सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 42, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| १४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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विचारस्य विचार्यार्थनिर्णयं प्रति हेतुता ॥
अपरोक्षप्रमाणस्य तत्साक्षात्कारहेतुता ॥ ५ ॥
प्राप्तैव, किन्त्वनियता भ्रान्तिः प्राप्ताऽन्यसाधनैः ॥
ततो नियम इत्याहुः सर्वे विवरणानुगाः ॥ ६ ॥
विचार विचारणीय अर्थके निश्चयके प्रति हेतु है, इस प्रकार अपरोक्षार्थविषयक प्रमाण अपरोक्षार्थसाक्षात्कारके प्रति हेतु है, यह प्राप्त ही है, किन्तु अनियत प्राप्ति है, अतः अन्य साधनोंके साथ श्रवणकी प्राप्ति होनेसे सन्देह होगा कि यह साधन है अथवा यह ? अतएव विवरणानुयायी सब आचार्य श्रवणको नियमविधि कहते हैं ॥ ५ ॥ ६ ॥
अन्ये तु—वेदान्तश्रवणस्य नित्यापरोक्षब्रह्मसाक्षात्कारहेतुत्वं न अप्रा-
कुछ लोगोंका मत है कि वेदान्तके श्रवणमें नित्य अपरोक्ष अर्थात् सदा प्रत्यक्षरूपसे भासमान आत्माके साक्षात्कारकी कारणता प्राप्त नहीं है, ऐसा नहीं है, अर्थात् विचारसे युक्त वेदान्तरूप श्रवणमें ब्रह्मसाक्षात्कारकी कारणता
पर यह शङ्का होती है कि ध्यानकी विधि माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जैसे रत्नके यथार्थ स्वरूपकी जिज्ञासा करनेवाला पुरुष स्वयं ही रत्नतत्त्वके ज्ञानके प्रवाहमें अर्थात् रत्नकी ठीक पहचान करनेके लिए बार बार उसके परिदर्शनमें तत्पर होता है, वैसे ही आत्मतत्त्वसाक्षात्कारका अभिलाषी भी स्वयं ही ध्यानमें प्रवृत्त होगा, अतः मौनविधि व्यर्थ है ? इसपर कहते हैं—'पक्षेण' अर्थात् सूत्रकार कहते हैं कि विद्यामें सहकारिभूत मौनकी—निदिध्यासनकी विधिको भी स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि पक्षमें उसकी अप्राप्ति है। यद्यपि साक्षात्कारके लिए मनुष्य स्वतः ध्यानमें प्रवृत्त होता है, तो भी विषयदर्शनके प्रभावसे कदाचित् ध्यानकी अप्राप्तिका भी सम्भव है, अतः मौनविधि अपूर्वविधि नहीं है; परन्तु नियमविधि है, यह सिद्ध होता है। जब नियम-विधि सिद्ध हुई, तो उसके अतिक्रमण करनेपर नियमादृष्टका लाभ नहीं होगा और उसके अलाभसे साक्षात्कारका भी उदय नहीं होगा, इसलिए स्वभावसे प्राप्त विषयदर्शनका प्रयत्नसे निवारण करके ध्यानमें ही प्रवृत्त होता है, यह 'पक्षेण' इसका भाव है। परन्तु ब्रह्मविद्याके प्रकरणमें ध्यानविधि कैसे होगी ? यदि मानोगे, तो वाक्यभेद होगा, इसपर कहते हैं—विद्यादिवत्—अङ्गविधिके समान—जैसे प्रधानविधिके प्रकरणमें अवान्तरवाक्यभेदसे प्रयाजादि अङ्गकी विधि है, वैसे ही ब्रह्मविद्याके अङ्गभूत ध्यान आदिकी भी विधि है, यह भाव है। इस रीतिसे मौन विधिके नियमत्वकी सिद्धि होनेपर भाष्यमें जो 'अपूर्वत्व' शब्दका कथन है, वह पाक्षिक अप्राप्तिके सद्भावमें है। सूत्रके अनुसार 'पक्षमें प्राप्ति नहीं होनेसे' इस प्रकार न कहकर भाष्यमें 'अपूर्वत्वात्' (अपूर्व होनेसे) यह जो कहा है वह श्रवणको अपूर्वविधि बतलानेके लिए कहा गया है, और दृष्टान्त-दार्ष्टान्तिकका सद्भाव केवल अप्राप्तिमात्रमें ही विवक्षित है।