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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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विधिविचार ] भाषानुवादसहित २३


विभ्रमानिवृत्तिवत् तदनिवृत्त्युपपत्तेः । एवं च लिखितपाठादिनाऽपि स्वाध्यायग्रहणप्रसक्तौ गुरुमुखाधीनाध्ययननियमविधिवत् स्वप्रयत्नमात्रपूर्वकस्याऽपि वेदान्तविचारस्य सत्तानिश्चयरूपब्रह्मसाक्षात्कारार्थत्वेन पक्षे प्राप्तौ गुरुमुखाधीनश्रवणनियमविधिरयमस्तु ।

न च 'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्' इति गुरूपसदनविधिनैव उसकी उपाधिसे प्रतिबद्ध होनेके कारण जैसे प्रतिबिम्बके विभ्रमकी निवृत्ति नहीं होती, वैसे ही कल्मषोंसे प्रतिबद्ध सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मका अपरोक्ष साक्षात्कार भी अविद्याकी निवृत्ति नहीं कर सकता । ऐसा होनेपर अर्थात् गुरुनिरपेक्ष वेदान्तविचाररूप व्यावत्र्यका लाभ होनेपर जैसे लिखित* पाठ आदिसे स्वाध्याय—वेदराशिके ग्रहणकी प्राप्ति होनेपर गुरुमुखाधीन अध्ययनकी नियमविधिसे उसकी—लिखित पाठ आदिकी व्यावृत्ति होती है, वैसे ही सत्तानिश्चयात्मक ब्रह्मसाक्षात्कारके लिए अपने प्रयत्नमात्रसे किये गये वेदान्तविचारकी पक्षमें प्राप्ति होनेपर गुरुमुखाधीन श्रवणकी यह नियमविधि है ।

[ परन्तु स्वप्रयत्नसाध्य वेदान्तविचारकी व्यावृत्ति करनेके लिए 'श्रोतव्यः' यह नियमविधि है, यह कथन असङ्गत है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानके लिए गुरुके पास जानेका श्रुतिमें वर्णन है । और गुरूपगमन ब्रह्मसाक्षात्कारका साक्षात् साधन नहीं है, किन्तु परम्परासे साधन है । इसलिए वह ज्ञानके उत्पादनमें किसी द्वारकी अपेक्षा करेगा और वह द्वार योग्यतासे गुरुके अधीन विचार


* यहाँ सारांश यह है कि चाहे अभ्युदयका अभिलाषी पुरुष हो चाहे निःश्रेयसका अभिलाषी हो दोनोंको वेदार्थका अनुष्ठान करना चाहिए, क्योंकि वेदार्थके अनुष्ठानके बिना अभ्युदय या निःश्रेयसकी सिद्धि नहीं हो सकती है। और अनुष्ठान तब तक नहीं हो सकता, जब तक कि वेदके अर्थका ठीक ठीक परिज्ञान न हो। वेदके अर्थका परिज्ञान वेदके ग्रहणके बिना नहीं हो सकता। और वेदका ग्रहण दो रीतिसे हो सकता है, एक तो गुरु द्वारा और दूसरा लिखित पाठसे, कारण कि ये दोनों प्रकार लोकमें देखे जाते हैं। इस परिस्थितिमें अध्ययनविधिवाक्य यह काम करता है कि अध्ययनसे ही वेदाक्षर ग्रहण करे। इससे लिखित पाठ आदिकी व्यावृत्ति होती है। इसी तरह प्रकृत स्थलमें भी आत्मसाक्षात्कारके प्रति गुरु द्वारा सम्पादित वेदान्तविचार कारण है और निपुण पुरुषोंसे अपने प्रयत्न द्वारा किया गया वेदान्तविचार भी कारण है। इस अवस्थामें 'श्रोतव्यः' यह नियमविधि स्वप्रयत्न-प्राप्त वेदान्तविचारकी व्यावृत्ति करेगी, अर्थात् इससे यह सिद्ध होगा कि अपने प्रयत्नसे किया गया वेदान्तविचार आत्मसाक्षात्कारमें समर्थ नहीं है, किन्तु गुरुमुख द्वारा सम्पादित वेदान्तश्रवण ही साक्षात्कारमें समर्थ है।


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