सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
| ३६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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त्वानुपगमाच्च तयोर्द्वारत्वानुपपत्तेः। ब्रह्मज्ञानस्य विचाररूपातिरिक्तकारणजन्यत्वे तत्प्रामाण्यस्य परतस्त्वापत्तेश्च। तस्मात्तात्पर्यनिर्णयद्वारा पुरुषापराधनिरासार्थत्वेनैव विचाररूपे श्रवणे नियमविधिः। 'द्रष्टव्यः' इति तु दर्शनार्हत्वेन स्तुतिमात्रम्, न श्रवणफलसङ्कीर्तनमिति सङ्क्षेपशारीरकानुसारिणः॥
कारणघटित द्वारत्वकी उपपत्ति ही उनमें नहीं हो सकती है। और यदि यह मानें कि ब्रह्मज्ञान शब्दप्रमाणसे अतिरिक्त विचाररूप कारणसे उत्पन्न होता है, तो ब्रह्मज्ञानके प्रामाण्यको परतस्त्व प्राप्त होगा। परन्तु इसे स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि वेदान्तसिद्धान्तमें ज्ञान स्वतः प्रमाण माना गया है अर्थात् ज्ञानमें रहनेवाला प्रामाण्य ज्ञान-ग्राहक सामग्रीसे ही ग्राह्य होता है, इतरसे नहीं, यही प्रामाण्यका स्वतस्त्व है। और यदि ज्ञानग्राहक शब्द आदि सामग्रीसे अन्य विचारको ज्ञानके प्रति कारण मानें, तो ज्ञानके प्रामाण्यमें परतस्त्वकी आपत्ति स्पष्टरूपसे प्राप्त होगी और सिद्धान्तकी हानि होगी, इसलिए ब्रह्म-ज्ञानके प्रति विचारको परम्परया या साक्षात् कारण नहीं मान सकते। इससे—ब्रह्मज्ञानके विचारफल न होनेसे—तात्पर्यके निर्णय द्वारा (वेदान्तोंका अद्वितीय ब्रह्मके प्रतिपादनमें तात्पर्य है, अन्यत्र नहीं है इस प्रकारके निश्चय द्वारा) पुरुषके तात्पर्यभ्रम आदि अपराधोंके निरास द्वारा ही विचाररूप श्रवणमें नियमविधि है, अर्थात् तात्पर्यनिर्णय द्वारा पुरुषोंके दोषोंका निरास ही विचारका फल है, और श्रवणसे ही इस फलका सम्पादन करना चाहिए, अन्य साधनोंसे नहीं, यह भाव है। परन्तु 'द्रष्टव्यः' (अपरोक्ष साक्षात्कार करना चाहिए) इस प्रकार श्रवणके फलका कथन है, इसलिए श्रवणसे-विचारसे अपरोक्ष साक्षात्कार हो सकता है? यदि इस प्रकार कोई शङ्का करे तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि आत्मा द्रष्टव्य है—दर्शनके योग्य है, इस प्रकार यह दर्शन केवल स्तुतिमात्र है, वस्तुतः श्रवणसे अपरोक्ष ज्ञान होता है, इस प्रकार श्रवणके फलका कथन नहीं है, यह संक्षेपशारीरकानुयायियोंका मत है ❊।
अवच्छेदक होनेसे अन्यथासिद्धिशून्यत्वके न रहनेसे प्रतिबन्धकाभाव कारण नहीं हो सकता है, इसलिए प्रतिबन्धकाभावमें भी द्वारता नहीं है, अतः तद्द्वारा विचार ब्रह्मज्ञानका कारण नहीं हो सकता है, यह भाव है।
* इस अभिप्रायके सूचक संक्षेपशारीरकके निम्नलिखित श्लोक हैं—
विधिविचार ] भाषानुवादसहित ३७
चिकित्साशास्त्रवत् प्राप्तव्यापारान्तरवारिणी ।
श्रवणे परिसङ्ख्येयमिति वार्तिकवेदिनः ॥ १२ ॥
जैसे ओषधियोंके ज्ञानके लिए आयुर्वेदके अध्ययनमें प्रवृत्त पुरुषको मध्यमें अन्य व्यापार प्राप्त होता है, वैसे ही ब्रह्मज्ञानार्थ प्रवृत्त पुरुषको मध्यमें अन्य व्यापार प्राप्त हो सकता है, अतः प्राप्त अन्य-व्यापारका निवारण करनेवाली परिसंख्या-विधि ही श्रवणमें है, ऐसा वार्तिकके अभिज्ञोंका मत है ॥ १२ ॥
पुरुषोपराधमलिना धिषणा निरवद्यचक्षुरुदयापि यथा ।
न फलाय भर्तृमथिया भवति श्रुतिसम्भवापि तु तथात्मनि धीः ॥१४॥
पुरुषोपराधविगमे तु पुनः प्रतिबन्धकव्युदसनातू सफला ।
मणिमन्त्रयोरपगमे तु यथा सति पावकाद् भवति धूमलता ॥१५॥
पुरुषोपराधविनिवृत्तिफलः सकलो विचार इति वेदविदः ।
अनपेक्षतामनुरुध्य गिरः फलवद् भवत् प्रकरणं तदतः ॥१६॥
पुरुषोपराधशतसङ्कुलता विनिवर्त्तते प्रकरणेन गिरः ।
स्वयमेव वेदशिरसो वचनाद् अथ बुद्धिरुद्भवति मुक्तिफला ॥१७॥
इत्यादि (सं० शा० पृ० २३ पुनः मुद्रित) । पहले श्लोकका भाव है—
भर्तृनामक कोई राजाका प्रीतिपात्र सेवक था । उससे द्वेष करनेवाले राजाके अन्य नौकर छलसे उसे अन्यत्र कहीं ले गये, और उस स्थलपर उसको छोड़कर राजाके पास आकर बोले कि आपका वह नौकर मर गया है । इसके अनन्तर कभी उस राजाने उसे अपने उपवनमें देखा । राजा उसे देखकर पिशाचकी भ्रान्तिसे डर गया और भाग गया। इस अवस्थामें निर्दोष चक्षुसे होनेवाला सेवक-विषयक राजाका ज्ञान—'यह मेरा नौकर ही है पिशाच नहीं है' इस प्रकार निश्चयात्मक ज्ञान—उत्पन्न नहीं कर सका, क्योंकि 'मर गया' इस विपरीत संस्कारसे उसका प्रतिबन्ध हो गया था । इसी प्रकार निर्दोष श्रुतिसे उत्पन्न 'मैं ब्रह्म हूँ' इस तरहका ज्ञान भी प्रमाताके पूर्वकालीन विपरीत भावनासे प्रतिबद्ध होनेके कारण ब्रह्मविषयक निश्चयात्मक ज्ञानको उत्पन्न नहीं कर सकता, इसलिए पहले प्रतिबन्धकका निरास करना अत्यन्त अपेक्षित है ।
असम्भावना और विपरीतभावना आदि पुरुषके दोषोंका निराकरण होनेपर असम्भावना आदि प्रतिबन्धकोंके विनाशतः उक्त ज्ञान सफल है, जैसे—मणि और मन्त्रोंके अपगमसे वह्निसे धूमलता उत्पन्न होती है ॥१५॥
चूँकि सम्पूर्ण धर्म और ब्रह्मविचार पुरुषके अपराधकी निवृत्तिके लिए हैं, ऐसा वेदविद् कहते हैं, इसीलिए 'अर्थेऽनुपलब्धे तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात्' (जै० १।१।५) इस सूत्रमें वेदवाक्यकी नितांत अनपेक्षताका बाध न करके शास्त्र और प्रकरण सफल होते हैं, ऐसा कहा गया है ॥ १६ ॥
प्रकरण या शास्त्रसे पुरुषके दोषोंका विनाश होनेपर मुक्तिरूप फलका उत्पादन करनेवाली 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंसे स्वयं ही बुद्धि उत्पन्न होती है ॥१७॥
इस प्रकार ऊपरके सभी श्लोकोंका भाव है, इनके देखनेसे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि विचारका फल-प्रतिबन्धकका विनाश ही संक्षेपशारीरककार मानते हैं ।
३८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेदे
ब्रह्मज्ञानार्थं वेदान्तश्रवणे प्रवृत्तस्य चिकित्साज्ञानार्थं चरकसुश्रुतादि- श्रवणे प्रवृत्तस्येव मध्ये व्यापारान्तरेऽपि प्रवृत्तिः प्रसज्यत इति तन्निवृत्ति- फलकः 'श्रोतव्यः' इति परिसङ्ख्याविधिः । 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' (छा० २ । २३ । १) इति छान्दोग्ये अनन्यव्यापारत्वस्य मुक्त्युपायत्वावधारणात् सम्पूर्वस्य तिष्ठतेः समाप्तिवा- चितया ब्रह्मसंस्थाशब्दशब्दिताया ब्रह्मणि समाप्तेरनन्यव्यापाररूपत्वात् । 'तमेवैकं जानथ अन्या वाचो विमुञ्चथ' इत्याथर्वणे कण्ठत एव व्यापारा-
औषधोंके परिज्ञानके लिए चरक, सुश्रुत आदि आयुर्वेदके ग्रन्थोंके विचार- में प्रवृत्त हुए पुरुषके समान ब्रह्मज्ञानके लिए वेदान्तविचारमें प्रवृत्त हुए पुरुषकी बीच-बीचमें विचारके उपराम कालमें अन्य व्यापारोंमें भी प्रवृत्ति हो सकती है, अतः उनकी निवृत्तिके लिए 'श्रोतव्यः' यह परिसंख्याविधि है। भाव यह है कि औषधोंके परिज्ञानके लिए वैद्यकके ग्रन्थोंके श्रवणमें पुरुषकी प्रवृत्ति होती है, क्योंकि औषधका ज्ञान केवल वैद्यकग्रन्थोंसे ही होता है, अन्य ग्रन्थोंसे नहीं होता। इस परिस्थितिमें यद्यपि दवाके ज्ञानके लिए वैद्यकग्रन्थोंके श्रवणके बिना अन्य व्यापारकी प्रसक्ति नहीं है, तो भी विषयवासनाओंके बलसे मध्यमें इतर व्यापारोंमें पुरुषकी प्रवृत्ति होती है, इसी प्रकार ब्रह्मतत्त्वके यथार्थज्ञानके लिए वेदान्तश्रवणमें प्रवृत्त पुरुष जन्म-जन्मान्तरकी भेदवासनाओंसे आकृष्ट होकर कदाचित् मध्य-मध्यमें अन्य लौकिक और वैदिक व्यापारोंमें भी प्रवृत्त हो सकता है, अतः मध्यमें प्राप्त अन्य व्यापारोंकी निवृत्ति करनेके लिए 'श्रोतव्यः' यह परिसंख्याविधि है।
[ परन्तु जैसे सुश्रुत, चरक आदिके श्रवणमें प्रवृत्त पुरुषको अन्य व्यापार— अन्य शास्त्र श्रवण आदि करनेपर भी चिकित्साका ज्ञान होता है, वैसे ही वेदान्तके श्रवणमें प्रवृत्त पुरुषको बीच-बीचमें अन्य व्यापार करनेपर भी ब्रह्मज्ञान हो सकता है, इसलिए परिसंख्याविधिका स्वीकार निष्फल है ? नहीं, निष्फल नहीं है ] क्योंकि 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' ( ब्रह्मनिष्ठ पुरुष अमृतत्व प्राप्त करता है ) इस श्रुतिसे छान्दोग्यमें अनन्यव्यापारत्वका ही मुक्तिके प्रति उपायंरूपसे अवधारण किया गया है, कारण कि सम्पूर्वक 'स्था' धातुके समाप्तिवाची होनेसे ब्रह्मसंस्थाशब्दसे बोधित—ब्रह्ममें समाप्ति अनन्यव्यापाररूप है। और 'तमेवैकं जानथ अन्या
विधिविचार ] भाषानुवादसहित ३९
न्तरप्रतिषेधाच्च । 'आसुप्तेरामृतेः कालं नयेद्वेदान्तचिन्तया' इत्यादि-स्मृतेश्च । न च ब्रह्मज्ञानानुपयोगिनो व्यापारान्तरस्य एकस्मिन् साध्ये श्रवणेन सह समुच्चित्य प्राप्त्यभावान्न तन्निवृत्त्यर्थः परिसङ्ख्याविधिर्युज्यते इति वाच्यम् , 'सहकार्यन्तरविधिः' ( उ० मी० अ० ३ पा० ४ अधि० १४ सू० ४७ ) इत्यादिसूत्रे 'यस्मात् पक्षे भेददर्शनप्राबल्यान्न प्राप्नोति, तस्मान्नियमविधिः' इति तद्भाष्ये च कृतश्रवणस्य शाब्दज्ञानमात्रात्
वाचो विमुञ्चथ' ( हे मुमुक्षु लोगो ! जिस आधारमें आकाश आदि समस्त जगत् अध्यस्त है, उसी आधारभूत एकरूप आत्माको जानो और अनात्मप्रतिपादक शब्दोंका त्याग करो ) इस श्रुतिसे आथर्वणमें कण्ठसे ही अर्थात् अभिधावृत्तिसे ही शास्त्रान्तरश्रवणका प्रतिषेध किया है, और 'आसुप्तेरामृतेः कालम्०' ( सुप्ति और मृति पर्यन्त कालको वेदान्तके चिन्तनसे वितावे ) इस प्रकारकी स्मृति भी है अर्थात् यह स्मृति भी अन्य व्यापारका प्रतिषेध करती है । परन्तु* ब्रह्मज्ञानरूप एक साध्यमें श्रवणके साथ साथ अनुपयुक्त अन्य व्यापारकी प्राप्ति नहीं होनेसे उसकी निवृत्तिके लिए परिसंख्याविधि युक्त नहीं है ? नहीं, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'सहकार्यन्तरविधिः' इत्यादि सूत्रमें और 'यस्मात् पक्षे भेददर्शनप्राबल्यात् न प्राप्नोति, तस्मान्नियमविधिः' इस प्रकारके उस सूत्रके भाष्यमें—जिसने श्रवण किया
* शङ्का और उत्तर करनेवालोंका अभिप्राय यह है कि परिसंख्याविधि वहीं होती है, जहाँ एक वस्तुके उत्पादनमें एक साथ दो साधनोंकी प्राप्ति हो । परन्तु प्रकृतमें ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यहाँ ब्रह्मज्ञानका उत्पादन करना है, इसके उत्पादनमें श्रवण कारण है, न कि अन्य व्यावहारिक व्यापार, इसलिए एक साथ दो साधनोंकी प्राप्ति न होनेसे अन्य व्यापारकी निवृत्तिके लिए परिसंख्याविधि कैसे होगी ? इसका उत्तर प्रतिबन्दी है अर्थात् भाष्यकारने निदिध्यासनमें नियमविधि मानी है, इसमें कारण केवल यही बतलाया है—श्रवणके बाद शाब्दज्ञानसे अपनेको धन्य समझनेवाला निदिध्यासनमें, जो साक्षात्कारका उपयोगी है, कदाचित् प्रवृत्त न होकर अन्य अनुपयुक्त लौकिक व्यापारमें प्रवृत्त हो जाय, इसलिए निदिध्यासनमें नियमविधिका अङ्गीकार है। उत्तरवादीका भाव यह है—साक्षात्कारके जननमें पक्षमें असाधनकी प्राप्तिकी सम्भावनामात्रसे निदिध्यासनके अप्राप्तांशकी परिपूर्तिसे जैसे नियमविधि मानी गई है, वैसे ही प्रकृतमें श्रवणके साथ समुच्चयसे सम्भावनामात्रसे असाधन की प्राप्ति है, इससे उसकी निवृत्तिके लिए अवश्य श्रवणको परिसंख्याविधि मानना चाहिए ।
४० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
कृतकृत्यतां मन्वानस्याऽविद्यानिवर्तकसाक्षात्कारोपयोगिनि निदिध्यासने प्रवृत्तिर्न स्यादिति अतत्साधनपक्षप्राप्तिमात्रेण निदिध्यासने नियमविधेरभ्युपगततया तन्न्यायेनाऽसाधनस्य समुच्चित्य प्राप्तावपि तन्निवृत्तिफलकस्य परिसङ्ख्याविधेः सम्भवादिति ।
नियमः परिसङ्ख्या वा विध्यर्थोऽत्र भवेद्यतः ॥
अनात्मादर्शनेनैव परात्मानमुपास्महे ॥ १ ॥
इति वार्तिकवचनानुसारिणः केचिदाहुः ॥
श्रवणं ह्यागमाचार्यवाक्यजं ज्ञानमिष्यते ॥
अयोग्येऽत्र विधिर्नैति वाचस्पतिमत्तानुगाः ॥१३॥
शास्त्र और आचार्यके वचनोंसे उत्पन्न होनेवाला आत्मज्ञान ही श्रवण है, अतः उक्त तीनों विधियोंके अविषय श्रवणमें ( कोई भी ) विधि नहीं है, यह वाचस्पतिके अनुयायियोंका मत है ॥ १३ ॥
'आत्मा श्रोतव्यः' इति मननादिवत् आत्मविषयकत्वेन निवध्य-
है और जो शब्दके श्रवणसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानमात्रसे अपनेको कृतकृत्य मानता है तथा अन्य व्यापारोंमें भी जिसकी प्रवृत्ति है, ऐसे पुरुषकी अविद्याकी निवृत्ति करनेवाले साक्षात्कारके उपयोगी निदिध्यासनमें कदाचित् प्रवृत्ति न हो, इसलिए पक्षमें ज्ञानके असाधनकी प्राप्तिमात्रसे निदिध्यासनकी—नियमविधि मानी गई है, इसी न्यायसे समुच्चयसे असाधनकी प्राप्ति होनेपर उसकी निवृत्तिके लिए परिसंख्याविधि हो सकती है, इस प्रकार 'नियमः परिसंख्या वा०' (इस 'आत्मावा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' इत्यादि वाक्यमें नियम विधिप्रत्ययका अर्थ होगा । अथवा श्रवणके नित्य प्राप्त होनेसे नियम यदि विधिका अर्थ न हो सके, तो परिसंख्या ही विधिप्रत्ययका अर्थ हो, क्योंकि हम उपासक लोग अनात्मादर्शनसे ही—अनन्यव्यापारसे ही परमात्माकी उपासनामें प्रवृत्त हैं) इस वार्तिकवचनका अनुसरण करनेवाले कुछ लोग कहते हैं ।
मनन आदिके समान 'आत्मा श्रोतव्यः' ( आत्माका श्रवण करना चाहिए ) इस प्रकार आत्मविषयकत्वरूपसे कहा गया श्रवण भी आगम—शास्त्र और
विधिविचार ] भाषानुवादसहितं ४१
मानं श्रवणमागमाचार्योपदेशजन्यमात्मज्ञानमेव, न तु तात्पर्यविचाररूपमिति न तत्र कोऽपि विधिः ।
आचार्यके उपदेशसे उत्पन्न होनेवाला आत्मज्ञान ही है, तात्पर्यविचाररूप नहीं है, अतः श्रवणमें कोई विधि नहीं है। भाव यह है कि जैसे मनन और निदिध्यासन, जो आत्माको विषय करते हैं, ज्ञानरूप हैं, वैसे ही श्रवण भी, जो आत्माको विषय करता है, ज्ञानरूप ही है, क्योंकि 'आत्मा श्रोतव्यः' इस श्रुतिमें आत्मा और श्रवणका परस्पर विषय-विषयिभाव सम्बन्ध प्रतीत होता है, अतः श्रवण आत्मविषयक है। यदि श्रवण विचाररूप माना जाय, तो वह आत्मविषयक न होगा और श्रवणक्रियाका कर्म आत्मा न होगा, किन्तु वेदान्तवाक्य होंगे। इससे मनन आदिमें क्लृप्त आत्मरूप कर्मका परित्याग होनेसे प्रक्रमका भङ्ग होगा। [ परन्तु मनन आदिका जो दृष्टान्त दिया गया है, उसपर कुछ आलोचना करनी चाहिए, क्योंकि आपाततः मननशब्दका अर्थ—ज्ञान नहीं होता है। मननका अर्थ है—युक्तियोंसे किसी वस्तुकी आलोचना करना अर्थात् एक वस्तुको युक्ति-प्रयुक्तियोंसे टटोलना, इससे हम मननको ज्ञानरूप नहीं मान सकते, व्यापारात्मक ही मान सकते हैं। इसी प्रकार निदिध्यासन भी ज्ञानरूप नहीं हो सकता, क्योंकि निदिध्यासन शब्दकी निष्पत्ति चिन्तार्थक 'ध्यै' धातुसे हुई है, इसलिए 'मनन आदिके समान' यह दृष्टान्त युक्त नहीं है। इसपर यह कहा जाता है कि मनन व्यापाररूप नहीं है, किन्तु अनुमितिज्ञानरूप है। और वह अनुमिति—आत्मा ब्रह्मस्वभाव है, चिद्रूप होनेसे, ब्रह्मके समान। बुद्धि आदि कल्पित हैं, दृश्य होनेसे, शुक्तिरजतके समान—इस प्रकार है। इसमें मैत्रेयीब्राह्मणका वार्तिक प्रमाण है—
आगमार्थविनिश्चित्यै मन्तव्य इति भण्यते ।
वेदशब्दानुरोध्यत्र तर्कोऽपि विनियुज्यते ॥
पदार्थविषयस्तर्कः तथैवाऽनुमितिर्भवेत् ।
श्रुतिके अर्थको दृढ करनेके लिए तर्करूप मननका विधान किया जाता है, वह तर्क वेदाविरोधी होता है तथा तत्त्वंपदार्थविषयक और अनुमित्यात्मक होता है, यह इसका भाव है। जब अनुमितिरूप मनन है, तो उसे ज्ञानरूप मानने-
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४२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
अत एव समन्वयसूत्रे ( उ० मी० अ० १ पा० १ सू० ४ ) आत्मज्ञानविधिनिराकरणानन्तरं भाष्यम्—'किमर्थानि तर्हि 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' इत्यादीनि वचनानि विधिच्छायानि ? स्वाभाविकप्रवृत्तिविषयविमुखीकरणार्थानीति ब्रूमः' इत्यादि ।
में क्या हानि है ? इसी प्रकार निदिध्यासन भी ज्ञानरूप है, क्योंकि बृहदारण्यके ४र्थ और ६ष्ठ अध्यायगत मैत्रेयीब्राह्मणमें भगवती श्रुति कहती है—'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यः' । अनन्तर छठे अध्यायमें 'मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते' और चौथे अध्यायमें 'मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेन' इस प्रकार निदिध्यासनके अनुवादके लिए विज्ञानशब्दका प्रयोग किया गया है, इससे वार्तिककार ज्ञानरूपसे निदिध्यासनका भी अङ्गीकार करते हैं, अतः 'अपरायत्तबोधोऽत्र निदिध्यासनमुच्यते' इस प्रकार वार्तिककारकी उक्ति भी उपलब्ध होती है। इसलिए मनन आदिका ज्ञानरूपसे अङ्गीकार होनेसे दृष्टान्तासिद्धि नहीं है—अब प्रसङ्गसे यहाँ एक शङ्का यह भी होती है—निदिध्यासन और दर्शनके अर्थात् 'निदिध्यासितव्यः' और 'द्रष्टव्यः' इन दो पदोंके एकार्थक होनेसे पुनरुक्ति होगी ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि 'द्रष्टव्यः' इस शब्दसे विचारप्रयोजक—विचारमें प्रवृत्तिके उपयुक्त आपाततः दर्शनका अनुवाद है और 'निदिध्यासितव्यः' इस शब्दसे विचारका फलभूत जो साक्षात्कार है, उसका अनुवाद है, अतः पुनरुक्ति नहीं है ]।
[ श्रवणमें विधि नहीं है, इसमें भाष्यकी सम्मति भी है ] इसीसे—श्रवण और मनन आदिके ज्ञानरूप होनेके कारण विधिके अयोग्य होनेसे—'तत्तु समन्वयात्' इस समन्वयसूत्रमें आत्मज्ञानकी विधिके निराकरणके पश्चात् भाष्य है—'किमर्थानि तर्हि 'आत्मावा अरे....ब्रूमः' इत्यादि। (यदि आत्मज्ञानकी विधि नहीं है, तो 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः' इत्यादि 'अध्येतव्यः' इत्यादि विधिके समान वचन किसलिए हैं ? स्वाभाविक प्रवृत्तिके विषयसे विमुख करनेके लिए ऐसे वचन हैं, ऐसा हम कहते हैं)
* स्वभावसे—अविद्यासे होनेवाली प्रवृत्तिका नाम स्वाभाविक प्रवृत्ति है।
† इसमें आदिशब्दसे 'यो हि बहिर्मुखः पुरुषः प्रवर्तते' 'इष्टञ्च मे भूयादनिष्टञ्च मा भूत्' इत्यादि भाष्यका संग्रह करना चाहिए, इस भाष्यका अभिप्राय है कि जो पुरुष बहिर्मुख है, वह मुझे इष्ट वस्तु प्राप्त हो और अनिष्ट प्राप्त न हो, इस बुद्धिसे बाहरके विषयोंमें ही प्रवृत्त होता
विधिविचार ] भाषानुवादसहितं ४३
यदि च वेदान्ततात्पर्यविचाररूपं श्रवणम्, तदा तस्य तात्पर्यनिर्णयद्वारा वेदान्ततात्पर्यभ्रमसंशयरूपप्रतिबन्धकनिरास एव फलम्; न प्रतिबन्धकान्तरनिरासो ब्रह्मावगमो वा। तत्फलकत्वं च तस्य लोकत एव प्राप्तम्। साधनान्तरं च किञ्चिद्विकल्प्य समुच्चित्य वा न प्राप्तमिति न तत्र विधित्रयस्याऽप्यवकाशः।
इत्यादि। [ तात्पर्य यह है यदि 'श्रोतव्यः' इत्यादि वेदान्तवाक्य विधायक नहीं हैं, तो 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि विधायक-वाक्योंमें तव्यप्रत्यय निरर्थक होंगे ? इस प्रश्नपर भगवान् भाष्यकारका कहना है कि निरर्थक नहीं हैं, क्योंकि उन तव्य आदि प्रत्ययोंसे श्रवण आदिकी स्तुति होती है। जो मुमुक्षु श्रवण आदिमें मोक्षकी साधनताका अनुभव करके भी संन्यास, ब्रह्मचर्य आदिके अनुष्ठानके क्लेशोंसे उनमें उत्साहपूर्वक प्रवृत्त नहीं होता और साधारणतया प्राप्त वर्णाश्रमके अनुकूल कर्म और उपासनाओंका अनुष्ठान करता हुआ भी उनसे निवृत्ति नहीं पाता है, उन वर्णाश्रम कर्मोंमें आत्यन्तिक मोक्ष-साधनताके अभावका अनुसन्धान कराते हुए ये 'तव्य' आदि प्रत्यय उसके प्रति श्रवण आदिकी प्रशंसा करते हैं अर्थात् 'मुमुक्षु पुरुष सम्पूर्ण उत्साहसे श्रवण आदिमें ही प्रवृत्त हो, क्योंकि वे ही मुक्तिके साधन हैं' इस प्रकार प्रशंसा द्वारा 'तव्य' आदि प्रत्यय पुरुषके प्रवर्तक हैं, अतः विधायक न होनेपर भी 'तव्य' आदि प्रत्यय निरर्थक नहीं हैं ]।
यदि श्रवणको ज्ञानरूप न मानकर वेदान्ततात्पर्यविचाररूप ही मानें, तो भी तात्पर्यनिश्चय द्वारा वेदान्तोंके तात्पर्यभ्रम या तात्पर्यसंशयरूप प्रतिबन्धकका निराकरण ही श्रवणका फल है; अन्य प्रतिबन्धकका—पापका निरास या ब्रह्मज्ञान उसका फल नहीं है। भ्रमादिरूप जो प्रतिबन्धक है, उसका निराकरणरूप श्रवणका फल तो लोकसे ही प्राप्त है और अन्य साधन—अर्थात् ब्रह्मज्ञानमें श्रवण आदिसे अन्य कोई कारण विकल्पसे या समुच्चयसे प्राप्त भी नहीं है, इसलिए तीन विधियोंमें से किसी भी विधिका अवकाश नहीं है।
है, 'आत्मा वा अरे' इत्यादि श्रुतिस्थ तव्य प्रत्यय उस पुरुषकी स्वाभाविक बाह्य प्रवृत्तिको हटाकर प्रशंसा द्वारा आभ्यन्तर प्रवृत्ति कराते हैं।
| ४४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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विचारविध्यभावेऽपि विज्ञानार्थतया विधीयमानं गुरूपसदनं दृष्टद्वारसम्भवे अदृष्टकल्पनायोगात् गुरुमुखाधीनवेदान्तविचारद्वारैव विज्ञानार्थं पर्यवस्यतीति । अत एव स्वप्रयत्नसाध्यविचारव्यावृत्तिः । अध्ययनविध्यभावे तूपगमनं विधीयमानमक्षरावाप्त्यर्थत्वेनाऽविधीयमानत्वान्न तदर्थं गुरुमुखोच्चारणानूच्चारणमध्ययनं द्वारीकरोतीति लिखितपाठादिन्यावृत्त्यसिद्धेः सफलोऽध्ययननियमविधिः ।
वेदान्तविचारकी विधि न होनेपर भी गुरूपसदनका—गुरुके पास विज्ञानार्थ गमनका, जिसका कि विज्ञानरूप प्रयोजनके लिए विधान है, गुरुमुखके अधीन वेदान्तविचारके द्वारा ही विज्ञानमें पर्यवसान होता है अर्थात् 'गुरुमेवोपगच्छेत्' इत्यादिसे गुरुके समीपमें विहित जो गमन है, वह गुरुमुखसे सम्पादित वेदान्तविचाररूप दृष्ट द्वारा विज्ञानकी—आत्मज्ञानकी उत्पत्ति करेगा अदृष्ट द्वारा नहीं । क्योंकि जब तक दृष्ट द्वारकी सम्भावना हो, तब तक अदृष्ट द्वारका अङ्गीकार करना उचित नहीं है । इसीसे—'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्' ( उसके ज्ञानके लिए गुरुके पास ही जावे ) इस उपगमनविधिसे ही अपने आप—गुरुके बिना स्वतः प्रयत्नसे किये गये वेदान्तविचारकी व्यावृत्ति हो सकती है, तो पुनः 'श्रोतव्यः' को स्वप्रयत्नसाध्य विचारके निरासके लिए विधि माननेकी आवश्यकता नहीं है । [ परन्तु पहले कहा जा चुका है कि उपगमनविधि विचारविधिकी अङ्ग है, अतः विचारविधि यदि न मानी जाय तो उपगमनविधिका स्वरूप ही न बनेगा, इसलिए विचारविधिका स्वीकार अवश्य करना चाहिए ? नहीं—इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानके प्रति गुरूपसदन जब द्वारकी ( मध्यवर्ती व्यापारकी ) अपेक्षा करेगा, तब लोकसिद्ध गुरुके अधीन विचार ही द्वाररूपसे प्राप्त हो सकता है, अतः श्रोतव्यविधिकी अपेक्षा ही नहीं है, तो उपगमनविधि विचारविधिकी अङ्ग नहीं है और विचारके समान उपगमन भी विद्याका अङ्ग हो सकता है, इससे पूर्वोक्त शङ्काका अवसर नहीं है । ] यदि अध्ययनविधि न मानी जाय, तो विधीयमान जो उपगमन है, वह अक्षरग्रहणके लिए नहीं है, इससे वह अक्षरग्रहणके लिए गुरुमुख-उच्चारणके अनन्तर उच्चारणकी अर्थात् अध्ययनकी ( वेदाध्ययनमें पहले वेदमन्त्रको गुरु कहते हैं अनन्तर शिष्य उसीका उच्चारण
[विधिविचार ] भाषानुवादसहित ४५
न च तात्पर्यादिभ्रमनिरसाय वेदान्तविचारार्थिनः कदाचित् द्वैत- शास्त्रेऽपि प्रवृत्तिः स्यात्। तत्राऽपि तदभिमतयोजनया वेदान्तविचार- सत्त्वात् इत्यद्वैतात्मपरवेदान्तविचारनियमविधिरर्थवानिति वाच्यम् , स्वय- मेव तात्पर्यभ्रमहेतोस्तस्य तन्निरासकत्वाभावेन साधनान्तरप्राप्त्यभावात्।
करता है) द्वाररूपसे अपेक्षा नहीं करेगा, अतः लिखित पाठ आदिकी व्यावृत्ति- रूप फलकी असिद्धि होनेसे अध्ययनविधि सार्थक है। [ तात्पर्य यह है कि पहले अतिप्रसङ्ग दिया है—'श्रवणविधिको, जो गुरूपसदनके प्रति प्रधानविधि है, न मानकर अङ्गमूत उपगमनविधि मानी जाय, तो अध्ययनाङ्ग उपगमन- विधिसे ही लिखित पाठकी व्यावृत्ति हो जायगी, अतः अध्ययनकी नियमविधि व्यर्थ होगी', इस अतिप्रसङ्गका परिहार करनेके लिए उपर्युक्त ग्रन्थ है अर्थात् अध्ययनविधिका अङ्गीकार न किया जायगा, तो उपगमनविधिसे लिखित- पाठकी व्यावृत्ति नहीं होगी, क्योंकि 'गुरुमुखसे अक्षरोंका ग्रहण करना इस अर्थका विधायक न उपगमनविधिवाक्य है और न इतरविधिवाक्य है, इसलिए अध्ययनविधि उक्त व्यावृत्तिके लिए अपेक्षित है, अतः श्रवणविधिके न माननेपर भी कोई अतिप्रसङ्ग नहीं है ] ।
[ अब श्रवणको विधि माननेवाले यह शङ्का करते हैं कि यद्यपि तुम्हारे कथनके अनुसार श्रवणविधिका स्वप्रयत्नसाध्य विचार व्यावत्र्य नहीं है, तथापि अन्य व्यावत्र्य है, क्योंकि ] वेदान्तके विचारको चाहनेवाले पुरुषकी तात्पर्य आदिके भ्रमके निराकरण करनेके लिए कदाचित् द्वैतशास्त्रमें ( उस शास्त्रमें, जिसमें ईश्वर और जीवका भेदप्रतिपादन किया गया है ) प्रवृत्ति हो सकती है, कारण कि द्वैतप्रतिपादक शास्त्रमें भी अपने मतके अनुकूल वेदान्तका विचार किया गया है, इसलिए अद्वैत आत्मपरक वेदान्तविचार श्रवणकी नियमविधि सार्थक है—श्रवणविधिका खण्डन करना अकाण्डताण्डव है ? नहीं, यह शङ्का व्यर्थ है, क्योंकि जो स्वयं तात्पर्यभ्रमका कारण है, वह तात्पर्यभ्रमका निराकरणकर्ता कैसे हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता, इसलिए अन्य साधनकी प्राप्ति ही नहीं है [ भाव यह है कि जो द्वैतशास्त्र हैं, वे सब-के सब तात्पर्यभ्रमको उत्पन्न करनेवाले हैं, हटानेवाले नहीं हैं, इससे तात्पर्यभ्रमके दूरीकरणके लिए अद्वैत-शास्त्रको छोड़कर द्वैत-
| ४६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेदे |
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तन्निरासकत्वभ्रमेण तत्रापि कस्यचित्प्रवृत्तिः स्यादित्येतावता 'श्रोतव्यः' इति नियमविधेरभ्युपगम इत्यपि न । ईश्वरानुग्रहफलाद्वैतश्रद्धारहितस्य श्रोतव्यवाक्येऽपि पराभिमतयोजनया सद्वितीयात्मविचारविधिपरत्वभ्रमसम्भवेन भ्रमप्रयुक्ताया अन्यत्र प्रवृत्तेर्विधिशतेनाऽप्यपरिहार्यत्वात् ।
शास्त्रकी प्राप्ति ही नहीं है, अतः द्वैत-शास्त्रीय विचारकी व्यावृत्ति करनेके लिए श्रवणकी नियमविधि मानना केवल दुराग्रह है । इस विषयमें और भी शङ्का करते हैं कि ] यद्यपि द्वैत-शास्त्रीय विचार तात्पर्यभ्रमका निवर्तक नहीं है, तथापि निरासकत्वभ्रमसे—'भिन्नात्मज्ञानं मुक्तिसाधनम्' (द्वैतात्मज्ञान मुक्तिका हेतु है) इस प्रकारके भ्रमसे द्वैतशास्त्रमें भी किसी पुरुषकी प्रवृत्ति हो सकती है, इससे उसकी निवृत्तिके लिए 'श्रोतव्यः' इस नियमविधिका अङ्गीकार है, परन्तु यह भी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि अद्वैत-श्रद्धासे, जो ईश्वरकी अनुकम्पाका फल है, शून्य पुरुषकी 'श्रोतव्यः' वाक्यमें भी अन्यमतानुसारी योजनासे सद्वितीयात्मविचारविधिपरत्वका भ्रम हो सकता है इससे भ्रमप्रयुक्त द्वैतवस्तुपरक शास्त्रमें प्रवृत्तिका सैकड़ों विधियोंसे भी परिहार नहीं हो सकता । इसका विशद भाव यह है—इस बातका शास्त्रोंमें निर्विवादरूपसे प्रतिपादन किया गया है कि श्रवणविधिमें वही पुरुष अधिकारी है, जिसको जन्म-जन्मान्तरमें यज्ञ आदिके अनुष्ठानसे बलवती ब्रह्मज्ञानकी इच्छा है और साधन-चतुष्टयसम्पत्ति भी—अर्थात् नित्य और अनित्य वस्तुका विवेचनात्मक ज्ञान, इस लोकके और परलोकके फलभोगमें वैराग्य, मुमुक्षुता, और शम-दमादि—जिसको प्राप्त है। क्योंकि यज्ञ आदिसे सम्पादित जो अदृष्ट है, वह निष्प्रपञ्च अद्वितीय ब्रह्मसाक्षात्कारमें साङ्गवेदान्तके अध्ययनसे लब्ध वेदान्तोंसे मुक्तिकी साधनताके निश्चयका सम्पादन करके अद्वितीय आत्मसाक्षात्कारमें विविदिषाकार अद्वैत ब्रह्मज्ञानकी इच्छाका उत्पादन करता है और उसके द्वारा अद्वितीय आत्मसाक्षात्कारके साधन अद्वितीयआत्माके श्रवण आदिमें मुमुक्षु पुरुषको प्रवृत्त करता है, नकि जीवभिन्न आत्मज्ञानमें मुक्तिकी साधनताका भ्रमात्मक ज्ञान उत्पन्न कर उसके द्वारा भिन्नात्मज्ञान और इसके कारणविचार आदिमें इच्छा, प्रवृत्ति आदिका उत्पादन करता है, क्योंकि द्वैतात्मज्ञानकी इच्छामें भिन्नात्मविचार द्वारा यज्ञ आदिके फलभूत निष्प्रपञ्च ब्रह्मसाक्षात्कारकी हेतुता
विधिविचार ] भाषानुवादसहित ४७
न च व्यापारान्तरनिवृत्त्यर्था परिसङ्ख्येति वाच्यम्, असंन्यासिनो व्यापारान्तरनिवृत्तेरशक्यत्वात् । संन्यासिनस्तन्निवृत्तेः ब्रह्मसंस्थया सह संन्यासविधायकेन 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इति श्रुत्यन्तरेण
नहीं है; ऐसी स्मृति भी है— 'ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना'
यज्ञ आदिसे सम्पादित ईश्वरानुग्रहसे ही पुरुषोंको अद्वैत ब्रह्मज्ञानकी इच्छा होती है, यह भाव है । इससे जिस पुरुषको भिन्न आत्मज्ञानमें मुक्तिसाधनत्वका भ्रम है उसमें अद्वैत साक्षात्कारकी इच्छा आदिके न रहनेसे श्रवणविधिमें उसका अधिकार ही नहीं है और उसके प्रति नियमविधि सार्थक भी नहीं है, इसलिए भ्रमी पुरुषकी अन्यत्र प्रवृत्तिका किसी प्रकारसे भी निराकरण नहीं कर सकते हैं, और ईश्वरके अनुग्रहसे अद्वैतमें जिसकी श्रद्धा ही नहीं हुई है, ऐसे पुरुषकी पराभिमतयोजनासे—'आत्मा श्रोतव्यः' इस श्रुतिमें आत्माका अर्थ जीव है, परमात्मा नहीं, क्योंकि 'आत्मनस्तु कामाय' इत्यादि पूर्व वाक्यमें जीव ही प्रकृत है, और 'इदं सर्वं यदयमात्मा' इस प्रकारके वाक्यशेषमें परमात्माका प्रतिपादन किया गया है, इससे 'श्रोतव्यः' वाक्यमें आत्मा—परमात्मा ही है यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि वाक्यशेषमें भी परमात्माका प्रतिपादन नहीं कर सकते, कारण कि 'जो यह सब है, वह परमात्मा है' इस प्रकार प्रपञ्च और परमात्माका, जो जड़ और चेतन हैं, परस्पर तादात्म्य नहीं बन सकता । अतः उक्त श्रुति अभेदध्यानपरक है, अद्वैतपरक नहीं—इस प्रकारकी श्रवणवाक्यकी योजनासे भी द्वैतविचारमें भ्रमप्रयुक्त प्रवृत्ति हो सकती है, उसका निराकरण सैकड़ों विधियोंसे भी नहीं हो सकता । ]
श्रवणमें परिसंख्याविधि माननेवाले शङ्का करते हैं कि अन्य व्यापारकी निवृत्ति करनेके लिए 'श्रोतव्यः' वाक्यमें परिसंख्याविधि माननी चाहिए; परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि [ श्रवणविधिसे गृहस्थ आदिके व्यापारकी निवृत्ति होती है या संन्यासीके व्यापार की निवृत्ति होती है ? इन दो विकल्पोंमें पहला पक्ष युक्त नहीं है ] असंन्यासीके-गृहस्थ आदिके व्यापारकी निवृत्ति नहीं कर सकते, कारण कि ऐसा करनेपर अन्य श्रुतियोंसे, जो ब्रह्मसंस्थासे अतिरिक्त व्यापारोंका गृहस्थके प्रति विधान करती हैं, विरोध होगा, [ द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि ] संन्यासीके
| ४८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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सिद्धतया संन्यासविधायकश्रुत्यन्तरमपेक्ष्य श्रोतव्यवाक्येन तस्य व्यापारान्तरनिवृत्त्युपदेशस्य व्यर्थत्वात् ।
न च विचारविध्यसम्भवेऽपि विचारविषयवेदान्तनियमविधिः सम्भवति, भाषाप्रबन्धादिन्यावर्त्यसत्त्वादिति शङ्क्यम् । सन्निधानादेव वेदान्तनियमस्य लब्धत्वेन विधिविषयत्वायोगात्, ‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’ इत्यर्थावबोधार्थनियमविधिवलादेवाध्ययनगृहीतवेदोत्पादितं वेदार्थज्ञानं फलपर्यवसायि, न कारणान्तरोत्पादितमित्यस्यार्थस्य लब्धत्वेन वेदार्थे ब्रह्मणि
( व्यावहारिक ) अन्य व्यापारकी निवृत्ति तो ब्रह्मसंस्थाके साथ संन्यासविधायक 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' ( ब्रह्मसंस्थ पुरुष अमृत पाता है ) इस इतर श्रुतिसे सिद्ध ही है, इसलिए संन्यासविधायक अन्य श्रुतिकी अपेक्षा करके 'श्रोतव्यः' वाक्यसे उस अन्य व्यापारकी निवृत्तिका उपदेश करना सर्वथा व्यर्थ है ।
और यह भी शङ्का नहीं करनी चाहिए कि विचारविधिके न रहनेपर भी विचारविषयत्वरूपसे वेदान्तमें नियमविधि हो सकती है, क्योंकि भाषा-प्रबन्ध आदि व्यावर्तय हैं । कारण कि सन्निधिसे ही वेदान्तनियमके प्राप्त होनेसे ( वेदान्त ) विधिविषयके अयोग्य हैं । [ शङ्काकर्ताका अभिप्राय यह है कि विचारविधिका खण्डन करनेपर भी वेदान्तनियमविधि—अर्थात् विचार करना चाहिए, तो वेदान्तोंका ही, इस प्रकारकी विधि—हो सकती है । और इससे भाषा-प्रबन्धोंकी व्यावृत्ति होगी । उत्तरदाताका यह भाव है कि—इस प्रकारका नियम श्रवणविधिसे पहले ही प्राप्त हो जाता है, क्योंकि साङ्गवेदका जिसने अध्ययन किया है और साधारणतः ज्ञात ब्रह्मकी विशेषरूपसे जिसको जिज्ञासा हुई, ऐसे पुरुषको जिज्ञासाके निवर्तकका निर्णय करनेके लिए कर्तव्यरूपसे विचारकी प्राप्ति होनेपर विचारविषयके अन्वेषण करनेमें सर्वप्रथम वेदान्त ही बुद्धिस्थ होते हैं। इससे 'वेदान्तोंका ही विचार करना चाहिए' इस प्रकार सबसे पहले बुद्धिके उदय होनेसे वेदान्तविधिके लिए श्रवणविधिकी कोई आवश्यकता नहीं है ] और 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' ( स्वाध्याय—वेद पढ़ना चाहिए ) इस अर्थके परिज्ञानके लिए ( विद्यमान ) नियमविधिके प्रभावसे यह अर्थ प्राप्त होगा कि अध्ययनसे गृहीत वेद द्वारा उत्पादित वेदके अर्थका ज्ञान ही फलका पर्यवसायी है, मोक्ष आदि फलका उत्पादक है, अन्य कारणसे उत्पादित वेदार्थज्ञान
विधिविचार ] भाषानुवादसहित ४९
मोक्षाय ज्ञातव्ये भाषाप्रबन्धादीनामप्राप्तेश्च । न च 'सहकार्यन्तरविधिः' इत्यधिकरणे बाल्यपाण्डित्यमौनशब्दितेषु श्रवणमनननिदिध्यासनेषु विधिरभ्युपगत इति वाच्यम् , विचारे विचार्य्यतात्पर्य्यनिर्णयहेतुत्वस्य वस्तु-सिद्ध्यनुकूलयुक्त्यनुसन्धानरूपे मनने तत्प्रत्ययाभ्यासरूपे निदिध्यासने च वस्त्ववगमवैशद्यहेतुत्वस्य च लोकसिद्धत्वेन तेषु विध्यनपेक्षात् विधिच्छायार्थवादस्येव प्रशंसाद्वारा प्रवृत्त्यतिशयकरत्वमात्रेण तत्र विधिव्यवहारात् । एवं च श्रवणविध्यभावात् कर्मकाण्डविचारवत् ब्रह्मकाण्डविचारोऽप्यध्ययनविधिमूल इत्याचार्यवाचस्पतिपक्षानुसारिणः ॥ १ ॥
फलका पर्यवसायी होगा, इससे मोक्षके लिए ज्ञातव्य वेदके अर्थभूत ब्रह्ममें भाषाग्रन्थ आदिकी व्यावृत्ति सिद्ध ही है, अतः भाषाप्रबन्धकी निवृत्तिके लिये वेदान्तनियमविधिकी कोई आवश्यकता नहीं है । परन्तु 'सहकार्यन्तरविधिः' इत्यादि अधिकरणमें श्रवण, मनन और निदिध्यासनमें, जिनका क्रमशः पाण्डित्य, बाल्य और मौनशब्दसे व्यवहार किया गया है, सूत्रकार और भाष्यकारने विधि मानी है, इसलिए श्रवण-विधि नहीं है, यह कहना असङ्गत है, नहीं असङ्गत नहीं है, क्योंकि विचारमें विचार-विषय-तात्पर्यके निश्चयात्मक ज्ञानकी हेतुता एवं वस्तुकी सिद्धिमें हेतुभूत युक्तिके ज्ञानरूप मननमें और तत्प्रत्ययाभ्यासरूप—वस्त्वाकार वृत्तिके अभ्यास-रूप—निदिध्यासनमें वस्तुके परिज्ञानकी विशदताकी—प्रतिबन्धशून्यताकी—हेतुता लौकिक प्रमाणोंसे निश्चित ही है, इसलिए मनन आदिमें विधिकी अपेक्षा न होनेसे विधिके तुल्य अर्थवादके समान प्रशंसाके द्वारा केवल प्रवृत्तिमें अतिशय करनेसे श्रवणादिमें विधित्वका व्यवहार [ सूत्र और भाष्यमें ] किया गया है । इसलिए श्रवणविधिका अभाव होनेसे कर्मकाण्डके विचारके समान ब्रह्मकाण्डका विचार भी अध्ययन विधिसे ही प्राप्त है, यह आचार्य वाचस्पतिके पक्षका अनुसरण करनेवाले वेदान्तियोंका मत है* ॥ १ ॥
* आचार्य वाचस्पति श्रवण आदिमें विधि नहीं मानते हैं। इसका उन्होंने भामती ग्रन्थमें बड़े ऊहापोहसे विचार किया है। वहाँका कुछ अंश नीचे उद्धृत किया जाता है—'ननु 'आत्मेत्येवोपासीत' इत्यादयो विधयः श्रूयन्ते । न च प्रमत्तगीताः, तुल्यं हि साम्प्रदायिकत्वम् , तस्माद्विधेयेनात्र
| ५० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद , |
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[ टिप्पणी ]
भवितव्यमित्यत आह—तद्विषया लिङादय इति । सत्यं श्रूयन्ते लिङादयः, न त्वमी विधिविषयाः, तद्विषयत्वेऽप्रामाण्यप्रसङ्गात् । हेयोपादेयविषयो हि विधिः । स एव च हेय उपादेयो वा, यं पुरुषः कर्तुमकर्तुमन्यथा वा कर्तुं शक्नोति । तत्रैव च समर्थः कर्ताधिकृतो नियोज्यो भवति । न चैवंभूतान्यात्मश्रवणमननोपासनदर्शनानीति विषयतदनुष्ठात्रोर्विधिव्यापकयोरभावाद्बिधेरभाव इति प्रयुक्ता अपि लिङादयः प्रवर्त्तनायामसमर्था उपल इव क्षुरतैक्ष्ण्यं कुण्ठमप्रमाणीभवन्ति इति । 'अनियोज्यविषयत्वात्' इति । समर्थो हि कर्ताधिकारी नियोज्यः, असमर्थे तु न कर्तृता ततो नाधिकृतोऽतो न नियोज्य इत्यर्थः । यदि विधेरभावान्न विधिवचनानि, किमर्थानि तर्हि वचनान्येतानि विधिच्छायानीति पृच्छति—'किमर्थानि' इति । न चानर्थकानि युक्तानि, स्वाध्यायविध्यधीनग्रहणत्वासुपपत्तेरिति भावः । उत्तरम्—स्वाभाविकेति । अन्यतः प्राप्ता एव हि श्रवणादयो विधिस्ररूपैर्वाक्यैरनूद्यन्ते, न चानुवादोऽप्यप्रयोजनः, प्रवृत्तिविशेषकरत्वात् । तथाहि—तत्तदिष्टानिष्टविषयेप्साजिहासापहृतहृदयतया बहिर्मुखो न प्रत्यगात्मनि समाधातुमर्हति । आत्मश्रवणादिविधिसरूपैस्तु वचनैर्मनसो विषयस्रोतः खिलीकृत्य प्रत्यगात्मस्रोत उद्घात्यते इति प्रवृत्तिविशेषकरताऽनुवादानामस्तीति सप्रयोजनतया स्वाध्यायविध्यधीनग्रहणत्वमुपपद्यत इति । [ भामती कल्पतरु पृ० १२९ पं० २२ निर्णयसा० ] इसी भामतीके नीचे कल्पतरुकारने व्याख्यारूपसे कहा है कि 'दर्शनार्थं कर्तव्यत्वेनान्वयव्यतिरेकावगतान् श्रवणादीननुवदन्ति वचांसि तद्गतप्राशस्त्यलक्षणया तेषु रुचिमुत्पाद्यानात्मचिन्तायामरुचिं कुर्वन्ति, प्रवृत्त्यतिशयं जनयन्तीत्यर्थः । [ वेदान्तकल्पतरु पृ० १३० नि० सा० पं० २८ ] इस ग्रन्थका भाव यह है—'आत्मेत्येवोपासीत' ( आत्माकी उपासना करे ) इत्यादि विधि सुनी जाती है, इसलिए वेदान्तोंको विधायक मानना चाहिए । ये किसी प्रमत्त—पागल व्यक्तिसे कहे गये हैं, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि साम्प्रदायिकता तुल्य है, इसलिए विधेय हो सकते हैं, इसपर कहते हैं—'तद्विषया लिङादयः' । यद्यपि लिङ् आदि सुने जाते हैं, परन्तु वे विधिविषयक नहीं हैं, अन्यथा अप्रामाण्य प्रसक्त होगा। हेय और उपादेयमें विधि होती है। और वही हेय और उपादेय होता है जिसमें पुरुष उलटफेर कर सके, और उसीमें नियोज्य अधिकारी समर्थ होता है, आत्माके श्रवण, मनन और निदिध्यासन आदि वैसे नहीं हैं, अतः विधिव्यापक विषय और अनुष्ठाताका अभाव होनेसे लिङ् आदिके प्रयुक्त होनेपर भी प्रवर्त्तनामें असमर्थ होते हुए पत्थरके ऊपर प्रयुक्त छुरेकी धारके समान कुण्ठित होकर अप्रमाण होते हैं। जो समर्थ है, वही कर्ता और अधिकारी होता है, सामर्थ्यके अभावमें न कर्तृता है और न अधिकारिता ही है, यह तात्पर्य है। यदि विधि न होनेसे ये विधिवचन नहीं हैं तो ये वचन विधिसदृश क्यों हैं? ऐसा ( भाष्यमें ) पूछते हैं—'किमर्थानि'। इत्यादिसे । यदि अनर्थक विधिवाक्य होते, तो स्वाध्यायविधिसे ग्रहण नहीं हो सकता था, इसलिए अनर्थक नहीं हैं, यह भाव है। भाष्यकार उत्तर देते हैं—'स्वाभाविकेति' अन्यसे—लोकसे—प्राप्त होनेके कारण श्रवण आदिका विधिसदृश वाक्योंसे अनुवाद किया जाता है, और अनुवादका प्रयोजन है—प्रवृत्ति करना अर्थात् मनुष्यकी श्रवण आदिमें। भाव यह है कि लौकिक इष्ट और अनिष्ट वस्तुकी प्राप्ति और परिहारमें जिसका हृदय लगा हुआ है, ऐसा बहिर्मुख पुरुष प्रत्यक् आत्मामें अपने चित्तका
विधिविचार ] भाष्यनुवादसहिते ५१
[ टिप्पणी ]
आधान नहीं कर सकता है, परन्तु आत्माके विधायकसदृश वाक्योंसे, तो मनकी विषयवृत्तिका परिहार करके प्रत्यगात्मामें मानसिक वृत्तिके प्रवाहका उद्घाटन करेगा, अतः प्रवृत्तिविशेष- कारिता अनुवादवाक्योंमें है, इसलिए उनका प्रयोजन होनेसे स्वाध्यायविधिसे ग्रहण उपपन्न हो सकता है । कल्पतरुवाक्यका अर्थ है—अपरोक्ष ज्ञानके लिए कर्तव्यरूपसे ज्ञात श्रवण -आदिका अनुवाद करते हुए विधिसदृश वाक्य श्रवण आदिमें प्राशस्त्यका बोधन करके उनमें रुचि उत्पन्न करते हैं और अनात्मविचारमें अरुचि उत्पन्न करते हुए प्रवृत्तिके अतिशयको उत्पन्न करते हैं ।
और भी 'द्रष्टव्यः' ( दर्शन करना चाहिए ) इस विधिका खण्डन करते हुए वाचस्पति- मिश्र कहते हैं—'अत्र चात्मदर्शनं न विधेयम्' तद्धि दृशेरुपलब्धिवचनत्वात् श्रावणं वा स्यात् प्रत्यक्षं वा । प्रत्यक्षमपि लौकिकमहंप्रत्ययो वा भावनाप्रकर्षपर्यन्तजं वा । तत्र श्रावणं न विधेयम्; स्वाध्यायविधिनैवास्य प्रापितत्वात्, कर्मश्रावणवत् । नापि लौकिकप्रत्यक्षम्, तस्य नैसर्गिकत्वात्, न चौपनिषदात्मविषयं भावनाधेयवैशद्यं विधेयम्, तस्योपासनाविधानादेव वाजिनवदनुनिष्पादितत्वात् । इतना कहकर आगे कहते हैं—'द्रष्टव्यः' इत्यादयस्तु विधिसरूपा न विधय इति । ( 'द्रष्टव्यः' इससे यहाँ वेदान्तमें आत्माके दर्शनका भी विधान नहीं है, क्योंकि दृश् धातुका अर्थ ज्ञान होनेसे यह विकल्प होता है कि वह श्रावण ज्ञानका ( कानसे होनेवाले ज्ञानका ) विधान करता है या प्रत्यक्ष ज्ञानका विधान करता है, प्रत्यक्ष ज्ञानमें भी लौकिक अहंप्रत्ययका अथवा भावनाके प्रकर्षसे होनेवाले प्रत्यक्षका ? इसमें श्रावण ज्ञानका विधान नहीं कर सकते, क्योंकि वह तो स्वाध्यायविधिसे ही प्राप्त है, और प्रत्यक्ष ज्ञानका भी विधान नहीं, कर सकते, क्योंकि लौकिक प्रत्यक्ष तो स्वभावतः होता ही है औपनिषद आत्मविषयक भावना वैशद्य भी विधेय नहीं है, क्योंकि वह उपासनाके विधानसे ही वाजिनके समान पीछेसे उत्पन्न होगा ( दूधको फाड़नेसे जो घना भाग होता है उसे आमिक्षा—पनीर कहते हैं और जो पानी बचता है, उसे वाजिन कहते हैं, इस स्थलमें जैसे आमिक्षाके विधानसे ही वाजिन बन जाता है उसके विधानकी आवश्यकता नहीं है, वैसेही उपासनाके विधानसे भावनावैशद्य भी उत्पन्न होगा इसलिए उसका भी विधान करना कोई आवश्यक नहीं है, यह भाव है । इस प्रकारके विकल्पोंसे दर्शनका विधान सिद्ध नहीं कर सकते हैं, इसलिए 'द्रष्टव्यः' आदि—श्रोतव्यः, मन्तव्यः और निदिध्यासितव्यः—विधिके सदृश ही हैं, वस्तुतः विधि नहीं है, यह भाव है । इसमें आदि- शब्दसे आचार्य वाचस्पतिमिश्रने मनन आदिके विधित्वका खण्डन किया है, यह भली भांति अवगत होता है, इस वाचस्पतिमिश्रके मतकी परिपुष्टिके लिए भामतीव्याख्याकारने एक श्लोक भी लिखा है। वह यों है—
"वेदान्ता यद्युपासां विदधति, विधिसंशोधिमीमांसयैव
प्राच्या तर्हारितार्था इति विफलमिदं ब्रह्मजिज्ञासनं स्यात् ।
अप्युत्युच्चातिनीचो जनिमृतिभयभाम्रवैधधीसाध्यमोक्षः
कर्मोत्थैः स्वर्गपश्वाद्यतिमधुरफलैः कोऽपराधः कृतो नः ॥१॥
[ पृ० ११३ क० नि० ]
५२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
[ टिप्पणी ]
यदि वेदान्तवाक्य भी उपासना ( आदिका ) विधान करें, तो विधिके संस्कारके लिए प्रवृत्त पूर्वमीमांसासे ही गतार्थ होंगे, यह ब्रह्मजिज्ञासा विफल हो जायगी और विधि-साध्यमोक्ष उत्पत्तिविनाशशील एवं न्यूनाधिकभावग्रस्त हो जायगा, अतः कर्मजन्य स्वर्ग पश्वादि फलोंने, जो अत्यन्त आवश्यक हैं, क्या अपराध किया ? अर्थात् कर्मोंसे होनेवाले स्वर्ग, पशु आदि फलोंसे मोक्षमें कुछ विशेषता नहीं रहेगी । अतः इससे श्रवणादि विधि नहीं है, यह अत्यन्त स्फुट है । इसी प्रकार 'मनननिदिध्यासनयोरपि न विधिः, तयो-रन्वयव्यतिरेकसिद्धसाक्षात्कारफलयोर्विधिसरूपैर्वचनैरनुवादात्' ( १५३ भाम० नि० ) यह कहा गया है, इसलिए वाचस्पतिमनानुयायी श्रवण आदिको विधि नहीं मानते हैं, यह युक्त है । एक और स्थलमें भी श्रवण आदिके विधित्वके खण्डनमें प्रमाण मिलता है— 'ननु 'आत्मा ज्ञातव्यः' इत्येतद्विधिपरैर्वेदान्तैः तदेकवाक्यतयाऽवबोधे' इत्यादिसे आरम्भ कर 'अयमभिसन्धिः—न तावत् ब्रह्मसाक्षात्कारे पुरुषो नियोक्तव्यः; तस्य ब्रह्मस्वाभाव्येन नित्य-त्वात्, अकार्यत्वात्, नाप्युपासनायाम्; तस्या अपि ज्ञानप्रकर्षे हेतुभावस्यान्वयव्यतिरेकसिद्ध-तया प्राप्तत्वेनाऽविधेयत्वात् । नापि शाब्दबोधे, तस्याप्यधीतवेदस्य पुरुषस्य विदितपदतदर्थस्य समधिगतन्यायतत्त्वस्याप्रत्यूहमुत्पत्तेः' इत्यादि । इसका भाव प्रायः पूर्ववत् ही है ।
विधिच्छायार्थवाद—विधिके सदृश अर्थवाद, जैसे 'उपांशु यागमन्तरा यजति' ( आग्नेय और अग्नीषोमीय पुरोडाशके बीचमें उपांशुयाग करे ) इस प्रकार कहकर फिर कहते हैं— 'विष्णुरुपांशु यष्टव्यः, प्रजापतिरुपांशु यष्टव्यः, अग्नीषोमावुपांशु यष्टव्यौ' यहां पहले जो उपांशुयागमन्तरा' इत्यादि अन्तरा वाक्य है, वह आग्नेय और अग्नीषोमीय पुरोडाशके मध्यवर्ती कालमें उपांशुयागका विधान करता है, इसलिए 'विष्णुरुपांशु' इत्यादि तीन वाक्य मन्त्रवर्णोंसे प्राप्त वैकल्पिक देवताओंका अनुवाद करके 'उपांशु यागमन्तरा यजति' इस अन्तरा वाक्यसे विहित यागकी स्तुति करनेवाले अर्थवाद ही हैं, इस प्रकार पूर्वमीमांसा में प्रतिपादन किया गया है ( अ० २ पा० २ अधि० ४ ) वैसे ही 'आत्मा श्रोतव्यः' इत्यादि वाक्य भी अर्थवाद हैं और प्रशंसार्थक हैं, ऐसा समझना चाहिए ।
कोई लोग श्रवण आदिकी विधि माननेके लिए यह भी कहते हैं कि यदि श्रवण में नियम विधि न मानी जाय, तो 'तत्कारणं सांख्ययोगाभिपन्नम्' इत्यादि श्रुतिमें कहे गये योगकी व्यावृत्ति नहीं होगी, इसलिए नियम मानना चाहिए, परन्तु यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि विधिके न माननेपर भी विचार प्राप्त ही है, कारण कि जो विचार करनेकी सामर्थ्य रखता है, उसे किसी कालमें अपनी या अन्यकी अनुपपत्तिसे तत्त्ववस्तुमें सन्देह हो सकता है, इससे निश्चयात्मक वेदान्तार्थके ज्ञानके लिए विधिके बिना भी योग्यतासे विचार अवश्य प्राप्त हो सकता है, अतः विधिकी आवश्यकता नहीं है। सगुण उपासनाकी व्यावृत्तिके लिए कोई नियम-विधि मानते हैं, उनका भी पक्ष युक्तिसङ्गत नहीं है, क्योंकि जो एकदम निस्पृह है, वह ब्रह्मलोककी प्राप्तिके द्वारा मुक्तिके प्रति साधनभूत सगुणोपासनामें कैसे प्रवृत्त होगा अर्थात् कभी नहीं होगा, अतः सगुणोपासनाकी व्यावृत्तिके लिए भी नियमविधि नहीं मान सकते हैं ।
ब्रह्मलक्षणविचार ] भाषानुवादसहित ५३
जगज्जन्मस्थितिलयेष्वेकैकं ब्रह्मलक्षणम् प्रत्येकं ब्रह्मलिङ्गत्वात् इत्याहुः कौमुदीकृतः ॥ १४ ॥
जगत्के जन्म, स्थिति और लय इनमें से प्रत्येक ब्रह्मका असाधारण धर्म है, अतएव प्रत्येक ब्रह्मका लक्षण हो सकता है यह कौमुदीकार का मत है ॥ १४ ॥
(२) विचार्यस्य च ब्रह्मणः जगज्जन्मस्थितिलयकारणत्वं लक्षणमुक्तं
* विचार्य ब्रह्मका—( जिस ब्रह्मका विचार प्रस्तुत हुआ है उसका ) जग-
* यहाँ पूर्व ग्रन्थसे सङ्गति इस प्रकार है—पूर्व ग्रन्थसे 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इस प्रथम सूत्रका अर्थ संगृहीत किया गया, ब्रह्मका विचार करना चाहिए, इससे ब्रह्म-साक्षात्कारके लिए जिस ब्रह्मविचारकी प्रतिज्ञा हुई, उस विचारके विषय—ब्रह्मका लक्षण करना अत्यन्त आवश्यक है। उसके अनन्तर विचार या विभाग आदि किया जाता है, अतः 'पूर्वं प्रतिज्ञातस्य प्रतिज्ञातस्य लक्षणं ततो विभागादिकम्' इस प्रकार शास्त्रीय परिपाटी है, इससे ब्रह्मके लक्षणके लिए 'जन्माद्यस्य यतः' इस द्वितीय सूत्रके अर्थका इस ग्रन्थसे संग्रह करते हैं।
प्रसङ्गतः लक्षणशब्दार्थका निर्वचन करते हैं, लक्षणशब्दका व्यवहार लक्षण—असाधारण धर्म और लक्ष्यमें देखा जाता है, क्योंकि 'लक्ष्यते अनेन' वा 'लक्ष्यते यत्' इति लक्षणम्, इस प्रकार करण और कर्म व्युत्पत्तिसे असाधारण धर्म और लक्ष्य स्वरूप बोधित होते हैं। प्रकृतमें करणव्युत्पत्तिके आधारपर विचार है, जो असाधारण धर्म होता है अर्थात् जिस धर्ममें अव्याप्ति अतिव्याप्ति और असम्भव दोष नहीं होते हैं, उस धर्मको लक्षण कहते हैं। जो लक्ष्यके एक देशमें—अवयवमें न रहे, उस धर्मको अव्याप्तिदोषसे युक्त कहते हैं, जैसे किसीने गौका लक्षण किया—जिसका कपिल रूप हो, वह गौ है, परन्तु यह नहीं बन सकता, क्योंकि श्वेत गौमें कपिल रूप नहीं है, अतः गोलक्ष्यके एक देशमें—श्वेत गौमें—इस लक्षणके न रहनेसे यह लक्षण अव्याप्तिदोषसे आक्रान्त हुआ। इसी प्रकार अतिव्याप्तिदोष युक्त उसे कहते हैं—जो लक्ष्य में रहकर अलक्ष्यमें भी रहे—जिसकी पूँछ हो, उसे गौ कहना, यह लक्षण यदि गायका किया जाय, तो नहीं बन सकता, क्योंकि महिष आदिकी भी पूँछ होती है, इसी प्रकार असम्भव दोषयुक्तलक्षण उसे कहते हैं—जो धर्म सर्वथा लक्ष्यमें न रहे, जैसे एकशफ जिस पशुका हो, वह गाय है, परन्तु बात ऐसी नहीं है, क्योंकि गायके दो शफ—खुर होते हैं, अतः यहाँ असम्भव दोष है। गौका इन तीनों दोषोंसे रहित 'सास्नावत्त्व' लक्षण है (सास्ना—गौके गलेके नीचेका लटका हुआ भाग)। लक्षणके दो भेद हैं—स्वरूपलक्षण और तटस्थलक्षण। स्वरूपलक्षण याने वस्तुका स्वरूप भी वस्तुका लक्षण है, ब्रह्मका स्वरूप है—सत्य, ज्ञान और आनन्द, इसलिए सत्य, ज्ञान और आनन्द ब्रह्मके स्वरूपलक्षण हैं, यद्यपि पहले असाधारण धर्म ही लक्षण कहा गया है, तथापि सत्य आदिमें अपनी अपेक्षासे ही धर्म-धर्मिभावकी कल्पना करके लक्ष्य-लक्षणभावका निर्वाह करना चाहिए, अतः 'आनन्दो विषयानुभवो नित्यत्वञ्चेति सन्ति धर्मा अपृथक्त्वेऽपि चैतन्यात् पृथगिवावभासन्ते' (आनन्द, विषयका अनुभव और नित्यता ये धर्म यद्यपि अपृथक्—अभिन्न ही हैं, तथापि चैतन्यसे भिन्न जैसे भासते हैं) इस प्रकार
| ५४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' इत्यादिश्रुत्या । जगज्जन्मस्थितिलयेषु
जन्म्स्थितिलयकारणत्वरूप लक्षण 'यतो वा इमानि०' (जिस ब्रह्मसे ये सब भूत उत्पन्न होते हैं) इत्यादि श्रुतिसे ही कहा गया है, [ फलितार्थ यह हुआ कि हम ब्रह्म उसे कहते हैं जो समस्त जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयका कारण हो, इसलिए ब्रह्ममें जो जगत्की उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और लयकी कारणता है, वही असाधारण धर्म होनेसे ब्रह्मका लक्षण है।
वचन भी मिलता है। तटस्थ लक्षण उसे कहते हैं—लक्ष्यके यावत्कालमें न रहकर व्यावर्तक हो, जैसे कि पृथ्वीका गन्ध—तटस्थ लक्षण है, परन्तु यह सभी कालमें नहीं रहता है, क्योंकि महाप्रलयमें परमाणु और उत्पत्तिकालमें घट आदिमें नहीं रहता है, प्रकृतमें ब्रह्मका—जगत्की उत्पत्ति आदिका कारणत्व—तटस्थ लक्षण है। स्वरूप लक्षण तो ऊपर कहा गया ही समझना चाहिए।
'विचारयैस्य च' इसमें चकारका अर्थ—एव—अवधारण है और इसका आगेके 'इत्यादिश्रुत्या' शब्दके साथ सम्बन्ध है। भाव यह होगा कि हम जो ब्रह्मका जगज्जन्मादिकारणत्व लक्षण करते हैं, वह श्रुति ही कहती है, हम अपनी बुद्धिसे व्याप्ति आदि लक्षणके समान उसे नहीं कहते हैं। 'इत्यादिश्रुत्या'में आदि शब्दसे 'येन जातानि जीवन्ति यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व, तद् ब्रह्म' यह वाक्यशेष गृहीत होता है। मूलमें स्थित 'यतो वा' श्रुतिमें 'यत्' शब्दसे ब्रह्मवल्लीमें कहे गये सत्यज्ञानानन्दानन्तात्मक ब्रह्मका परिग्रह होता है, क्योंकि प्रधानका ही सर्वनाम परामर्श करता है, यही कारण है कि 'यत्' शब्दके प्रभावसे 'यतो वा' इत्यादिसे स्वरूपलक्षणका भी लाभ होता है, पञ्चमीके प्रकृत्यर्थक अथवा सामान्यकारणत्ववाची होनेसे अभिन्ननिमित्तोपादानत्वरूप लक्षण प्राप्त होता है। वाक्यशेषसहित 'यतो वा' इत्यादिश्रुतिको यह अर्थ होता है—'इमानि' इस इदं शब्दसे प्रत्यक्षसे उपस्थित सम्पूर्ण पदार्थोंका ग्रहण होता है, यद्यपि भूतशब्द पृथ्वी आदि महाभूत और प्राणियोंमें रूढ है, तथापि प्रकृतमें रूढिका परित्याग करके 'भवन्ति इति भूतानि' (जो उत्पन्न होते हैं वे सब भूत हैं) इस प्रकारकी व्युत्पत्तिसे कार्यमात्रका भूतशब्दसे लाभ करना चाहिए। 'जीवन्ति' शब्दका अर्थ है—स्थितिको पाते हैं। प्रयन्त्यभि-संविशन्ति—लीन होकर जिसके साथ तादात्म्य प्राप्त करते हैं, अर्थात् दिखनेवाले ये समस्त पदार्थ जिस चेतनसे उत्पन्न होनेसे जिसमें स्थित हैं और जिसमें लीन होकर जिसके साथ तादात्म्य लाभ करते हैं, वह—कारण ब्रह्म है और उसे विशेषरूपसे—सच्चिदानन्दैकरसपूर्णप्रत्यग्रूपसे प्रत्यक्ष करनेकी इच्छा करो अर्थात् पूर्वोक्त लक्षणके द्वारा ब्रह्मका विचाररूप। श्रुतिका एकरूपसे पाठ होनेके कारण उक्त एक ही लक्षण प्राप्त होता है, यदि 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, तद् ब्रह्म, येन जीवन्ति तद् ब्रह्म' इत्यादि भिन्न-भिन्नरूपसे पाठ होता, तो जगत्की उत्पत्तिका कारण जो है वह ब्रह्म है, स्थितिके प्रति जो कारण है, वह ब्रह्म है और लयके प्रति जो कारण है वह ब्रह्म है, इस प्रकार तीन लक्षण होते, परन्तु वैसा है नहीं, अतः यह शङ्का हो ही नहीं सकती।
ब्रह्मलक्षणविचार ] भाषानुवादसहित ५५
एकैककारणत्वमप्यनन्यगामित्वाल्लक्षणं भवितुमर्हतीति चेत्, सत्यम्। लक्षण-
[ परन्तु जैसे जगज्जन्मस्थितिलयकारणत्वरूप एक लक्षण करते हैं, वैसे ] जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लय इन तीनोंमेंसे एक-एकका कारणत्व भी अनन्यगामी होनेसे ब्रह्मका लक्षण हो सकता है। [ शङ्काका भाव यह है कि जगत्के जन्म, स्थिति और लय इन तीनोंका जो कारण है, वह ब्रह्म है, इस प्रकार जन्म आदि तीनोंको मिलाकर एक लक्षण क्यों किया जाता है, क्योंकि 'जगज्जन्मकारणत्व, जगत्स्थितिकारणत्व और जगल्लयकारणत्व' अर्थात् जगत्की उत्पत्तिका कारण, जगत्की स्थितिका कारण और जगत्के लयका कारण, इस प्रकार तीन परस्पर निरपेक्ष ब्रह्मके लक्षण हो सकते हैं और ब्रह्मको छोड़कर अन्यत्र जाते भी नहीं हैं*, किन्तु केवल ब्रह्ममें ही रहते हैं, अतः निर्दुष्ट भी हैं, इसलिए एक लक्षण करना अयुक्त है ] सत्य है परस्पर निरपेक्ष ये तीन ही लक्षण हैं। इसीलिए † 'अत्ता चराचरग्रहणात्'
* यद्यपि जगज्जन्म आदिकी कारणता ब्रह्मके समान साङ्ख्याभिमत प्रधानमें भी है, अतः उक्त लक्षण अनन्यगामी नहीं हुआ, क्योंकि प्रधानको साङ्ख्यानुगामी लोग जगत्के उपादान-रूपसे जगज्जन्मके प्रति हेतु, जगत्का आधार होनेसे स्थितिका हेतु और लयका आश्रय होनेसे लयके प्रति भी हेतु मानते हैं, तथापि जगत्की उत्पत्ति आदिका कर्त्ता होकर उनके प्रति जो हेतु हो, वह ब्रह्म है, इस प्रकार लक्षणमें कर्तृत्वका निवेश करनेसे जड़ प्रधानमें अतिव्याप्ति नहीं है, अतः उक्त शङ्का केवल धूलिप्रक्षेप है। इसपर यदि शङ्का की जाय कि जन्म आदिके प्रति जो कर्त्ता है, वही ब्रह्म है, लक्षणके गर्भमें कारणका निवेश क्यों करना ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीवमें अतिव्याप्ति होगी, कारण कि जीव भी अदृष्टके द्वारा जगत्का कर्त्ता होता है, लक्षणमें कारणके प्रवेशसे जीवमें दोष नहीं होगा, क्योंकि स्वल्प जीव जगत्का कारण नहीं हो सकता है। (यहाँ कारणशब्द उपादानकारणपरक है, यह ख्याल रखना चाहिए) इसपर यह कहा जाय कि जीवमें अतिव्याप्ति दोषके निवारण करनेके लिए साक्षात् जगत्की उत्पत्तिके प्रति कर्त्ता—साक्षात्जगज्जन्मकर्तृत्वरूप ब्रह्मका लक्षण करते हैं, अतः परम्परा जगत्के कर्त्ता-जीवमें दोष नहीं होनेसे कारणत्वका लक्षणमें प्रवेश व्यर्थ है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उपादानत्वकी—अर्थात् जगत्के प्रति उपादानत्वकी—भी स्वतन्त्र लक्षण-रूपसे विवक्षा हो सकती है, माया ब्रह्मरूप उपादानमें घटक है और प्रधान आदि अप्रामाणिक हैं, अतः उनमें दोष नहीं है, यह भाव है।
† 'अत्ता चराचरग्रहणात्' इस सूत्रका निम्नलिखित अर्थ होता है—अत्ता—'यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः। मृत्युर्यस्योपरोचनं क इत्था वेद यत्र सः' (जिसके ब्रह्म—ब्राह्मण और क्षत्त—क्षत्रिय अदनीय हैं और मृत्यु उपरोचन (दाल आदि) है, ऐसा संहार करनेवाला