भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 590 में से

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पृष्ठ 75

विधिविचार ] भाषानुवादसहित ४७


न च व्यापारान्तरनिवृत्त्यर्था परिसङ्ख्येति वाच्यम्, असंन्यासिनो व्यापारान्तरनिवृत्तेरशक्यत्वात् । संन्यासिनस्तन्निवृत्तेः ब्रह्मसंस्थया सह संन्यासविधायकेन 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' इति श्रुत्यन्तरेण


नहीं है; ऐसी स्मृति भी है— 'ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना'

यज्ञ आदिसे सम्पादित ईश्वरानुग्रहसे ही पुरुषोंको अद्वैत ब्रह्मज्ञानकी इच्छा होती है, यह भाव है । इससे जिस पुरुषको भिन्न आत्मज्ञानमें मुक्तिसाधनत्वका भ्रम है उसमें अद्वैत साक्षात्कारकी इच्छा आदिके न रहनेसे श्रवणविधिमें उसका अधिकार ही नहीं है और उसके प्रति नियमविधि सार्थक भी नहीं है, इसलिए भ्रमी पुरुषकी अन्यत्र प्रवृत्तिका किसी प्रकारसे भी निराकरण नहीं कर सकते हैं, और ईश्वरके अनुग्रहसे अद्वैतमें जिसकी श्रद्धा ही नहीं हुई है, ऐसे पुरुषकी पराभिमतयोजनासे—'आत्मा श्रोतव्यः' इस श्रुतिमें आत्माका अर्थ जीव है, परमात्मा नहीं, क्योंकि 'आत्मनस्तु कामाय' इत्यादि पूर्व वाक्यमें जीव ही प्रकृत है, और 'इदं सर्वं यदयमात्मा' इस प्रकारके वाक्यशेषमें परमात्माका प्रतिपादन किया गया है, इससे 'श्रोतव्यः' वाक्यमें आत्मा—परमात्मा ही है यह भी नहीं कह सकते, क्योंकि वाक्यशेषमें भी परमात्माका प्रतिपादन नहीं कर सकते, कारण कि 'जो यह सब है, वह परमात्मा है' इस प्रकार प्रपञ्च और परमात्माका, जो जड़ और चेतन हैं, परस्पर तादात्म्य नहीं बन सकता । अतः उक्त श्रुति अभेदध्यानपरक है, अद्वैतपरक नहीं—इस प्रकारकी श्रवणवाक्यकी योजनासे भी द्वैतविचारमें भ्रमप्रयुक्त प्रवृत्ति हो सकती है, उसका निराकरण सैकड़ों विधियोंसे भी नहीं हो सकता । ]

श्रवणमें परिसंख्याविधि माननेवाले शङ्का करते हैं कि अन्य व्यापारकी निवृत्ति करनेके लिए 'श्रोतव्यः' वाक्यमें परिसंख्याविधि माननी चाहिए; परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि [ श्रवणविधिसे गृहस्थ आदिके व्यापारकी निवृत्ति होती है या संन्यासीके व्यापार की निवृत्ति होती है ? इन दो विकल्पोंमें पहला पक्ष युक्त नहीं है ] असंन्यासीके-गृहस्थ आदिके व्यापारकी निवृत्ति नहीं कर सकते, कारण कि ऐसा करनेपर अन्य श्रुतियोंसे, जो ब्रह्मसंस्थासे अतिरिक्त व्यापारोंका गृहस्थके प्रति विधान करती हैं, विरोध होगा, [ द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि ] संन्यासीके

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