सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
१६ सिद्धांतलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
वाच्यम् ; विचारमात्रस्य विचार्यनिर्णयहेतुत्वस्य ब्रह्मप्रमाणस्य तत्सा- क्षात्कारहेतुत्वस्य च प्राप्तौ विचारितवेदान्तशब्दज्ञानरूपस्य श्रवणस्य तद्धेतुत्वप्राप्तेः । न चोक्त उभयतो व्यभिचारः, सहकारिवैकल्येनाऽन्वयव्य-
विचारमात्रमें विचारविषयके निर्णयात्मक ज्ञानके प्रति हेतुता प्राप्त है, और ब्रह्मप्रमाण वेदान्तमें ब्रह्मसाक्षात्कारकी हेतुता प्राप्त है, इससे विचारित वेदान्ता- त्मक शब्दोंसे होनेवाले ज्ञानरूप श्रवणमें भी सत्ता-निश्चयात्मक ब्रह्मसाक्षात्कारकी कारणता प्राप्त ही है। [भाव यह है कि अन्वय और व्यतिरेकसे दो कार्यकारण- भाव प्राप्त हैं—एक तो जिसके विषयमें विचार होता है, वह विचार उस विषयके निर्णयात्मक ज्ञानके प्रति कारण है और दूसरा अपरोक्ष वस्तुके विषयमें प्रवृत्त प्रमाण अपरोक्षसाक्षात्कारके प्रति कारण है, इन दो कार्यकारणभावोंके मिला देनेसे इस स्थलमें विचारित वेदान्तका ज्ञानरूप जो श्रवण है, वह सत्ता- निश्चयरूप ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति कारण है, यह कार्यकारणभाव सिद्ध होता है, इसलिए सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मसाक्षात्कार विचारे हुए वेदान्तोंके श्रवणसे प्राप्त ही है और उससे अविद्याकी निवृत्ति भी हो सकती है, तो ‘श्रोतव्यः’ यह विधायकशब्द अपूर्व अर्थका विधान नहीं करता, अतः अपूर्वविधि नहीं है] परन्तु यहाँपर शङ्का होती है कि पहले अन्वय और व्यतिरेक व्यभिचार कहा गया है, अर्थात् आत्मसाक्षात्कारके प्रति वेदान्तश्रवण कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वेदान्तश्रवण करनेपर भी अनेक मनुष्योंको आत्मज्ञान नहीं होता और वामदेवको वेदान्तश्रवण न करनेपर भी आत्मज्ञान हुआ था, इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक व्यभिचारके होनेसे विचारित वेदान्तश्रवण भी आत्मसत्ताके निश्चयात्मक ज्ञानके प्रति कारण नहीं हो सकता है। यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अन्य सहकारी कारणके न रहनेसे अन्वय व्यभि- चार दोष नहीं है। [भाव यह है कि आत्मसाक्षात्कारके प्रति केवल वेदान्त- श्रवण ही कारण नहीं है किन्तु चित्तकी एकाग्रता आदि भी कारण हैं। इससे वेदान्तश्रवण करनेपर यदि ब्रह्मसाक्षात्कार नहीं हुआ, तो कल्पना करनी चाहिए कि चित्तकी एकाग्रता आदि जो सहकारी कारण हैं, वे वहाँ नहीं रहे होंगे, इसलिए आत्मसाक्षात्कार नहीं हुआ, अतः अन्वयव्यभिचार नहीं है। इसीसे दण्ड आदि सहकारी कारणके न रहते मिट्टीसे घटके उत्पन्न
विधिविचार ] भाषानुवादसहित १७
भिचारस्याऽदोषत्वात् । जातिस्मरस्य जन्मान्तरश्रवणात् फलसम्भवेन व्यतिरेकव्यभिचाराभावात् । अन्यथा व्यभिचारेणैव हेतुत्ववाधे श्रुत्याऽपि तत्साधनताज्ञानासम्भवात् । घटसाक्षात्कारे चक्षुरतिरेकेण त्वगिन्द्रियमिव ब्रह्मसाक्षात्कारे श्रवणातिरेकेण उपायान्तरमस्तीति शङ्कायां व्यतिरेकव्यभिचारस्याऽप्यदोषत्वात् । तथा च प्राप्तत्वान्नाऽपूर्वविधिः ।
न होनेपर भी मिट्टीमें अन्वयव्यभिचार नहीं है ।] पूर्वजन्मके वेदान्तश्रवणसे आत्मसाक्षात्काररूप फलका संभव होनेसे पूर्व जन्मका स्मरण करनेवाले वामदेवमें व्यतिरेकव्यभिचार नहीं है । यदि इस रीतिसे अन्वय और व्यतिरेक व्यभिचारका परिहार न माना जाय, तो इन दो व्यभिचारोंसे ही वेदान्तश्रवणमें आत्मसाक्षात्कारकी साधनताका बाध होनेसे श्रुतिसे भी वेदान्तश्रवणमें साक्षात्कारकी साधनताका ज्ञान नहीं हो सकेगा * । [ब्रह्मके साक्षात्कारमें जैसे श्रवण कारण है, वैसे ही तपश्चर्या या उत्तमजन्मप्राप्ति आदि अन्य कारण भी हैं । ऐसी परिस्थितिमें 'वामदेवको उत्तमजन्मप्राप्ति आदि अन्य कारणोंसे ज्ञान उत्पन्न हुआ होगा' इस प्रकारकी शङ्का होनेसे वामदेवमें श्रवणका व्यतिरेकव्यभिचारज्ञान श्रवणकी साक्षात्कारसाधनताका प्रतिबन्धक नहीं हो सकता । एक पदार्थके ज्ञानमें परस्पर निरपेक्ष दो कारणोंके न होनेसे ब्रह्मसाक्षात्कारमें कारणान्तर नहीं है, यह बात नहीं है; क्योंकि लोकमें एक पदार्थके परिज्ञानमें परस्पर निरपेक्ष दो कारण भी देखे जाते हैं, इस भावको 'घटसाक्षात्कारे' इत्यादिसे बतलाते हैं—] जैसे घटके प्रत्यक्षमें चक्षुसे अन्य त्वगिन्द्रिय भी कारण है, वैसे ही ब्रह्मके साक्षात्कारमें श्रवणसे अतिरिक्त अन्य कारण है, इस प्रकारकी शङ्का होनेपर व्यतिरेकव्यभिचार भी दोषावह नहीं है । इससे—विधिके बिना भी श्रवणमें ब्रह्मसाक्षात्कारसाधनताके प्राप्त होनेसे श्रवणविधि अपूर्वविधि नहीं है अर्थात् नियमविधि है ।
* यह निश्चित है कि अन्वयव्यभिचार या व्यतिरेकव्यभिचारके निश्चयसे हेतुत्वका बाध होता है, अतः यदि प्रदर्शित रीतिसे अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेकव्यभिचारका परिहार न किया जाय, तो श्रवणविधिसे भी श्रवणमें तत्त्वज्ञानकी साधनता प्राप्त न होगी, अतः श्रवणकी अपूर्वविधि अप्रमाण होगी, यह भाव है ।
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१८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
अत एव 'आवृत्तिरसकृदुपदेशात्' (४।१।१) इत्यधिकरणभाष्ये 'दर्शनपर्यवसानानि हि श्रवणादीन्यावर्त्यमानानि दृष्टार्थानि भवन्ति, यथाऽवघातादीनि तण्डुलनिष्पत्तिपर्यवसानानि' इति श्रवणस्य ब्रह्मदर्शनार्थस्य दृष्टार्थतया दर्शपूर्णमासिकावघातन्यायप्राप्तावृत्त्युपदेशः। अपूर्वविधित्वे तु स न सङ्गच्छते, सर्वौषधावघातवत्। अग्निचयने—'सर्वौषधस्य पूरयित्वाऽवहन्ति अथैतदुपदधाति' इत्युपधेयोलूखलसंस्कारार्थत्वेन विहितस्याऽवघातस्य दृष्टार्थत्वाभावात् नाऽऽवृत्तिरिति हि तन्त्रलक्षणे (११।१।६) स्थितम्; अतो नियमविधिरेवाऽयम्। तदभावे हि यथा वस्तु किञ्चिच्चक्षुषा वीक्षमाणस्तत्र स्वागृहीते सूक्ष्मे विशेषान्तरे केनचित् कथिते तदवगमाय तस्यैव चक्षुषः पुनरपि सप्रणिधानं व्यापारे प्रवर्तते, एवं मनसा 'अहम्' इति गृह्यमाणे जीवे वेदान्तैरध्ययनगृहीतैरुपदिष्टं निर्विशेषब्रह्मचैतन्यरूपत्व-
इसीसे जैसे तण्डुलकी उत्पत्ति ही जिनका प्रयोजन है, ऐसे अवघात आदि दृष्टार्थक होनेसे जब तक चावल न निकलें तब तक पुनः पुनः किये जाते हैं, वैसे ही साक्षात्कार जिनका प्रयोजन है, ऐसे दृष्टार्थक श्रवण आदिकी ब्रह्मसाक्षात्कारपर्यन्त आवृत्ति होती है, इस प्रकार 'आवृत्तिरसकृदुपदेशात्' इस आवृत्त्यधिकरणके भाष्यमें ब्रह्मसाक्षात्कारके लिए किये गये श्रवणके दृष्टार्थक होनेसे दर्शपूर्णमाससम्बन्धी अवघातन्यायके आधारपर श्रवणादिकी आवृत्तिका उपदेश किया गया है। श्रवणमें यदि अपूर्वविधि मानी जाय, तो सब ओषधियोंके अवघातके समान आवृत्तिका उपदेश सङ्गत न होगा, क्योंकि अग्निचयनमें 'सर्वौषधस्य०' (ऊखलमें सब ओषधियोंको भरकर कूटे अनन्तर उस ऊखलका स्थापन करे) इस प्रकार उपधेय ऊखलके संस्कारके लिए विहित अवघात, दृष्टार्थक न होनेसे, पुनः पुनः नहीं किया जाता, इस प्रकार पूर्वमीमांसाके ग्यारहवें अध्यायमें विचार किया गया है। इससे श्रवणके प्राप्त होनेसे यह नियमविधि ही है। यदि नियमविधि न मानें, तो जैसे किसी रत्न आदि वस्तुका निरीक्षण करनेवाला पुरुष, किसी दूसरेके कहनेपर अपनेसे अदृष्ट उसकी अन्य सूक्ष्म विशेषताका परिज्ञान करनेके लिए, फिर भी उसी चक्षुके सप्रणिधान व्यापारमें प्रवृत्त होता है, वैसे अन्तःकरण द्वारा अहंरूपसे गृहीत जीवमें 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस अध्ययनविधिसे प्राप्त वेदान्तोंसे उपदिष्ट निर्विशेषब्रह्मचैतन्यस्वरूपताका
विधिविचार ] भाषानुवादसहित १९
माकर्ण्य तदवगमाय तत्र सावधानं मनस एव प्रणिधाने कदाचित् पुरुषः प्रवर्तेतेति वेदान्तश्रवणे प्रवृत्तिः पाक्षिकी स्यात् । 'अप्राप्य मनसा सह' इति श्रुतिः 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' 'दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या' इत्यपि श्रवणेनाऽनवहितमनोविषयेति शङ्कासम्भवात् ।
अथवा 'जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः'
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परोक्षज्ञान करनेके अन्तर उसी निर्विशेषस्वरूपके अपरोक्ष परिज्ञानके लिए अवधान पूर्वक मनके प्रणिधानमें ही कदाचित् पुरुष प्रवृत्त होगा, इससे श्रवणमें पाक्षिक प्रवृत्ति होगी । वेदान्तश्रवणके समान मनके व्यापारमें पुरुषकी प्रवृत्ति न होगी, क्योंकि 'अप्राप्य मनसा सह' (सत्य, ज्ञान आदि शब्द शक्तिवृत्तिसे ब्रह्मका प्रतिपादन न करके मनके साथ ही निवृत्त होते हैं- लक्षणावृत्तिका आश्रयण करते हैं) यह श्रुति ब्रह्मकी मनोविषयताका निषेध करती है अर्थात् ब्रह्मका ग्रहण मनसे नहीं हो सकता, यह स्पष्टरूपसे कहती है, अतः मनके व्यापारमें पुरुषकी प्रवृत्ति कैसे होगी ? ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' (मनसे ही ब्रह्म जानना चाहिए) 'दृश्यते०' (सावधान मनसे आत्मा देखा जाता है) इत्यादि श्रुतियोंके सद्भावसे 'मनसा सह' इत्यादि श्रुति अनवहित* मनका अवलम्बन करती है, इस प्रकार कल्पना हो सकती है† ।
अथवा‡ 'जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य०' (बड़े बड़े ऋषियों द्वारा सेवित
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\* अनवहित- एकाग्रतासे रहित ।
† 'निश्चयसम्भवात्' के स्थानमें 'शङ्कासम्भवात्' इस कथनका भाव यह है कि निर्गुण ब्रह्मके साक्षात्कारमें मन करण नहीं है, क्योंकि निर्गुण ब्रह्म औपनिषद- उपनिषत्प्रमाणमात्रसे वेद्य कहा गया है। सोपाधिक आत्माके साक्षात्कारमें भी मन कारण नहीं है, क्योंकि सोपाधिक आत्मसाक्षात्कार नित्यसाक्षिरूप है । इसलिए 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' इसमें 'मनसा' यह जो साधन तृतीया है, वह वाक्यजन्यवृत्तिसाक्षात्कारके प्रति साधनताके अभिप्रायसे है, यह शाब्दापरोक्षवादमें कहा जायगा । इससे- आत्मसाक्षात्कारके प्रति मनके करण न होनेसे 'मनके ही व्यापारमें कदाचित् पुरुषकी प्रवृत्ति होगी' इससे कहा गया नियमविधिका व्यावर्थ्य अयुक्त है ।
‡ इसका तात्पर्य यह है कि व्याकरण आदि छः अङ्गोंके साथ वेदाध्ययन करनेके बाद 'तरति शोकमात्मवित्' (आत्माको जाननेवाला दुःखसे मुक्त हो जाता है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे 'आत्माका यथार्थ ज्ञान मुक्तिका साधन है' यह ज्ञात होता है, परन्तु लोकमें प्रायः देखा जाता है कि साङ्गवेदका अध्ययन करनेपर भी विचारके बिना आत्मतत्त्वज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि अनेक अभिप्रायोंसे आत्मरूप अर्थका प्रतिपादन करनेवाले वेदान्तोंमें तात्पर्यकी
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| २० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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इत्यादिश्रवणाद् भिन्नात्मज्ञानात् मुक्तिरिति भ्रमसम्भवेन मुक्तिसाधनज्ञानाय भिन्नात्मविचाररूपे शास्त्रान्तरश्रवणेऽपि पक्षे प्रवृत्तिस्स्यादित्यद्वैतात्मपर-वेदान्तश्रवणनियमविधिरयमस्तु। इहाऽऽत्मशब्दस्य 'इदं सर्वं यदय-
ईश्वरके स्वरूपको जब देखता है, तब ईश्वरकी महत्ताको प्राप्त करता है और शोक-दुःखसे निर्मुक्त हो जाता है ) इत्यादि श्रुतियोंके श्रवणसे जीवसे भिन्न—आत्माके ज्ञानसे मुक्ति होती है, इस प्रकारका भ्रमात्मक ज्ञान हो सकता है। जिनमें परमात्मा जीवसे पृथक् है, ऐसा विचार किया गया है, ऐसे अन्य शास्त्रों—न्याय, सांख्य आदिमें उक्त भ्रमसे ही मुक्तिके साधनीभूत ज्ञानके लिए प्रवृत्ति होगी, इससे अद्वैत आत्मतत्त्वका बोध करानेवाले वेदान्तके श्रवणमें मनुष्यकी प्रवृत्ति पक्षमें होगी, अतः उसकी व्यावृत्ति करनेके लिए यह श्रवणविधि नियमविधि है। प्रकृतमें 'आत्मा वा अरे' इत्यादि श्रुतिमें आत्मशब्द अद्वितीय आत्मपरक है, क्योंकि 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (जो सब यह चारों तरफ देखा जाता है, वह आत्मा
भ्रान्ति हो सकती है अर्थात् विचारके विना वेदान्तोंका ठीक तात्पर्य किसमें है, यह निर्णय नहीं हो सकता। इसलिए मुक्तिके साधनकी अन्वेषणा करनेवाला तथा तत्त्वज्ञानके प्रतिबन्धक तात्पर्याभ्रम और संशय आदिकी निवृत्ति करनेके लिए वेदान्तके विचारमें प्रवृत्त हुआ पुरुष जैसे उत्तरमीमांसाशास्त्रमें प्रवृत्त होता है, वैसे ही न्याय, सांख्य आदि शास्त्रोंमें भी प्रवृत्त होगा; क्योंकि उनमें भी उनके अभिप्रायानुकूल वेदान्तका विचार है। यद्यपि सांख्य आदि शास्त्रोंमें अद्वितीय आत्मतत्त्वका प्रतिपादन नहीं है, तो भी 'जीवभिन्न आत्माका ज्ञान मुक्तिका साधन है' इस प्रकार भ्रमात्मक ज्ञानसे उन शास्त्रोंमें प्रवृत्ति हो सकती है। और 'भिन्नात्मज्ञान मुक्तिका साधन है' ऐसा भ्रमात्मक ज्ञान साङ्गवेदाध्यायीको नहीं होता है, यह भी हम नहीं कह सकते हैं, क्योंकि 'जुष्टं यदा' इत्यादि श्रुतिमें अन्य शब्द पढ़ा गया है, इससे उसको भ्रम हो सकता है। वस्तुतः इस श्रुतिका अर्थ—समीपमात्रसे बुद्धि आदिका प्रवर्त्तक बुद्धि आदिसे वस्तुतः भिन्न [ जीव भिन्न नहीं है, क्योंकि जीव और ब्रह्मका भेद प्रत्यक्ष सिद्ध होनेसे उपदेश व्यर्थ होगा ] और ऋषियोंसे सेवित ईश्वरका आत्मरूपसे जब ज्ञान करता है, तब ईश्वरके वास्तविकरूपकी प्राप्ति करता है और शोकरहित हो जाता है। अतः भ्रमसे शास्त्रान्तरके विचारमें प्रसक्त प्रवृत्तिका निराकरण करनेके लिए 'श्रोतव्यः' यह नियमविधि है। परन्तु 'श्रोतव्यः' इस श्रुतिसे केवल आत्मविचार ही प्राप्त होता है, अद्वैत आत्मविचार प्राप्त नहीं होता, अतः इस श्रुतिसे भिन्नात्मविचारकी व्यावृत्ति कैसे होगी, इस शङ्काको दूर करनेके लिए 'इह' इत्यादि ग्रन्थसे उत्तर देते हैं। इसमें आदिशब्दसे 'आत्मनि ज्ञाते सर्वं विदितं भवति' (आत्माके ज्ञात होनेपर सब विदित होता है) इत्यादि प्रतिज्ञावाक्य लिया जाता है। इससे यह जाना जाता है कि 'आत्मा वा अरे' इत्यादिमें 'आत्मा'से अद्वितीय आत्माका ही ग्रहण है, यह भाव है।
[विधिविचार] भाषानुवादसहितं २१
मात्मा' इत्यादिप्रकरणपर्यालोचनया अद्वितीयात्मपरत्वात्। नहि वस्तुसत्साधनान्तरप्राप्तावेव नियमविधिरिति कुलधर्मः; येन वेदान्तश्रवण-नियमार्थवत्त्वाय नियमादृष्टजन्यस्वप्रतिबन्धककल्मषनिवृत्तिद्वारा सत्तानिश्चय-रूपब्रह्मसाक्षात्कारस्य वेदान्तश्रवणैकसाध्यत्वस्याऽभ्युपगन्तव्यत्वेन तत्र वस्तुतः साधनान्तराभावान्न नियमविधिर्युज्यत इति आशङ्क्येत; किन्तु यत्र साधनान्तरतया सम्भाव्यमानस्य पक्षे प्राप्त्या विधित्सितसाधनस्य पाक्षिक्यप्राप्तिर्निवारयितुं न शक्यते, तत्र नियमविधिः। तावतैवाऽप्राप्तांश-परिपूरणस्य तत्फलस्य सिद्धेः।
है) इस श्रुतिके प्रकरणके पर्यालोचनसे ऐसा ज्ञात होता है।
[ यहाँपर शङ्का होती है कि तण्डुलकी उत्पत्तिमें अवघातके समान नखविदलनकी वस्तुतः साधनरूपसे प्राप्ति है, इससे उसकी निवृत्तिके लिए वहाँ नियमविधि मानना उचित है, परन्तु प्रकृतस्थलमें अद्वितीय आत्माके साक्षात्कारमें भिन्नात्म-विचार वास्तविक साधन नहीं है, अतः प्रकृतमें नियमविधि उसकी व्यावृत्तिके लिए नहीं हो सकती । इसका उत्तर 'नहि' इस ग्रन्थसे देते हैं ] 'वस्तुसत् अन्य साधनकी प्राप्ति रहते ही नियमविधि होती है' यह कोई कुलधर्म नहीं है अर्थात् जैसे कुलक्रमसे प्राप्त धर्मकी आवश्यकता है, वैसे वस्तुसत् अन्य साधनकी प्राप्तिकी आवश्यकता नहीं है, जिससे कि वेदान्त-श्रवणके नियमकी सार्थकताके लिए यह स्वीकार किया जाय कि नियमापूर्वसे उत्पन्न जो ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रतिबन्धकीभूत पापोंका निरसन, उसके द्वारा सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मका अपरोक्षसाक्षात्कार वेदान्तके श्रवणमात्रसे साध्य है, ऐसा मानकर ब्रह्मसाक्षात्कारमें वस्तुतः अन्य साधनका अभाव होनेसे प्रकृतमें नियम-विधि युक्त नहीं है, ऐसी आशङ्का की जाय। किन्तु जहाँपर सम्भावित अन्य-साधनकी पक्षमें प्राप्ति होनेसे विधानके लिए अभीष्ट साधनकी पाक्षिक अप्राप्तिका निवारण नहीं कर सकते हैं, वहाँपर नियमविधि होती है। इसीसे अप्राप्तां-शपरिपूरणरूप नियमविधिके फलकी सिद्धि हो जाती है।
* सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मसाक्षात्कारके प्रति विधित्सित गुरुके अधीन वेदान्तश्रवणके समान गुरुसे निरपेक्ष वेदान्तश्रवण भी कारण है, इसलिए गुरुके अधीन वेदान्तश्रवणका नियम माना जायगा, परन्तु उसका कोई प्रत्यक्ष फल तो है नहीं। अतः नियमापूर्व मानना होगा। और उससे पापोंकी निवृत्ति होगी और उसके द्वारा नियमादृष्ट ब्रह्मसाक्षात्कारमें साधन होगा, इस प्रकार नियमविधिमें कल्पना करनी होगी।
२२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
अथवा गुरुमुखाधीनाध्ययनादिव निपुणस्य स्वप्रयत्नमात्रसाध्यादपि वेदान्तविचारात् सम्भवति सत्तानिश्चयरूपं ब्रह्मापरोक्षज्ञानम्, किन्तु गुरुमुखाधीनवेदान्तवाक्यश्रवणनियमादृष्टमविद्यानिवृत्तिं प्रति कल्मषनिरासेनोपयुज्यत इति तदभावेन प्रतिवद्धमविद्यामनिवर्तयत् परोक्षज्ञानकल्पमवतिष्ठते। न च ज्ञानोदये अज्ञानानिवृत्त्यनुपपत्तिः, प्रतिबन्धकाभावस्य सर्वत्राऽपेक्षितत्वेन सत्यपि प्रत्यक्षविशेषदर्शने उपाधिना प्रतिबन्धात् प्रति-
अथवा गुरुमुखसे किये गये वेदान्तविचारके समान व्युत्पन्न पुरुषको केवल अपने प्रयत्नसे किये गये वेदान्तविचारसे भी सत्तानिश्चयरूप ब्रह्मके अपरोक्ष—साक्षात्कारका सम्भव है, परन्तु गुरुमुखसे किये गये वेदान्तवाक्योंके श्रवणसे उत्पन्न हुआ नियमापूर्व कल्मषनिवृत्तिपूर्वक अविद्याकी निवृत्तिके प्रति उपयोगी है, इससे यदि गुरु द्वारा वेदान्तश्रवण न किया जाय—अपने प्रयत्नसे ही किया जाय, तो वेदान्तश्रवणसे कल्मषोंकी निवृत्ति नहीं होगी, अतः कल्मषोंसे प्रतिवद्ध होनेसे अपने प्रयत्नसे किया हुआ निपुणपुरुषका सत्तानिश्चात्मक अपरोक्ष—साक्षात्कार अविद्याकी निवृत्ति न करता हुआ परोक्षज्ञानके सदृश* ही स्थित रहेगा। परन्तु यह असङ्गत है, क्योंकि अज्ञानके उत्पन्न होनेपर अविद्या निवृत्त न हो, यह अनुपपन्न है अर्थात् ज्ञानसे अवश्य ज्ञानकी निवृत्ति होती है, [ कारण कि जो प्रमा होती है वह अपने अज्ञाननिवृत्तिरूपकार्यको उत्पन्न करती ही है, जैसे शुक्तिप्रमासे उसका अज्ञान नष्ट होता है।] नहीं, यह नियम नहीं है कि ज्ञान होनेपर अज्ञान निवृत्त होता है, क्योंकि प्रतिबन्धकके अभावकी † सर्वत्र अपेक्षा होनेसे प्रत्यक्षसे विशेषदर्शनके रहते भी
* यहाँपर मतभेदसे व्यवस्था करनी चाहिए, किसी आचार्यके मतमें नियमादृष्ट कल्मषनिवृत्ति द्वारा ज्ञानोत्पत्तिमें कारण है और किसी आचार्यके मतमें नियमादृष्ट कल्मषनिवृत्ति द्वारा अविद्यानिवृत्तिमें कारण है—अन्यथा पूर्व ग्रन्थमें 'नियमार्थवत्त्वाय' इत्यादिसे कल्मषनिवृत्ति द्वारा ज्ञानकी उत्पत्तिमें नियमादृष्टको कारण बतलाया है और यहाँपर नियमादृष्टको प्रतिबन्धरूप कल्मषकी निवृत्ति द्वारा उत्पन्न ज्ञानसे जननीय अविद्याकी निवृत्तिमें कारण बतलाया है, इससे विरोधका प्रसङ्ग अवश्य आ सकता है।
† यद्यपि वेदान्तसिद्धान्तमें प्रतिबन्धकाभाव कारण नहीं माना गया, तथापि 'अप्रतिबद्ध सामग्री कार्यकी हेतु है' इसका स्वीकार होनेसे विशेषणरूपसे प्रतिबन्धकाभावकी अपेक्षा है, क्योंकि सामग्रीमें अप्रतिबद्ध यह विशेषण है, और इसका अर्थ है—प्रतिबन्धकाभावसहकृत सामग्री, इसलिए विशेषणविधया उसकी अपेक्षा है, यह भाव है—
विधिविचार ] भाषानुवादसहित २३
विभ्रमानिवृत्तिवत् तदनिवृत्त्युपपत्तेः । एवं च लिखितपाठादिनाऽपि स्वाध्यायग्रहणप्रसक्तौ गुरुमुखाधीनाध्ययननियमविधिवत् स्वप्रयत्नमात्रपूर्वकस्याऽपि वेदान्तविचारस्य सत्तानिश्चयरूपब्रह्मसाक्षात्कारार्थत्वेन पक्षे प्राप्तौ गुरुमुखाधीनश्रवणनियमविधिरयमस्तु ।
न च 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्' इति गुरूपसदनविधिनैव उसकी उपाधिसे प्रतिबद्ध होनेके कारण जैसे प्रतिबिम्बके विभ्रमकी निवृत्ति नहीं होती, वैसे ही कल्मषोंसे प्रतिबद्ध सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार भी अविद्याकी निवृत्ति नहीं कर सकता । ऐसा होनेपर अर्थात् गुरुनिरपेक्ष वेदान्तविचाररूप व्यावत्र्यका लाभ होनेपर जैसे लिखित* पाठ आदिसे स्वाध्याय—वेदराशिके ग्रहणकी प्राप्ति होनेपर गुरुमुखाधीन अध्ययनकी नियमविधिसे उसकी—लिखित पाठ आदिकी व्यावृत्ति होती है, वैसे ही सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मसाक्षात्कारके लिए अपने प्रयत्नमात्रसे किये गये वेदान्तविचारकी पक्षमें प्राप्ति होनेपर गुरुमुखाधीन श्रवणकी यह नियमविधि है ।
[ परन्तु स्वप्रयत्नसाध्य वेदान्तविचारकी व्यावृत्ति करनेके लिए 'श्रोतव्यः' यह नियमविधि है, यह कथन असङ्गत है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानके लिए गुरुके पास जानेका श्रुतिमें वर्णन है । और गुरूपगमन ब्रह्मसाक्षात्कारका साक्षात् साधन नहीं है, किन्तु परम्परासे साधन है । इसलिए वह ज्ञानके उत्पादनमें किसी द्वारकी अपेक्षा करेगा और वह द्वार योग्यतासे गुरुके अधीन विचार
* यहाँ सारांश यह है कि चाहे अभ्युदयका अभिलाषी पुरुष हो चाहे निःश्रेयसका अभिलाषी हो दोनोंको वेदार्थका अनुष्ठान करना चाहिए, क्योंकि वेदार्थके अनुष्ठानके बिना अभ्युदय या निःश्रेयसकी सिद्धि नहीं हो सकती है। और अनुष्ठान तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि वेदके अर्थका ठीक ठीक परिज्ञान न हो। वेदके अर्थका परिज्ञान वेदके ग्रहणके बिना नहीं हो सकता। और वेदका ग्रहण दो रीतिसे हो सकता है, एक तो गुरु द्वारा और दूसरा लिखित पाठसे, कारण कि ये दोनों प्रकार लोकमें देखे जाते हैं। इस परिस्थितिमें अध्ययनविधिवाक्य यह काम करता है कि अध्ययनसे ही वेदाक्षर ग्रहण करे। इससे लिखित पाठ आदिकी व्यावृत्ति होती है। इसी तरह प्रकृत स्थलमें भी आत्मसाक्षात्कारके प्रति गुरु द्वारा सम्पादित वेदान्तविचार कारण है और निपुण पुरुषोंसे अपने प्रयत्न द्वारा किया गया वेदान्तविचार भी कारण है। इस अवस्थामें 'श्रोतव्यः' यह नियमविधि स्वप्रयत्न-प्राप्त वेदान्तविचारकी व्यावृत्ति करेगी, अर्थात् इससे यह सिद्ध होगा कि अपने प्रयत्नसे किया गया वेदान्तविचार आत्मसाक्षात्कारमें समर्थ नहीं है, किन्तु गुरुमुख द्वारा सम्पादित वेदान्तश्रवण ही साक्षात्कारमें समर्थ है।
| २४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | प्रथम परिच्छेद |
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गुरुरहितविचारव्यावृत्तिसिद्धेर्विफलो नियमविधिरिति शङ्क्यम्; गुरूप- सदनस्य श्रवणाङ्गतया श्रवणविध्यभावे तद्विधिरेव नास्तीति तेन तस्य वैफल्याप्रसक्तेः । अन्यथा अध्ययनाङ्गभूतोपगमनविधिनेव लिखितपाठा- दिव्यावृत्तिरित्यध्ययननियमोऽपि विफ़लः स्यात् ।
ही होगा। अदृष्टको द्वार नहीं मान सकते, क्योंकि दृष्ट द्वारका सम्भव होने- पर अदृष्टकी कल्पना करना ठीक नहीं है। इससे यह निर्विवाद सिद्ध हो गया कि गुरुसे प्राप्त वेदान्तविचार द्वारा अभिगमनविधिसे ही गुरूपगमन आत्म- साक्षात्कारके प्रति कारण है और इसीसे गुरुरहित वेदान्तविचारकी व्यावृत्ति होगी, तो श्रवणकी नियमविधि निरर्थक है। इस प्रकारका मनमें तात्पर्य रखते हुए शङ्का करते हैं 'न च' इत्यादिसे ] यदि कोई शङ्का करे कि *'तद्विज्ञानार्थम्०' (आत्मतत्त्वके परिज्ञानके लिए उसको गुरुके पास जाना चाहिए) इस प्रकारकी गुरूपसदनविधिसे ही गुरुसे रहित—गुरुके बिना अपने आप किये गये विचारका निरास हो सकता है, तो यह नियम- विधि निरर्थक है? नहीं, इस प्रकारकी आशङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि गुरू- पसदनके श्रवणाङ्ग होनेसे श्रवणविधिके अभावमें गुरूपसदनविधि ही नहीं हो सकती है, इसलिए गुरूपसदनविधिसे श्रवणविधिकी विफलता नहीं प्रसक्त होती। यदि इसे स्वीकार न करें, तो अध्ययनके अङ्गभूत उपगमनके विधानसे ही लिखित पाठ आदिकी व्यावृत्ति होनेसे अध्ययनकी नियमविधि भी विफल हो जायगी।
* 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्' इस श्रुतिके पहले श्रुति है—'ब्राह्मणो निर्वेदमायान्ना- स्त्यकृतः कृतेन' इसका अर्थ है कि ब्राह्मणको वैराग्य करना चाहिए, क्योंकि अकृत—नित्य- स्वरूप जो मोक्ष है, वह कृतेन—अनित्यकर्मसे प्राप्त नहीं हो सकता। अतः मोक्षको ब्रह्म- ज्ञानसाध्य जानकर वैराग्य सम्पन्न ब्राह्मण श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुके पास ब्रह्मज्ञानके लिए जाय, यह 'तद्विज्ञानार्थम्' इत्यादि श्रुतिका अर्थ हुआ। इसमें 'तत्' शब्दसे पहलेकी श्रुतिमें उक्त ब्राह्मणका ही परिग्रह है। यहाँ तात्पर्य यह है—'श्रोतव्यः' यह प्रधान नियमविधि है और इससे गुरुके अधीन विचारका नियमन होता है, इससे विचारके नियमित होनेपर उक्त प्रधानविधिके अङ्गरूपसे गुरूपसदनका विधान होता है, अतः उपगमनविधि अङ्गविधि हुई। एवञ्च यदि प्रधान श्रवणविधि न मानी जाय, तो अप्रधानविधिका स्वरूप ही नहीं बन सकेगा इसलिए उपगमनविधिसे श्रवणविधिकी निरर्थकता सिद्ध नहीं हो सकती है, इस अभि- प्रायसे परिहार किया गया है। यहाँ 'अन्यथा' शब्दका अर्थ है—अङ्गविधिसे प्रधानविधिकी विफलता मानी जाय, तो।
विधिविचार ] भाषानुवादसहित २५
अथवा अद्वैतात्मपरभाषाप्रबन्धश्रवणस्य पक्षे प्राप्त्या वेदान्तश्रवणे नियमविधिरस्तु । न च ‘न म्लेच्छितवै’ इत्यादिनिषेधादेव तदप्राप्तिः; शास्त्रव्युत्पत्तिमान्द्यात् वेदान्तश्रवणमशक्यमिति पुरुषार्थनिषेधमुल्लङ्घ्याऽपि भाषाप्रबन्धेनाऽद्वैतं जिज्ञासमानस्य तत्र प्रवृत्तिसम्भवेन नियमविधेरर्थवत्त्वोप-
अथवा अद्वैत आत्मतत्त्वबोधक भाषा-ग्रन्थोंके श्रवणकी पक्षमें प्राप्ति होनेसे उसकी निवृत्तिके लिए वेदान्तश्रवणमें यह नियमविधि है अर्थात् अद्वैत आत्माकी जिज्ञासा करनेवाला वेदान्तका ही श्रवण—विचार करे, भाषा-ग्रन्थोंका विचार न करे। यदि कोई कहे कि ‘न म्लेच्छितवै’ (भाषा-प्रबन्धरूप अव्यक्त शब्दोंका उच्चारण नहीं करना चाहिए) इत्यादि निषेधशास्त्र-से ही अद्वैतपरक भाषाप्रबन्धोंकी व्यावृत्ति हो जायगी, फिर भाषाप्रबन्धके श्रवणकी व्यावृत्तिके* लिए नियमविधि क्यों मानी जाय ? नहीं, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि शास्त्रीय व्युत्पत्तिकी न्यूनतासे वेदान्तके श्रवणका संभव न होनेसे पुरुषार्थनिषेधका उल्लङ्घन करके भी भाषाग्रन्थोंसे अद्वैत ब्रह्मकी जिज्ञासा करनेवालेकी भाषाप्रबन्धके श्रवणमें प्रवृत्ति हो सकती है, उसकी व्यावृत्तिके लिए नियमविधि सार्थक है । [भाव यह है कि ‘न म्लेच्छितवै’ इत्यादि जो भाषाप्रबन्धका निषेध है वह ज्ञानका अङ्ग नहीं है, पुरुषार्थ है। यदि ज्ञानाङ्ग होता, तो ज्ञानकी अनुत्पत्तिके भयसे उसमें पुरुष प्रवृत्त न होता, परन्तु पुरुषार्थ होनेसे उसका उल्लङ्घन करके महाफल—मोक्षके लिए भाषाप्रबन्धके श्रवणमें प्रवृत्त हो सकता है। भाषाप्रबन्धके श्रवणमें मनुष्यके प्रवृत्त होनेपर पक्षमें वेदान्तश्रवणकी अप्राप्ति होगी, अतः उसके अप्राप्तांशकी परिपूर्तिके लिए श्रवणविधिको नियमविधि मानना चाहिए । पुरुषार्थनिषेधका उल्लङ्घन करके महाफलकी अभिलाषासे निषिद्धमें प्रवृत्ति होती है, इसलिए उसकी निवृत्तिके लिए नियमविधिकी अर्थवत्ता मीमांसकोंने मानी
* यद्यपि नियमविधिका फल अप्राप्तांश परिपूरण ही है इतरव्यावृत्ति नहीं है, क्योंकि यह तो परिसंख्याविधिका फल है, तथापि नियमविधिका फल अयोग-व्यावृत्ति मीमांसकोंने माना है और अन्ययोगव्यावृत्ति परिसंख्याका फल माना है। अतः नियमविधिके फलमें व्यावृत्तिशब्दका प्रयोग कदाचित् आवे, तो अयोगव्यावृत्ति समझना चाहिए ।
४
| २६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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पत्तेः । अभ्युपगम्यते हि कर्त्रधिकरणे व्युत्पादितम्—पुरुषार्थेऽनृतवदननिषेधे सत्यपि दर्शपूर्णमासमध्ये कुतश्चिद्धेतोरङ्गीकृतनिषेधोल्लङ्घनस्याऽविकलां क्रतुसिद्धिं कामयमानस्याऽनृतवदने प्रवृत्तिस्स्यादिति पुनः क्रत्वर्थतया दर्शपूर्णमासप्रकरणे 'नानृतं वदेत्' इति निषेध इति क्रत्वर्थतया निषेधस्याऽर्थवत्त्वम् ।
है,] क्योंकि दर्शपूर्णमासमें * पुरुषार्थरूप असत्यभाषणनिषेधके रहनेपर भी किसी कारणवश निषेधके उल्लङ्घनका अङ्गीकार करके अविकल क्रतुसिद्धिकी अभिलाषा करनेवाला पुरुष अनृतवदनमें (असत्य भाषणमें) प्रवृत्त हो सकता है, इसलिए दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें क्रतुके अङ्गरूपसे 'नानृतं वदेत्' ( असत्य भाषण न करे ) ऐसा निषेध किया गया है, इस प्रकार कर्त्रधिकरणमें क्रत्वर्थरूपसे व्युत्पादित निषेधकी अर्थवत्ताका ( प्रकृतमें भी ) अङ्गीकार किया है ।
* इसका जिस अधिकरणमें विचार किया गया है, उसका नाम है—अनृतवदननिषेधस्य क्रतुधर्मत्वाधिकरण—असत्यभाषणके निषेधमें क्रतुधर्मताका प्रतिपादन करनेवाला अधिकरण; [ अधिकरण उसे कहते हैं, जिसमें संशय, विषय, पूर्वपक्ष, और सङ्गतिका प्रदर्शन करके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया गया हो ] इसका विचार 'अकर्म क्रतुसंयुक्तं संयोगात् नित्यानुवादः स्यात्' इस सूत्रमें है। भावार्थ यह है कि दर्शपूर्णमासके प्रकरणमें 'नानृतं वदेत्' (असत्य भाषण न करे) यह वाक्य सुना जाता है। यहांपर—'यह उपनयनमें नित्य जो अनृतवदन निषेध है, उसका अनुवाद है अथवा अपूर्वविधि है ? इस प्रकारका संशय होनेपर पूर्वपक्षी—कहता है कि क्रतुसंयुक्त—क्रतुप्रकरणमें पठित अकर्म—'नानृतं वदेत्' यह असत्यभाषणनिषेधवाक्य नित्यानुवादः—नित्यानुवादरूप है। किससे ? इससे कि 'संयोगात्' अर्थात् उपनयनकालमें ही 'सत्यं वद' 'धर्मं चर', इस प्रकारके उपदेशसे अनृतवदनका निषेध नित्य ही प्राप्त है, इस प्रकार पूर्वपक्षकी प्राप्ति होनेपर—
सिद्धान्ती—'विधिर्वा संयोगान्तरात्' यह सूत्र कहते हैं, अर्थात् क्रतुप्रकरणमें पठित अनृतवदननिषेध विधि ही है, क्योंकि यह संयोगान्तर—अन्य संयोग है—उद्देश्यका भेद है। तात्पर्य यह है कि उपनयन कालमें जो विधि है, वह पुरुषको उद्देश्य करके प्रवृत्त हुई है और क्रतुप्रकरणमें जो अनृतवदननिषेधविधि है वह क्रतुको उद्देश्य करके प्रवृत्त है, अतः उद्देश्यका भेद होनेसे उक्त निषेधको क्रतुप्रकरणमें विधि ही मानना चाहिए—इस प्रकार सुबोधिनी वृत्तिमें [ पू० मी० सू १२-१३ अ० ३ पा० ४ पृ० १२४ काशीमुद्रित ] विचार किया गया है ।
विधिविचारं ] भाषांनुवादसहितं २७
यद्वा, यथा 'मन्त्रैरेव मन्त्रार्थस्मृतिः साध्या' (पूर्वमी० अ० १ पा० २ अ० ४) इति नियमः, तन्मूलकल्पसूत्रात्मीयग्रहणकवाक्यादीनामपि पक्षे प्राप्तेः; तथा वेदान्तमूलेतिहासपुराणपौरुषेयप्रबन्धानामपि पक्षे प्राप्तिसम्भवान्नियमोऽयमस्तु। सर्वथा नियमविधिरेवायम् ।
'सहकार्यन्तरविधिः' (अ० ३ पा० ४ अधि० १४ सू० ४७) इत्यधिकरणभाष्ये अपूर्वविधित्वोक्तिस्तु नियमविधित्वेऽपि पाक्षिकाप्राप्तिसद्भावात् तदभिप्रायेति तत्रैव 'पक्षेण' इति पाक्षिकाप्राप्तिकथनपरसूत्रपदयोजनेन स्पष्टीकृतमिति विवरणानुसारिणः ।
अथवा जैसे * 'मन्त्रैरेव' ( मन्त्रोंसे ही मन्त्रार्थका स्मरण करे ) यह नियम माना गया है, क्योंकि यदि यह नियम न माना जाय, तो मन्त्रमूलक कल्पसूत्र, आत्मीयग्रहणक वाक्य आदिकी भी पक्षमें प्राप्ति होगी, वैसे ही प्रकृतमें भी वेदान्तमूलक इतिहास, पुराण और पुरुषनिर्मित ग्रन्थोंके श्रवणमें भी पक्षमें प्राप्ति हो सकती है (उसकी निवृत्तिके लिए श्रोतव्यः) यह नियमविधि है। इससे सर्वथा यह नियमविधि ही है।
और 'सहकार्यन्तरविधिः' इत्यादि अधिकरणके भाष्यमें अपूर्वविधिका जो कथन है, वह नियमविधिके रहते भी पाक्षिक अप्राप्तिके सद्भावके अभिप्रायसे है, यह प्रकार पूर्वोक्त अधिकरणके भाष्यमें ही 'पक्षेण' इस शब्दसे पाक्षिक अप्राप्तिके कथनपरक सूत्रके पदके योजनसे स्पष्ट किया गया है, यह विवरणानुसारी लोगोंका मत है ।
- 'मन्त्रैरेव मन्त्रार्थस्मृतिः साध्या' इसका निर्णय पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष द्वारा निम्न रीतिसे किया गया है—पहले पूर्वपक्ष होता है कि 'उरु प्रथस्व' ( हे पुरोडाश तुम प्रचुर परिमाणमें बढ़ो ) इत्यादि जितने मन्त्र प्रयोगोंमें उपयुक्त हैं वे सबके सब केवल अदृष्ट ही उत्पन्न करते हैं—अर्थप्रकाशनके लिए उनका उच्चारण नहीं होता, क्योंकि उरु प्रथन रूप अर्थ ब्राह्मणवाक्यसे भी प्रतीत होता है—'उरु प्रथस्वेति पुरोडाशं प्रथयति' इससे मन्त्रोंका केवल अदृष्ट ही प्रयोजन है, इस प्रकार पूर्वपक्षके प्राप्त होनेपर—
सिद्धान्ती कहते हैं कि यह तुम्हारा पूर्वपक्ष एक दम निरर्थक है, क्योंकि यदि दृष्ट प्रयोजन मिलता हो, तो अदृष्ट प्रयोजन की कल्पना करना धृष्टता है, अतः यागोंमें प्रयुक्त मन्त्रोंका दृष्ट—अर्थोंका अनुस्मरण ही प्रयोजन है, यदि ब्राह्मण वाक्यसे भी मन्त्रार्थस्मरण होता है, यह कहो, तो 'मन्त्रसे ही मन्त्रार्थका स्मरण करना चाहिए' इस प्रकारका जो नियम बनेगा, उसका अदृष्ट प्रयोजन होगा, अतः यह सिद्ध हुआ
| २८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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तथा तदीयाः शब्दस्तु परोक्षज्ञानकृत् पुरा ॥
मननादियुतोऽध्यक्षं कुर्याद्विधुरचित्तवत् ॥ ७ ॥
विवरणानुयायियोंमें से कुछ लोग कहते हैं कि शब्द पहले परोक्ष ज्ञान उत्पन्न करता है तदनन्तर वही शब्द मनन, निदिध्यासनसे युक्त होकर विधुरके चित्तके समान ( अर्थात् जैसे विधुरका चित्त कामिनीपरिभावित होकर कामिनीका अपरोक्ष साक्षात्कार करता है, वैसे ही ) अपरोक्ष साक्षात्कार उत्पन्न करता है ॥ ७ ॥
कृतश्रवणस्य प्रथमं शब्दान्निर्विकित्सं परोक्षज्ञानमेवोत्पद्यते, शब्दस्य परोक्षज्ञानजननस्वभाव्येन क्लृप्तसामर्थ्यानतिलङ्घनात् । पश्चात्तु कृतमनननिदिध्यासनस्य सहकारिविशेषसम्पन्नात् तत एवाऽपरोक्षज्ञानं
[ 'श्रोतव्यः' इस वाक्यसे श्रवणका जो विधान किया जाता है, वह निश्चयात्मक शब्दजन्य परोक्षज्ञानके उद्देश्यसे ही किया जाता है, शब्दजन्य अपरोक्षज्ञानके लिये नहीं किया जाता, क्योंकि शब्द स्वभावसे ही परोक्षज्ञानका जनक होता है और जैसे संस्कारसे सहकृत चक्षु 'स एवायं देवदत्तः' इस प्रत्यभिज्ञाका जनक होता है अथवा भावनाधिक्यसे युक्त वियोगी पुरुषका मन कामिनीके साक्षात्कारका जनक होता है, वैसे ही मनन और निदिध्यासनसे युक्त शब्द अपरोक्षज्ञान जनक भी हो सकता है। इससे यह विधि परोक्षज्ञान अथवा अपरोक्षज्ञानके लिए अपूर्वविधि नहीं है किन्तु नियमविधि है, क्योंकि विधिके बिना भी पूर्वोक्त दो कार्यकारणभावोंके प्रभावसे विचारविशिष्ट वेदान्तात्मकश्रवण प्राप्त है, इसलिए पूर्वोक्त भाषाप्रबन्ध आदिकी व्यावृत्ति करनेके लिए यह नियमविधि ही है इस प्रकार विवरणानुसारियोंके एकदेशियोंके मतका प्रतिपादन करते हैं—'कृतश्रवणस्य' इत्यादि ग्रन्थसे ] वेदान्तश्रवणकर्त्ता पुरुषको प्रथम शब्दसे निश्चयात्मक परोक्ष ज्ञान ही उत्पन्न होता है, क्योंकि परोक्ष ज्ञानके उत्पादनमें ही शब्दकी सामर्थ्य है, इससे अपने निश्चित स्वभावका शब्द उल्लङ्घन नहीं कर सकता। तदनन्तर अर्थात् शब्दसे निश्चयात्मक परोक्ष ज्ञान होनेपर मनन और निदिध्यासन करनेवाले पुरुषको मनन आदि सहकारी कारणोंसे युक्त शब्दसे ही अपरोक्ष ज्ञान होता है। क्योंकि सहकारी कारणकी विचित्रतासे कार्यमें विचित्रता देखी जाती है, इसीसे जैसे 'सोऽयं
कि मन्त्रोंसे ही मन्त्रार्थका अनुस्मरण करना चाहिए। [द्रष्टव्य—अधिकरण न्या० पृ० २५ आनन्दाश्रम मु०] ।
विधिविचार ] भाषानुवादसहित २९
जायते। तत्तांशगोचरज्ञानजननासमर्थस्याऽपीन्द्रियस्य तत्समर्थसंस्कारसाहित्यात् प्रत्यभिज्ञानजनकत्ववत् स्वतोऽपरोक्षज्ञानजननासमर्थस्याऽपि शब्दस्य विधुरपरिभावितकामिनीसाक्षात्कारस्थले तत्समर्थत्वेन क्लृप्तभावनाप्रचयसाहित्यादपरोक्षज्ञानजनकत्वं युक्तम्। ततश्च शब्दस्य स्वतः स्वविषये परोक्षज्ञानजनकत्वस्य भावनाप्रचयसहकृतज्ञानकरणत्वावच्छेदेन विधुरान्तःकरणवदपरोक्षज्ञानजनकत्वस्य च प्राप्तत्वात् पूर्ववन्नियमविधिरिति तदेकदेशिनः।
देवदत्तः' (वही यह देवदत्त है) इत्यादि प्रत्यभिज्ञानात्मकज्ञानके 'तद्' अंशका ग्रहण करनेमें इन्द्रियके समर्थ न होनेपर भी तत्तांशके ज्ञानमें समर्थ संस्कारके सान्निध्यसे—सहभावसे इन्द्रिय—चक्षु—प्रत्यभिज्ञानात्मकज्ञानकी कारण होती है, वैसे ही इस स्थलमें यद्यपि शब्द स्वयं अपरोक्षज्ञानके उत्पादनमें असमर्थ है, तथापि विधुरपुरुष * द्वारा परिभावित कामिनीके साक्षात्कारके समान निश्चित भावनाप्रचयके सहभावसे शब्दमें अपरोक्ष ज्ञानकी जनकता युक्त है। ऐसा सिद्ध होनेपर जनकता स्वरूपतः शब्दमें स्वविषय—वाच्यके परोक्षज्ञानकी जनकता और भावनाधिक्यके सहभावसे ज्ञानकरणमात्रमें विधुरके अन्तःकरणके समान अपरोक्षज्ञानकी जनकता प्राप्त है, अतः पूर्वोक्त विवरणमतके समान यह नियमविधि है—अपूर्वविधि नहीं है। इस प्रकार विवरणके एकदेशियोंका मत है। †
* यह आशय है कि कामिनीकी भावनासे युक्त विधुर पुरुषका अन्तःकरण कामिनीके अपरोक्ष साक्षात्कारमें हेतु रूपसे देखा जाता है, इस स्थलमें बाहरके पदार्थके ग्रहणमें यद्यपि अन्तःकरण स्वतन्त्र नहीं है अर्थात् चक्षु आदि बाह्य इन्द्रियोंकी अपेक्षा करता है, तो भी बाह्य वस्तुकी भावनासे युक्त होकर बाह्य वस्तुके साक्षात्कारमें हेतु होता है, इस प्रकार विशेष कार्य-कारणभावके ग्रहण करनेकी अपेक्षा लाघवसे और बाधकके न होनेसे भावनासहकृत यावत् ज्ञानके करण अपरोक्ष ज्ञानके साधन हैं, इस प्रकार सामान्य कार्य-कारण-भाव मानना उचित है। अतः शब्दके ज्ञान-करण होनेसे भावनाविशिष्ट शब्द भी अपरोक्ष ज्ञानका जनक हो सकता है, इसलिए स्वभावतः शब्द परोक्षज्ञानका कारण है, तो भी भावनासे युक्त होकर वही शब्द अपने विषयका अपरोक्ष साक्षात्कार करेगा, और भावनाविशिष्ट शब्दमें अपरोक्ष साक्षात्कारकी जनकता अप्राप्त नहीं है, परन्तु ऊपरके कार्य-करणभावके बलसे प्राप्त ही है, अतः 'श्रोतव्यः' यह नियमविधि ही है।
† यह एकदेशीका मत युक्त नहीं है, क्योंकि परोक्षज्ञान उत्पन्न करना ही शब्दका
| ३० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेदे |
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अन्ये परोक्ष एवात्मज्ञाने नियममास्थिताः ।
मनसैवेदमाप्तव्यमित्यादिश्रुतिदर्शनात् ॥ ८ ॥
कुछ लोग परोक्ष ज्ञानके उत्पादनमें शब्दकी सामर्थ्य होनेसे 'श्रोतव्यः' को परोक्ष आत्मज्ञानमें ही नियमविधि मानते हैं, क्योंकि 'मनसैवेदमाप्तव्यम्' (यह आत्मतत्त्व मनसे ही प्राप्त करने योग्य है) इत्यादि श्रुति देखी जाती है ॥ ८ ॥
वेदान्तश्रवणेन न ब्रह्मसाक्षात्कारः, किन्तु मनसैव, 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' इति श्रुतेः । 'शास्त्राचार्योपदेशशमदमादिसंस्कृतं मन आत्मदर्शने करणम्' इति गीताभाष्यवचनाच्च । श्रवणं तु निर्विचिकित्सपरोक्षज्ञानार्थमिति तादर्थ्येनैव नियमविधिरिति केचित् ।
वेदान्तके श्रवणसे ब्रह्मसाक्षात्कार नहीं होता, किन्तु अन्तःकरणसे ही होता है, क्योंकि 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' (मनसे ही साक्षात्कार करना चाहिए) इस प्रकारकी श्रुति है, और 'शास्त्राचार्योपदेशशमदमादिसंस्कृतं०' ('तत्त्वमसि' आदि शास्त्र *, आचार्यका उपदेश, शम, दम, तितिक्षा आदिसे शुद्ध हुआ मन ही आत्माके अपरोक्षानुभवमें करण है) ऐसा श्रीमद्भगवद्गीताके भाष्यमें वचन भी है। श्रवणका फल तो निश्चयात्मक परोक्षज्ञान ही है, इसलिए निश्चयात्मक शब्दजन्य परोक्षज्ञानरूप प्रयोजनके लिए श्रवणकी नियमविधि है, इस प्रकार कोई लोग कहते हैं † ।
स्वभाव है, यह बात नहीं है। इसीलिए ज्ञानमें रहनेवाला परोक्षत्वधर्म किसी कारणविशेषसे प्राप्त होता है, इसका खण्डन किया जायगा, अतः शाब्दजन्य अपरोक्षज्ञानके प्रति मनन आदिके समान श्रवणकी विधि भी अयुक्त नहीं है, इसलिए एकदेशी, ऐसा कहा गया है।
* आचार्यका उपदेश—आचार्य द्वारा किया गया वाक्यार्थोंका विवरण अर्थात् 'तत्त्वमसि' आदि अद्वैतपरक वाक्योंके अर्थोंका स्पष्ट रीतिसे प्रतिपादन।
† इस मतमें पूर्व मतसे इतना विशेष है कि यहाँ ब्रह्मसाक्षात्कार मानस—मनसे होनेवाला कहा गया है, अतः मनकी सहकारितारूपसे मनन और निदिध्यासनमें विधि है और पूर्व मतमें ब्रह्मसाक्षात्कार शाब्द—शब्दसे होनेवाला कहा गया है, इसलिए शाब्दज्ञानके कारण शब्दकी सहकारितारूपसे मनन और निदिध्यासनमें विधि है।
विधिविचार ] भाषानुवादसहित ३१
गान्धर्वशास्त्रवत् चित्तसहकारितयेष्यते ॥
आत्माऽपरोक्षे श्रवणं, तत्रैव नियमम्परे ॥ ९ ॥
जैसे षड्ज आदिका अपरोक्षज्ञान अन्तःकरणकी सहकारिता द्वारा गान्धर्वशास्त्रसे उत्पन्न होता है, वैसे ही अन्तःकरणकी सहकारितासे श्रवण आत्माका अपरोक्षज्ञान उत्पन्न कर सकता है, अतः अपरोक्षज्ञानके लिए ही श्रवणको नियमविधि मानते हैं, इस प्रकार भी कुछ लोगोंका मत है ॥ ९ ॥
अपरोक्षज्ञानार्थत्वेनैव श्रवणे नियमविधिः; 'द्रष्टव्यः' इति फलकीर्तनात् । तादर्थ्यं च तस्य करणभूतमनःसहकारितयैव, न साक्षात् । शब्दादपरोक्षज्ञानानङ्गीकरणात् ।
न च तस्य तेन रूपेण तादर्थ्यं न प्राप्तमित्यपूर्वविधित्वप्रसङ्गः । श्रावणेपु षड्जादिषु समारोपितपरस्पराविवेकनिवृत्त्यर्थं गान्धर्वशास्त्रश्रवण-
अपरोक्ष ब्रह्मसाक्षात्कारके लिए ही श्रवणमें नियमविधि है, क्योंकि 'द्रष्टव्यः' इस प्रकार श्रवणके फलका कथन है [भाव यह है 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि वाक्यसे विहित श्रवण आदिका 'द्रष्टव्य' शब्दसे दर्शन ही फल कहा गया है और दर्शनशब्दका प्रयोग साक्षात्कार ज्ञानमें ही होता है ।] और श्रवणमें अपरोक्षज्ञानार्थता करणभूत मनकी सहकारितासे ही हो सकती है साक्षात् नहीं हो सकती, क्योंकि शब्दसे अपरोक्ष—साक्षात्कार नहीं होता और उसका अङ्गीकार भी नहीं किया गया है ।
परन्तु यह तुम्हारा कथन तभी युक्त हो सकता है, जब वेदान्तश्रवणमें साक्षात्कारके करणभूत मनकी सहकारिता रूपसे अपरोक्षानुभवार्थता कहीं प्राप्त देखी गई हो, परन्तु वह किसी प्रमाणसे प्राप्त ही नहीं है, इसलिए यह नियमविधि नहीं है, प्रत्युत अपूर्वविधि ही है, यदि इस प्रकार कोई शङ्का करे तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि श्रोत्रेन्द्रियजन्य प्रत्यक्षकेविषयीभूत अर्थात् कानसे प्रत्यक्ष किये जानेवाले षड्ज* आदि ध्वनिविशेषोंमें
* षड्ज आदि स्वरोंका पूर्वमें निरूपण किया जा चुका है, जिसने सङ्गीतशास्त्रका अभ्यास न किया हो, ऐसे पुरुषको स्वरोंका विशदरूपसे भान नहीं होता, परन्तु सभी स्वर एकसे प्रतीत होते हैं—उन स्वरोंका परस्पर भेद प्रतीत नहीं होता है और गन्धर्व-शास्त्रका अभ्यास करनेपर उन स्वरोंका ठीक ठीक भेद प्रतीत होता है, इसी प्रकार मनसे, जो भीतर की इन्द्रिय है, अनुभव किये जानेवाले शरीर, प्राण और चिदात्मा आदिमें परस्पर
३२ सिद्धान्तलेशसंग्रह प्रथम परिच्छेद
सहकृतश्रोत्रेण परस्परासङ्कीर्णतयाथार्थ्यापरोक्ष्यदर्शनेन प्रकाशमाने वस्तुन्यारोपिताविवेकनिवृत्त्यर्थशास्त्रसद्भावे तच्छ्रवणं तत्साक्षात्कारजनकेन्द्रियसहकारिभावेनोपयुज्यते इत्यस्य कॢप्तत्वादित्यपरे ।
ऊहापोहात्मिका चित्तक्रियैव श्रवणं विधेः ।
अपरोक्षं परोक्षं वा नाऽमानस्यास्य तत्फलम् ॥ १० ॥
तस्मात् पुन्दोषतात्पर्यभ्रान्तिसंस्कारशान्तये ।
नियमोऽस्येति सङ्क्षेपशारीरककृतो विदुः ॥ ११ ॥
ऊहापोहात्मक मानसिक क्रिया ही श्रवण है, अतः अप्रमाणरूप इस श्रवणकी विधिसे आत्माका अपरोक्ष या परोक्षज्ञानलक्षण फल नहीं हो सकता है, इससे पुरुषगत तात्पर्यभ्रम या उसके संस्कार आदि दोषोंकी शान्तिके लिए यह श्रवण नियम विधि है, ऐसा संक्षेपशारीरककार—सर्वज्ञात्ममुनि मानते हैं ॥ १० ॥ ११ ॥
वेदान्तवाक्यानामद्वितीये ब्रह्मणि तात्पर्यनिर्णयानुकूलन्यायविचारा-
अज्ञानसे—गन्धर्वशास्त्रके अनभ्यासप्रयुक्त अज्ञानसे आरोपित जो परस्पर एकरूपता है, उसकी निवृत्तिके लिए गान्धर्वशास्त्रीय विचारसहकृत श्रोत्रसे उन षड्जादि स्वरोंकी परस्पर असंकीर्णता और यथार्थ अपरोक्षताका दर्शन होनेसे प्रकाशमान वस्तुमें आरोपित अविवेकनिवृत्तिरूप प्रयोजनवाले शास्त्रके सद्भावमें उस शास्त्रका श्रवण प्रकाशमान वस्तु साक्षात्कारकी कारण इन्द्रियके सहभावसे साक्षात्कारका हेतु हो सकता है, इस प्रकार वेदान्तश्रवणमें साक्षात्कार करणभूत इन्द्रियकी सहकारिता निश्चित है, अतः विधिके बिना भी प्राप्त होनेसे यह अपूर्वविधि नहीं है, प्रत्युत नियमविधि है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं।
वेदान्तवाक्योंका अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य * निश्चय करानेवाला न्याय-विचारात्मक जो अन्तःकरणका परिणामरूप श्रवण है, उसका ब्रह्ममें परोक्ष
भेद प्रतीत नहीं होता—एकरूपता प्रतीत होती है, यह सभीके अनुभवसिद्ध है, इसलिए यहाँ भी विचारवान् पुरुष षड्जादि स्वरोंके साक्षात्कारके दृष्टान्तसे कल्पना करता है कि यदि आरोपनिवर्तक शास्त्र है, तो उस आरोपनिवर्तक शास्त्रके सहकारसे आन्तर इन्द्रिय ही बुद्धि आदिसे विविक्त आत्माका, जो ब्रह्मरूपसे वेदान्तोंसे प्रतीत होता है, साक्षात्कार करावेगा । इसी भावको 'प्रकाशमान' इत्यादिसे व्यक्त करते हैं ।
* प्रमेयकी असम्भावनाका निवर्तक जो मनन है उसमें अतिव्याप्ति वारण करनेके लिए
विधिविचार ] भाषानुवादसहित ३३
त्मकचेतोवृत्तिविशेषरूपस्य श्रवणस्य न ब्रह्मणि परोक्षमपरोक्षं वा ज्ञानं फलम्, तस्य शब्दादिप्रमाणफलत्वात् । न चोक्तरूपविचारावधारिततात्पर्य-विशिष्टशाब्दज्ञानमेव श्रवणमस्तु तस्य ब्रह्मज्ञानं फलं युज्यत इति वाच्यम्, ज्ञाने विध्यनुपपत्तेः । श्रवणविधेर्विचारकर्तव्यताविधायकजिज्ञासासूत्रमूलत्वो-
या अपरोक्ष फल नहीं है, क्योंकि परोक्ष या अपरोक्ष ज्ञानरूप फल शब्द आदि प्रमाणोंसे ही उत्पन्न होता है। परन्तु यहाँ यह 'श्रवणशब्दका अर्थ नहीं है, प्रत्युत अद्वैत ब्रह्ममें वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य करानेवाले न्याय-विचारोंसे निश्चित तात्पर्यसे युक्त जो शाब्दज्ञान—शब्दजनित ज्ञान—है, वही प्रकृतमें श्रवण पदार्थ है, और उससे ब्रह्मज्ञानरूप फल हो सकता है, इस प्रकारकी शङ्का नहीं करनी चाहिए। क्योंकि ज्ञानमें विधिकी उपपत्ति नहीं हो सकती अर्थात् श्रवणके ज्ञानरूप होनेसे ज्ञानात्मक श्रवणकी विधि नहीं होगी—ज्ञान विषयतन्त्र है विधेय नहीं है। और श्रवणविधि विचार-कर्तव्यताके † विधायक जिज्ञासासूत्रकी मूल है, ऐसा स्वीकार भी किया
तात्पर्यनिर्णयानुकूल कहा। तात्पर्यका निश्चय करनेमें उपक्रम और उपसंहारका ऐक्य, अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति इन छःकी आवश्यकता होती है, इसी अर्थमें प्रामाणभूत एक श्लोक भी है—
उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम् ।
अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्यनिर्णये ॥
छान्दोग्यके षष्ठ अध्यायमें 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' इस प्रकार अद्वितीय ब्रह्मका उपक्रम करके 'ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्' इस प्रकार उपसंहार किया गया है, इसलिए वहाँके सम्पूर्ण सन्दर्भका तात्पर्य उपक्रम और उपसंहारके ऐक्यसे अद्वितीय ब्रह्ममें ही है। 'तत्त्वमसि' इस वाक्यका नौ वार पाठ है, इसलिए अभ्यासरूप तात्पर्यलिङ्गसे इसका अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य माना गया है। 'यं वै सोम्य' इत्यादिसे अन्य प्रमाणोंके अयोग्यत्वकथनसे अपूर्वरूप लिङ्गसे अद्वितीय ब्रह्मका निश्चय होता है। 'तस्य तावदेव' इत्यादिका तात्पर्य भी अद्वितीय ब्रह्ममें है, क्योंकि विदेहकैवल्य-रूप फलका कथन है। 'अनेन जीवेन' इसका अर्थवादरूप प्रमाणसे अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य निश्चित होता है, 'एकेन मृत्पिण्डेन' इत्यादिका उपपत्तिसे अद्वितीय ब्रह्ममें तात्पर्य निर्णीत होता है।
अन्तःकरणके वृत्तिविशेषके कथनसे यत्नसाध्य क्रियावृत्तिकी विवक्षा है। तदसाध्य ज्ञानरूप वृत्तिकी विवक्षा नहीं है, क्योंकि ज्ञान विधिके अयोग्य है। मूलमें 'ब्रह्मणि' यह सप्तमी विषयार्थक है, इसलिये ब्रह्मविषयक परोक्ष या अपरोक्ष फल श्रवणका नहीं हो सकता, यह पूर्वपक्षका भाव है।
† ब्रह्मजिज्ञासासूत्र है—'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' । इसका अर्थ है कि वैराग्य आदि साधन-
| ३४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेदं. |
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पगमाच्च । ऊहापोहात्मकमानसिकक्रियारूपविचारस्यैव श्रवणत्वौचित्यात् । न च विचारस्यैव तात्पर्यनिर्णयद्वारा, तज्जन्यतात्पर्यभ्रमादिपुरुषापराध- रूपप्रतिबन्धकविगमद्वारा वा ब्रह्मज्ञानं फलमस्त्विति वाच्यम्, तात्पर्यज्ञानस्य
गया है । इसलिए ऊहापोहात्मक ‡ मानसिक क्रियारूप विचारको ही श्रवण मानना उचित है ।
अब यह शङ्का होती है कि परम्परया—तात्पर्यके निश्चय द्वारा अथवा विचारजन्य तात्पर्यभ्रम आदि पुरुषके दोषोंके निरसन द्वारा विचारका भी ब्रह्मज्ञान फल हो सकता है, फिर श्रवणसे ब्रह्मविषयक परोक्ष ज्ञान या अपरोक्ष ज्ञान नहीं हो सकता यह कहना असङ्गत है [शङ्काका भावार्थ यह है कि 'सदेव सोम्य' 'तत् सत्यम् स आत्मा' (हे सोम्य ! पहले यह सद्रूप था, वह सत्यस्वरूप है वह आत्मा है) इस प्रकार 'सदेव' से लेकर 'स आत्मा तत्त्वमसि' तक वाक्यसमूह अद्वैत आत्मपरक है, अद्वैतप्रतिपादक उपक्रम और उपसंहारका ऐक्य होनेसे, इस रीतिके विचारका अनुमितिरूप अद्वैत तात्पर्यका निश्चय साक्षात्—अव्यवहित फल है—इसके द्वारा और जो प्रतिबन्धक दोष हैं, उनका निवर्तन भी विचारका फल है । इनके द्वारा विचार भी ब्रह्मज्ञानका हेतु बन सकता है, इसलिए जैसे ज्ञान शब्द आदि प्रमाणोंका फल है, वैसे ही विचारका भी तात्पर्यनिर्णय द्वारा अथवा तज्जन्य प्रतिबन्धकोंके निरास द्वारा फल हैं इससे 'श्रवणस्य न ब्रह्मणि परोक्षमपरोक्षं वा ज्ञानं फलम्' इत्यादि उक्ति असङ्गत है, इसपर उत्तर देते हैं—उक्त शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि] तात्पर्यज्ञान शाब्दबोधमें कारण है, इस प्रकारके कार्यकारण-भावका स्वीकार नहीं किया गया है और प्रतिबन्धकके अभावका कहींपर भी
सम्पत्तिके अनन्तर मनुष्यको ब्रह्मके अपरोक्ष ज्ञानके लिए वेदान्तविचार करना चाहिए, क्योंकि सूत्रमें कहे गये जिज्ञासाशब्दकी विचारमें लक्षणा है और इस जिज्ञासासूत्रका मूल है 'श्रोतव्यः' इत्यादि वाक्य । इससे श्रवणका अर्थ यदि ज्ञान मान लिया जाय, तो 'श्रोतव्यः' इसका 'श्रवणरूप ज्ञान करना चाहिए'—यह अर्थ होगा। इस परिस्थितिमें जिज्ञासासूत्र और श्रोतव्यवाक्यका परस्पर मूलमूलिभाव अर्थात् प्रयोज्यप्रयोजकभाव नहीं होगा, क्योंकि दोनोंकी एकार्थता नहीं है, इसलिए यदि 'श्रोतव्यः' यह श्रुति जिज्ञासासूत्रका मूल है, तो श्रवणका अर्थ हम ज्ञान नहीं कर सकते, यह भाव है ।
‡ ऊह—न्यायाभासोंको—दुष्ट न्यायोंको—हटाकर निर्दुष्ट न्यायोंका प्रदर्शन ।
अपोह—न्यायाभासका निराकरण ।
विधिविचार ] भाषानुवादसहिते ३५
शाब्दज्ञाने कारणत्वानुपगमात्, कार्ये क्वचिदपि प्रतिबन्धकाभावस्य कारण-
कारणरूपसे स्वीकार नहीं किया गया, अतः तात्पर्यज्ञानमें और विचारसे होनेवाले प्रतिबन्धकाभावमें द्वारत्वकी उपपत्ति ही नहीं हो सकती है—भाव यह है कि वेदान्तसिद्धान्तमें शाब्दबोधके प्रति तात्पर्यज्ञान और प्रतिबन्धकका (प्रतिबन्धक उसे कहते हैं जो कार्यकी उत्पत्ति न होने दे ) अभाव कार्यमात्रके प्रति कारण नहीं माने गये हैं, इसलिए उनके द्वारा विचार ब्रह्मज्ञानका, जो शब्द प्रमाणका फल है, कारण नहीं हो सकता, क्योंकि द्वार शब्दका अर्थ है—'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्वम्' अर्थात् जो स्वयं कारणसे उत्पन्न होकर कारणसे उत्पन्न होनेवाले कार्यके प्रति कारण हो, जैसे घटके प्रति दण्ड कारण होता है, इसमें द्वार है—भ्रमि, भ्रमि दण्डसे उत्पन्न होती है और दण्डसे उत्पन्न होनेवाले घटके प्रति कारण है, इसलिए भ्रमिमें द्वारता है । प्रकृतमें जब शाब्दबोधके प्रति तात्पर्यज्ञान * और कार्यके प्रति प्रतिबन्धकाभाव † कारण ही नहीं हैं, तब
* शाब्दबोधके प्रति यदि तात्पर्यज्ञान कारण माना जाय, तो शुक (सुग्गा) से कहे गये शब्दसे शाब्दबोध न होगा, क्योंकि वहाँ वक्ताके तात्पर्यका अभाव है और लोकमें व्यवहार भी होता है—'शुक आदिके शब्दसे अर्थका बोध होता है, लेकिन वहाँ तात्पर्य नहीं है' इससे शाब्दबोधके प्रति तात्पर्यज्ञान हेतु नहीं है, यह स्पष्टतः ज्ञात होता है । 'वहाँ भी ईश्वरका तात्पर्य है' इस प्रकारकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि ईश्वरके तात्पर्यकी शाब्दबोधरूप फलके बाद कल्पना होगी, पहले तो ईश्वरतात्पर्य दुर्बोध ही है, शब्दके सान्निध्यसे भी तात्पर्यका निर्णय नहीं कर सकते, क्योंकि 'अहो ! विमलं जलं नद्याः कच्छे महिषाश्चरन्ति' इत्यादिमें 'नद्याः' का सन्निधान जल और कच्छके साथ एकसा है और 'पय लाओ' ऐसा कहनेपर 'जल' या 'दूध' इस प्रकार प्रश्न होनेसे यह कल्पना अवश्य होती है—वक्ताके तात्पर्यका परिज्ञान न रहनेपर भी शाब्दबोध होता है, इसलिए शाब्दज्ञानमें तात्पर्यज्ञान कारण नहीं है, ऐसा प्रतीत होता है ।
† प्रतिबन्धकाभाव कार्यमें कारण नहीं है, इसमें युक्ति यह है कि प्रतिबन्धकाभावको कार्यकी सामग्रीमें अन्तर्भाव नहीं कर सकते, क्योंकि 'सामग्रीके रहनेपर भी प्रतिबन्धकके रहनेसे कार्य उत्पन्न नहीं हुआ' इस प्रकार व्यवहार देखा जाता है, यदि सामग्रीके अन्दर प्रतिबन्धकाभावका समावेश होता, तो प्रतिबन्धकसे कार्यकी उत्पत्ति नहीं हुई, इस प्रकार न बोलते । इससे यह ज्ञात होता है कि अप्रतिबद्ध सामग्री कार्यके प्रति कारण है। इस अवस्थामें अप्रतिबद्ध-प्रतिबन्धकाभावयुक्त, यह सामग्रीका विशेषण हुआ अर्थात् सामग्रीकी कारणताका अवच्छेदक—विशेषण हुआ। जो कारणताका अवच्छेदक होता है, वह कार्यका कारण नहीं होता, क्योंकि वह अन्यथासिद्ध होता है। इसीलिए घट के प्रति दण्डत्व कारण नहीं है, परन्तु दण्ड कारण है, प्रकृतमें भी प्रतिबन्धकाभावके