सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंविधिविचार ] भाषानुवादसहित १५
सम् ; अपरोक्षवस्तुविषयकप्रमाणत्वावच्छेदेन साक्षात्कारहेतुत्वस्य प्राप्तेः शाब्दापरोक्षवादे व्यवस्थापनात् । तदर्थमेव हि तत्प्रस्तावः । न च तावता ब्रह्मप्रमाणत्वेनाऽऽपातदर्शनसाधारणब्रह्मसाक्षात्कारहेतुत्वप्राप्तावप्यविद्यानिवृत्त्यर्थमिष्यमाणसत्तानिश्चयरूपतत्साक्षात्कारहेतुत्वं श्रवणस्य न प्राप्तमिति
विधिके बिना भी प्राप्त है, क्योंकि अपरोक्ष वस्तुओंको विषय करनेवाले सभी प्रमाण साक्षात्कारके हेतु हैं, इसका शब्दापरोक्षवादमें ( जिसमें शब्दसे भी अपरोक्ष ज्ञान होता है ऐसा प्रतिपादन किया गया है, उस प्रकरणमें ) प्रतिपादन किया गया है। वेदान्तवाक्य ब्रह्मके अपरोक्ष साक्षात्कारके जनक हैं, इस प्रकारकी वेदान्तोंमें अपरोक्षसाक्षात्कारकी कारणतासिद्धिके लिए ही शाब्दापरोक्षवादका उपक्रम है। [ परन्तु इसपर यह शङ्का होती है कि शाब्दापरोक्षवादमें इसीकी सिद्धि की गई है कि अपरोक्ष वस्तुको विषय करनेवाला प्रमाण अपने विषयकी अपरोक्षप्रमा उत्पन्न करता है, इसलिए वेदान्तवाक्योंमें भी नित्य अपरोक्ष ब्रह्मरूप अपने विषयके सामान्य अपरोक्ष ज्ञानकी कारणता प्राप्त होगी, किन्तु ब्रह्मसत्ताका निश्चयात्मक जो साक्षात्कार है, उसकी कारणता वेदान्तोंमें प्राप्त नहीं होगी, और यह साक्षात्कार अर्थात् ब्रह्मसत्ताका निश्चयात्मक साक्षात्कार विचारविशिष्ट वेदान्तरूप श्रवणसे ही हो सकता है, अन्यथा— यदि ऐसा स्वीकार न किया जाय, तो विचारके बिना भी ब्रह्मसत्ताका निश्चयात्मक साक्षात्कार उत्पन्न होगा। परन्तु ऐसा नहीं देखा जाता । जिसको अविद्याकी निवृत्ति करनी है, उसे तो ब्रह्म-सत्ताका निश्चयात्मक ज्ञान ही अपेक्षित है, क्योंकि साधारण ज्ञानसे अविद्याकी निवृत्ति नहीं हो सकती। इसीसे श्रुतियोंमें बार बार प्रश्न और प्रतिवचनोंसे सत्ता-निश्चयरूप ब्रह्मसाक्षात्कार ही अविद्याका निवर्तक कहा गया है। अतः सत्तानिश्चयरूप ब्रह्मसाक्षात्कारके हेतु रूपसे वेदान्तश्रवण प्राप्त नहीं है, उसीका विधान करनेके लिए 'श्रोतव्यः' यह अपूर्वविधि है, इस प्रकार 'न च' इत्यादिसे शङ्का करते हैं ] यद्यपि वेदान्तवाक्य ब्रह्मज्ञानके साधन हैं, इससे वेदान्तोंमें संशयात्मक और निश्चयात्मक ब्रह्मज्ञानसामान्यके प्रति हेतुता प्राप्त है, तथापि अविद्याकी निवृत्ति करनेमें समर्थ अभिलषित जो ब्रह्मसत्तानिश्चयात्मक साक्षात्कार है, उसके प्रति वेदान्तश्रवण कारण हैं, ऐसा प्राप्त नहीं है, इस प्रकारकी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि