भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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४८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सिद्धतया संन्यासविधायकश्रुत्यन्तरमपेक्ष्य श्रोतव्यवाक्येन तस्य व्यापारान्तरनिवृत्त्युपदेशस्य व्यर्थत्वात् ।

न च विचारविध्यसम्भवेऽपि विचारविषयवेदान्तनियमविधिः सम्भवति, भाषाप्रबन्धादिन्यावर्त्यसत्त्वादिति शङ्क्यम् । सन्निधानादेव वेदान्तनियमस्य लब्धत्वेन विधिविषयत्वायोगात्, ‘स्वाध्यायोऽध्येतव्यः’ इत्यर्थावबोधार्थनियमविधिवलादेवाध्ययनगृहीतवेदोत्पादितं वेदार्थज्ञानं फलपर्यवसायि, न कारणान्तरोत्पादितमित्यस्यार्थस्य लब्धत्वेन वेदार्थे ब्रह्मणि


( व्यावहारिक ) अन्य व्यापारकी निवृत्ति तो ब्रह्मसंस्थाके साथ संन्यासविधायक 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' ( ब्रह्मसंस्थ पुरुष अमृत पाता है ) इस इतर श्रुतिसे सिद्ध ही है, इसलिए संन्यासविधायक अन्य श्रुतिकी अपेक्षा करके 'श्रोतव्यः' वाक्यसे उस अन्य व्यापारकी निवृत्तिका उपदेश करना सर्वथा व्यर्थ है ।

और यह भी शङ्का नहीं करनी चाहिए कि विचारविधिके न रहनेपर भी विचारविषयत्वरूपसे वेदान्तमें नियमविधि हो सकती है, क्योंकि भाषा-प्रबन्ध आदि व्यावर्तय हैं । कारण कि सन्निधिसे ही वेदान्तनियमके प्राप्त होनेसे ( वेदान्त ) विधिविषयके अयोग्य हैं । [ शङ्काकर्ताका अभिप्राय यह है कि विचारविधिका खण्डन करनेपर भी वेदान्तनियमविधि—अर्थात् विचार करना चाहिए, तो वेदान्तोंका ही, इस प्रकारकी विधि—हो सकती है । और इससे भाषा-प्रबन्धोंकी व्यावृत्ति होगी । उत्तरदाताका यह भाव है कि—इस प्रकारका नियम श्रवणविधिसे पहले ही प्राप्त हो जाता है, क्योंकि साङ्गवेदका जिसने अध्ययन किया है और साधारणतः ज्ञात ब्रह्मकी विशेषरूपसे जिसको जिज्ञासा हुई, ऐसे पुरुषको जिज्ञासाके निवर्तकका निर्णय करनेके लिए कर्तव्यरूपसे विचारकी प्राप्ति होनेपर विचारविषयके अन्वेषण करनेमें सर्वप्रथम वेदान्त ही बुद्धिस्थ होते हैं। इससे 'वेदान्तोंका ही विचार करना चाहिए' इस प्रकार सबसे पहले बुद्धिके उदय होनेसे वेदान्तविधिके लिए श्रवणविधिकी कोई आवश्यकता नहीं है ] और 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' ( स्वाध्याय—वेद पढ़ना चाहिए ) इस अर्थके परिज्ञानके लिए ( विद्यमान ) नियमविधिके प्रभावसे यह अर्थ प्राप्त होगा कि अध्ययनसे गृहीत वेद द्वारा उत्पादित वेदके अर्थका ज्ञान ही फलका पर्यवसायी है, मोक्ष आदि फलका उत्पादक है, अन्य कारणसे उत्पादित वेदार्थज्ञान

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