भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 590 में से

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पृष्ठ 73

[विधिविचार ] भाषानुवादसहित ४५


न च तात्पर्यादिभ्रमनिरसाय वेदान्तविचारार्थिनः कदाचित् द्वैत- शास्त्रेऽपि प्रवृत्तिः स्यात्। तत्राऽपि तदभिमतयोजनया वेदान्तविचार- सत्त्वात् इत्यद्वैतात्मपरवेदान्तविचारनियमविधिरर्थवानिति वाच्यम् , स्वय- मेव तात्पर्यभ्रमहेतोस्तस्य तन्निरासकत्वाभावेन साधनान्तरप्राप्त्यभावात्।


करता है) द्वाररूपसे अपेक्षा नहीं करेगा, अतः लिखित पाठ आदिकी व्यावृत्ति- रूप फलकी असिद्धि होनेसे अध्ययनविधि सार्थक है। [ तात्पर्य यह है कि पहले अतिप्रसङ्ग दिया है—'श्रवणविधिको, जो गुरूपसदनके प्रति प्रधानविधि है, न मानकर अङ्गमूत उपगमनविधि मानी जाय, तो अध्ययनाङ्ग उपगमन- विधिसे ही लिखित पाठकी व्यावृत्ति हो जायगी, अतः अध्ययनकी नियमविधि व्यर्थ होगी', इस अतिप्रसङ्गका परिहार करनेके लिए उपर्युक्त ग्रन्थ है अर्थात् अध्ययनविधिका अङ्गीकार न किया जायगा, तो उपगमनविधिसे लिखित- पाठकी व्यावृत्ति नहीं होगी, क्योंकि 'गुरुमुखसे अक्षरोंका ग्रहण करना इस अर्थका विधायक न उपगमनविधिवाक्य है और न इतरविधिवाक्य है, इसलिए अध्ययनविधि उक्त व्यावृत्तिके लिए अपेक्षित है, अतः श्रवणविधिके न माननेपर भी कोई अतिप्रसङ्ग नहीं है ] ।

[ अब श्रवणको विधि माननेवाले यह शङ्का करते हैं कि यद्यपि तुम्हारे कथनके अनुसार श्रवणविधिका स्वप्रयत्नसाध्य विचार व्यावत्र्य नहीं है, तथापि अन्य व्यावत्र्य है, क्योंकि ] वेदान्तके विचारको चाहनेवाले पुरुषकी तात्पर्य आदिके भ्रमके निराकरण करनेके लिए कदाचित् द्वैतशास्त्रमें ( उस शास्त्रमें, जिसमें ईश्वर और जीवका भेदप्रतिपादन किया गया है ) प्रवृत्ति हो सकती है, कारण कि द्वैतप्रतिपादक शास्त्रमें भी अपने मतके अनुकूल वेदान्तका विचार किया गया है, इसलिए अद्वैत आत्मपरक वेदान्तविचार श्रवणकी नियमविधि सार्थक है—श्रवणविधिका खण्डन करना अकाण्डताण्डव है ? नहीं, यह शङ्का व्यर्थ है, क्योंकि जो स्वयं तात्पर्यभ्रमका कारण है, वह तात्पर्यभ्रमका निराकरणकर्ता कैसे हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता, इसलिए अन्य साधनकी प्राप्ति ही नहीं है [ भाव यह है कि जो द्वैतशास्त्र हैं, वे सब-के सब तात्पर्यभ्रमको उत्पन्न करनेवाले हैं, हटानेवाले नहीं हैं, इससे तात्पर्यभ्रमके दूरीकरणके लिए अद्वैत-शास्त्रको छोड़कर द्वैत-

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