भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 590 में से

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पृष्ठ 77

विधिविचार ] भाषानुवादसहित ४९


मोक्षाय ज्ञातव्ये भाषाप्रबन्धादीनामप्राप्तेश्च । न च 'सहकार्यन्तरविधिः' इत्यधिकरणे बाल्यपाण्डित्यमौनशब्दितेषु श्रवणमनननिदिध्यासनेषु विधिरभ्युपगत इति वाच्यम् , विचारे विचार्य्यतात्पर्य्यनिर्णयहेतुत्वस्य वस्तु-सिद्ध्यनुकूलयुक्त्यनुसन्धानरूपे मनने तत्प्रत्ययाभ्यासरूपे निदिध्यासने च वस्त्ववगमवैशद्यहेतुत्वस्य च लोकसिद्धत्वेन तेषु विध्यनपेक्षात् विधिच्छायार्थवादस्येव प्रशंसाद्वारा प्रवृत्त्यतिशयकरत्वमात्रेण तत्र विधिव्यवहारात् । एवं च श्रवणविध्यभावात् कर्मकाण्डविचारवत् ब्रह्मकाण्डविचारोऽप्यध्ययनविधिमूल इत्याचार्यवाचस्पतिपक्षानुसारिणः ॥ १ ॥


फलका पर्यवसायी होगा, इससे मोक्षके लिए ज्ञातव्य वेदके अर्थभूत ब्रह्ममें भाषाग्रन्थ आदिकी व्यावृत्ति सिद्ध ही है, अतः भाषाप्रबन्धकी निवृत्तिके लिये वेदान्तनियमविधिकी कोई आवश्यकता नहीं है । परन्तु 'सहकार्यन्तरविधिः' इत्यादि अधिकरणमें श्रवण, मनन और निदिध्यासनमें, जिनका क्रमशः पाण्डित्य, बाल्य और मौनशब्दसे व्यवहार किया गया है, सूत्रकार और भाष्यकारने विधि मानी है, इसलिए श्रवण-विधि नहीं है, यह कहना असङ्गत है, नहीं असङ्गत नहीं है, क्योंकि विचारमें विचार-विषय-तात्पर्यके निश्चयात्मक ज्ञानकी हेतुता एवं वस्तुकी सिद्धिमें हेतुभूत युक्तिके ज्ञानरूप मननमें और तत्प्रत्ययाभ्यासरूप—वस्त्वाकार वृत्तिके अभ्यास-रूप—निदिध्यासनमें वस्तुके परिज्ञानकी विशदताकी—प्रतिबन्धशून्यताकी—हेतुता लौकिक प्रमाणोंसे निश्चित ही है, इसलिए मनन आदिमें विधिकी अपेक्षा न होनेसे विधिके तुल्य अर्थवादके समान प्रशंसाके द्वारा केवल प्रवृत्तिमें अतिशय करनेसे श्रवणादिमें विधित्वका व्यवहार [ सूत्र और भाष्यमें ] किया गया है । इसलिए श्रवणविधिका अभाव होनेसे कर्मकाण्डके विचारके समान ब्रह्मकाण्डका विचार भी अध्ययन विधिसे ही प्राप्त है, यह आचार्य वाचस्पतिके पक्षका अनुसरण करनेवाले वेदान्तियोंका मत है* ॥ १ ॥


* आचार्य वाचस्पति श्रवण आदिमें विधि नहीं मानते हैं। इसका उन्होंने भामती ग्रन्थमें बड़े ऊहापोहसे विचार किया है। वहाँका कुछ अंश नीचे उद्धृत किया जाता है—'ननु 'आत्मेत्येवोपासीत' इत्यादयो विधयः श्रूयन्ते । न च प्रमत्तगीताः, तुल्यं हि साम्प्रदायिकत्वम् , तस्माद्विधेयेनात्र