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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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२४सिद्धान्तलेशसंग्रहप्रथम परिच्छेद

गुरुरहितविचारव्यावृत्तिसिद्धेर्विफलो नियमविधिरिति शङ्क्यम्; गुरूप- सदनस्य श्रवणाङ्गतया श्रवणविध्यभावे तद्विधिरेव नास्तीति तेन तस्य वैफल्याप्रसक्तेः । अन्यथा अध्ययनाङ्गभूतोपगमनविधिनेव लिखितपाठा- दिव्यावृत्तिरित्यध्ययननियमोऽपि विफ़लः स्यात् ।

ही होगा। अदृष्टको द्वार नहीं मान सकते, क्योंकि दृष्ट द्वारका सम्भव होने- पर अदृष्टकी कल्पना करना ठीक नहीं है। इससे यह निर्विवाद सिद्ध हो गया कि गुरुसे प्राप्त वेदान्तविचार द्वारा अभिगमनविधिसे ही गुरूपगमन आत्म- साक्षात्कारके प्रति कारण है और इसीसे गुरुरहित वेदान्तविचारकी व्यावृत्ति होगी, तो श्रवणकी नियमविधि निरर्थक है। इस प्रकारका मनमें तात्पर्य रखते हुए शङ्का करते हैं 'न च' इत्यादिसे ] यदि कोई शङ्का करे कि *'तद्विज्ञानार्थम्०' (आत्मतत्त्वके परिज्ञानके लिए उसको गुरुके पास जाना चाहिए) इस प्रकारकी गुरूपसदनविधिसे ही गुरुसे रहित—गुरुके बिना अपने आप किये गये विचारका निरास हो सकता है, तो यह नियम- विधि निरर्थक है? नहीं, इस प्रकारकी आशङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि गुरू- पसदनके श्रवणाङ्ग होनेसे श्रवणविधिके अभावमें गुरूपसदनविधि ही नहीं हो सकती है, इसलिए गुरूपसदनविधिसे श्रवणविधिकी विफलता नहीं प्रसक्त होती। यदि इसे स्वीकार न करें, तो अध्ययनके अङ्गभूत उपगमनके विधानसे ही लिखित पाठ आदिकी व्यावृत्ति होनेसे अध्ययनकी नियमविधि भी विफल हो जायगी।


* 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्' इस श्रुतिके पहले श्रुति है—'ब्राह्मणो निर्वेदमायान्ना- स्त्यकृतः कृतेन' इसका अर्थ है कि ब्राह्मणको वैराग्य करना चाहिए, क्योंकि अकृत—नित्य- स्वरूप जो मोक्ष है, वह कृतेन—अनित्यकर्मसे प्राप्त नहीं हो सकता। अतः मोक्षको ब्रह्म- ज्ञानसाध्य जानकर वैराग्य सम्पन्न ब्राह्मण श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुके पास ब्रह्मज्ञानके लिए जाय, यह 'तद्विज्ञानार्थम्' इत्यादि श्रुतिका अर्थ हुआ। इसमें 'तत्' शब्दसे पहलेकी श्रुतिमें उक्त ब्राह्मणका ही परिग्रह है। यहाँ तात्पर्य यह है—'श्रोतव्यः' यह प्रधान नियमविधि है और इससे गुरुके अधीन विचारका नियमन होता है, इससे विचारके नियमित होनेपर उक्त प्रधानविधिके अङ्गरूपसे गुरूपसदनका विधान होता है, अतः उपगमनविधि अङ्गविधि हुई। एवञ्च यदि प्रधान श्रवणविधि न मानी जाय, तो अप्रधानविधिका स्वरूप ही नहीं बन सकेगा इसलिए उपगमनविधिसे श्रवणविधिकी निरर्थकता सिद्ध नहीं हो सकती है, इस अभि- प्रायसे परिहार किया गया है। यहाँ 'अन्यथा' शब्दका अर्थ है—अङ्गविधिसे प्रधानविधिकी विफलता मानी जाय, तो।

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