भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 590 में से

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१६ सिद्धांतलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद


वाच्यम् ; विचारमात्रस्य विचार्यनिर्णयहेतुत्वस्य ब्रह्मप्रमाणस्य तत्सा- क्षात्कारहेतुत्वस्य च प्राप्तौ विचारितवेदान्तशब्दज्ञानरूपस्य श्रवणस्य तद्धेतुत्वप्राप्तेः । न चोक्त उभयतो व्यभिचारः, सहकारिवैकल्येनाऽन्वयव्य-

विचारमात्रमें विचारविषयके निर्णयात्मक ज्ञानके प्रति हेतुता प्राप्त है, और ब्रह्मप्रमाण वेदान्तमें ब्रह्मसाक्षात्कारकी हेतुता प्राप्त है, इससे विचारित वेदान्ता- त्मक शब्दोंसे होनेवाले ज्ञानरूप श्रवणमें भी सत्ता-निश्चयात्मक ब्रह्मसाक्षात्कारकी कारणता प्राप्त ही है। [भाव यह है कि अन्वय और व्यतिरेकसे दो कार्यकारण- भाव प्राप्त हैं—एक तो जिसके विषयमें विचार होता है, वह विचार उस विषयके निर्णयात्मक ज्ञानके प्रति कारण है और दूसरा अपरोक्ष वस्तुके विषयमें प्रवृत्त प्रमाण अपरोक्षसाक्षात्कारके प्रति कारण है, इन दो कार्यकारणभावोंके मिला देनेसे इस स्थलमें विचारित वेदान्तका ज्ञानरूप जो श्रवण है, वह सत्ता- निश्चयरूप ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारण है, यह कार्यकारणभाव सिद्ध होता है, इसलिए सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मसाक्षात्कार विचारे हुए वेदान्तोंके श्रवणसे प्राप्त ही है और उससे अविद्याकी निवृत्ति भी हो सकती है, तो ‘श्रोतव्यः’ यह विधायकशब्द अपूर्व अर्थका विधान नहीं करता, अतः अपूर्वविधि नहीं है] परन्तु यहाँपर शङ्का होती है कि पहले अन्वय और व्यतिरेक व्यभिचार कहा गया है, अर्थात् आत्मसाक्षात्कारके प्रति वेदान्तश्रवण कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वेदान्तश्रवण करनेपर भी अनेक मनुष्योंको आत्मज्ञान नहीं होता और वामदेवको वेदान्तश्रवण न करनेपर भी आत्मज्ञान हुआ था, इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक व्यभिचारके होनेसे विचारित वेदान्तश्रवण भी आत्मसत्ताके निश्चयात्मक ज्ञानके प्रति कारण नहीं हो सकता है। यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अन्य सहकारी कारणके न रहनेसे अन्वय व्यभि- चार दोष नहीं है। [भाव यह है कि आत्मसाक्षात्कारके प्रति केवल वेदान्त- श्रवण ही कारण नहीं है किन्तु चित्तकी एकाग्रता आदि भी कारण हैं। इससे वेदान्तश्रवण करनेपर यदि ब्रह्मसाक्षात्कार नहीं हुआ, तो कल्पना करनी चाहिए कि चित्तकी एकाग्रता आदि जो सहकारी कारण हैं, वे वहाँ नहीं रहे होंगे, इसलिए आत्मसाक्षात्कार नहीं हुआ, अतः अन्वयव्यभिचार नहीं है। इसीसे दण्ड आदि सहकारी कारणके न रहते मिट्टीसे घटके उत्पन्न

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