त्रोंमें अद्वितीय आत्मतत्त्वका प्रतिपादन नहीं है, तो भी 'जीवभिन्न आत्माका ज्ञान मुक्तिका साधन है' इस प्रकार भ्रमात्मक ज्ञानसे उन शास्त्रोंमें प्रवृत्ति हो सकती है। और 'भिन्नात्मज्ञान मुक्तिका साधन है' ऐसा भ्रमात्मक ज्ञान साङ्गवेदाध्यायीको नहीं होता है, यह भी हम नहीं कह सकते हैं, क्योंकि 'जुष्टं यदा' इत्यादि श्रुतिमें अन्य शब्द पढ़ा गया है, इससे उसको भ्रम हो सकता है। वस्तुतः इस श्रुतिका अर्थ—समीपमात्रसे बुद्धि आदिका प्रवर्त्तक बुद्धि आदिसे वस्तुतः भिन्न [ जीव भिन्न नहीं है, क्योंकि जीव और ब्रह्मका भेद प्रत्यक्ष सिद्ध होनेसे उपदेश व्यर्थ होगा ] और ऋषियोंसे सेवित ईश्वरका आत्मरूपसे जब ज्ञान करता है, तब ईश्वरके वास्तविकरूपकी प्राप्ति करता है और शोकरहित हो जाता है। अतः भ्रमसे शास्त्रान्तरके विचारमें प्रसक्त प्रवृत्तिका निराकरण करनेके लिए 'श्रोतव्यः' यह नियमविधि है। परन्तु 'श्रोतव्यः' इस श्रुतिसे केवल आत्मविचार ही प्राप्त होता है, अद्वैत आत्मविचार प्राप्त नहीं होता, अतः इस श्रुतिसे भिन्नात्मविचारकी व्यावृत्ति कैसे होगी, इस शङ्काको दूर करनेके लिए 'इह' इत्यादि ग्रन्थसे उत्तर देते हैं। इसमें आदिशब्दसे 'आत्मनि ज्ञाते सर्वं विदितं भवति' (आत्माके ज्ञात होनेपर सब विदित होता है) इत्यादि प्रतिज्ञावाक्य लिया जाता है। इससे यह जाना जाता है कि 'आत्मा वा अरे' इत्यादिमें 'आत्मा'से अद्वितीय आत्माका ही ग्रहण है, यह भाव है।

[विधिविचार] भाषानुवादसहितं २१


मात्मा' इत्यादिप्रकरणपर्यालोचनया अद्वितीयात्मपरत्वात्। नहि वस्तुसत्साधनान्तरप्राप्तावेव नियमविधिरिति कुलधर्मः; येन वेदान्तश्रवण-नियमार्थवत्त्वाय नियमादृष्टजन्यस्वप्रतिबन्धककल्मषनिवृत्तिद्वारा सत्तानिश्चय-रूपब्रह्मसाक्षात्कारस्य वेदान्तश्रवणैकसाध्यत्वस्याऽभ्युपगन्तव्यत्वेन तत्र वस्तुतः साधनान्तराभावान्न नियमविधिर्युज्यत इति आशङ्क्येत; किन्तु यत्र साधनान्तरतया सम्भाव्यमानस्य पक्षे प्राप्त्या विधित्सितसाधनस्य पाक्षिक्यप्राप्तिर्निवारयितुं न शक्यते, तत्र नियमविधिः। तावतैवाऽप्राप्तांश-परिपूरणस्य तत्फलस्य सिद्धेः।


है) इस श्रुतिके प्रकरणके पर्यालोचनसे ऐसा ज्ञात होता है।

[ यहाँपर शङ्का होती है कि तण्डुलकी उत्पत्तिमें अवघातके समान नखविदलनकी वस्तुतः साधनरूपसे प्राप्ति है, इससे उसकी निवृत्तिके लिए वहाँ नियमविधि मानना उचित है, परन्तु प्रकृतस्थलमें अद्वितीय आत्माके साक्षात्कारमें भिन्नात्म-विचार वास्तविक साधन नहीं है, अतः प्रकृतमें नियमविधि उसकी व्यावृत्तिके लिए नहीं हो सकती । इसका उत्तर 'नहि' इस ग्रन्थसे देते हैं ] 'वस्तुसत् अन्य साधनकी प्राप्ति रहते ही नियमविधि होती है' यह कोई कुलधर्म नहीं है अर्थात् जैसे कुलक्रमसे प्राप्त धर्मकी आवश्यकता है, वैसे वस्तुसत् अन्य साधनकी प्राप्तिकी आवश्यकता नहीं है, जिससे कि वेदान्त-श्रवणके नियमकी सार्थकताके लिए यह स्वीकार किया जाय कि नियमापूर्वसे उत्पन्न जो ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रतिबन्धकीभूत पापोंका निरसन, उसके द्वारा सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मका अपरोक्षसाक्षात्कार वेदान्तके श्रवणमात्रसे साध्य है, ऐसा मानकर ब्रह्मसाक्षात्कारमें वस्तुतः अन्य साधनका अभाव होनेसे प्रकृतमें नियम-विधि युक्त नहीं है, ऐसी आशङ्का की जाय। किन्तु जहाँपर सम्भावित अन्य-साधनकी पक्षमें प्राप्ति होनेसे विधानके लिए अभीष्ट साधनकी पाक्षिक अप्राप्तिका निवारण नहीं कर सकते हैं, वहाँपर नियमविधि होती है। इसीसे अप्राप्तां-शपरिपूरणरूप नियमविधिके फलकी सिद्धि हो जाती है।


* सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति विधित्सित गुरुके अधीन वेदान्तश्रवणके समान गुरुसे निरपेक्ष वेदान्तश्रवण भी कारण है, इसलिए गुरुके अधीन वेदान्तश्रवणका नियम माना जायगा, परन्तु उसका कोई प्रत्यक्ष फल तो है नहीं। अतः नियमापूर्व मानना होगा। और उससे पापोंकी निवृत्ति होगी और उसके द्वारा नियमादृष्ट ब्रह्मसाक्षात्कारमें साधन होगा, इस प्रकार नियमविधिमें कल्पना करनी होगी।