भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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४६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेदे

तन्निरासकत्वभ्रमेण तत्रापि कस्यचित्प्रवृत्तिः स्यादित्येतावता 'श्रोतव्यः' इति नियमविधेरभ्युपगम इत्यपि न । ईश्वरानुग्रहफलाद्वैतश्रद्धारहितस्य श्रोतव्यवाक्येऽपि पराभिमतयोजनया सद्वितीयात्मविचारविधिपरत्वभ्रमसम्भवेन भ्रमप्रयुक्ताया अन्यत्र प्रवृत्तेर्विधिशतेनाऽप्यपरिहार्यत्वात् ।

शास्त्रकी प्राप्ति ही नहीं है, अतः द्वैत-शास्त्रीय विचारकी व्यावृत्ति करनेके लिए श्रवणकी नियमविधि मानना केवल दुराग्रह है । इस विषयमें और भी शङ्का करते हैं कि ] यद्यपि द्वैत-शास्त्रीय विचार तात्पर्यभ्रमका निवर्तक नहीं है, तथापि निरासकत्वभ्रमसे—'भिन्नात्मज्ञानं मुक्तिसाधनम्' (द्वैतात्मज्ञान मुक्तिका हेतु है) इस प्रकारके भ्रमसे द्वैतशास्त्रमें भी किसी पुरुषकी प्रवृत्ति हो सकती है, इससे उसकी निवृत्तिके लिए 'श्रोतव्यः' इस नियमविधिका अङ्गीकार है, परन्तु यह भी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि अद्वैत-श्रद्धासे, जो ईश्वरकी अनुकम्पाका फल है, शून्य पुरुषकी 'श्रोतव्यः' वाक्यमें भी अन्यमतानुसारी योजनासे सद्वितीयात्मविचारविधिपरत्वका भ्रम हो सकता है इससे भ्रमप्रयुक्त द्वैतवस्तुपरक शास्त्रमें प्रवृत्तिका सैकड़ों विधियोंसे भी परिहार नहीं हो सकता । इसका विशद भाव यह है—इस बातका शास्त्रोंमें निर्विवादरूपसे प्रतिपादन किया गया है कि श्रवणविधिमें वही पुरुष अधिकारी है, जिसको जन्म-जन्मान्तरमें यज्ञ आदिके अनुष्ठानसे बलवती ब्रह्मज्ञानकी इच्छा है और साधन-चतुष्टयसम्पत्ति भी—अर्थात् नित्य और अनित्य वस्तुका विवेचनात्मक ज्ञान, इस लोकके और परलोकके फलभोगमें वैराग्य, मुमुक्षुता, और शम-दमादि—जिसको प्राप्त है। क्योंकि यज्ञ आदिसे सम्पादित जो अदृष्ट है, वह निष्प्रपञ्च अद्वितीय ब्रह्मसाक्षात्कारमें साङ्गवेदान्तके अध्ययनसे लब्ध वेदान्तोंसे मुक्तिकी साधनताके निश्चयका सम्पादन करके अद्वितीय आत्मसाक्षात्कारमें विविदिषाकार अद्वैत ब्रह्मज्ञानकी इच्छाका उत्पादन करता है और उसके द्वारा अद्वितीय आत्मसाक्षात्कारके साधन अद्वितीयआत्माके श्रवण आदिमें मुमुक्षु पुरुषको प्रवृत्त करता है, नकि जीवभिन्न आत्मज्ञानमें मुक्तिकी साधनताका भ्रमात्मक ज्ञान उत्पन्न कर उसके द्वारा भिन्नात्मज्ञान और इसके कारणविचार आदिमें इच्छा, प्रवृत्ति आदिका उत्पादन करता है, क्योंकि द्वैतात्मज्ञानकी इच्छामें भिन्नात्मविचार द्वारा यज्ञ आदिके फलभूत निष्प्रपञ्च ब्रह्मसाक्षात्कारकी हेतुता