सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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विचारविध्यभावेऽपि विज्ञानार्थतया विधीयमानं गुरूपसदनं दृष्टद्वारसम्भवे अदृष्टकल्पनायोगात् गुरुमुखाधीनवेदान्तविचारद्वारैव विज्ञानार्थं पर्यवस्यतीति । अत एव स्वप्रयत्नसाध्यविचारव्यावृत्तिः । अध्ययनविध्यभावे तूपगमनं विधीयमानमक्षरावाप्त्यर्थत्वेनाऽविधीयमानत्वान्न तदर्थं गुरुमुखोच्चारणानूच्चारणमध्ययनं द्वारीकरोतीति लिखितपाठादिन्यावृत्त्यसिद्धेः सफलोऽध्ययननियमविधिः ।
वेदान्तविचारकी विधि न होनेपर भी गुरूपसदनका—गुरुके पास विज्ञानार्थ गमनका, जिसका कि विज्ञानरूप प्रयोजनके लिए विधान है, गुरुमुखके अधीन वेदान्तविचारके द्वारा ही विज्ञानमें पर्यवसान होता है अर्थात् 'गुरुमेवोपगच्छेत्' इत्यादिसे गुरुके समीपमें विहित जो गमन है, वह गुरुमुखसे सम्पादित वेदान्तविचाररूप दृष्ट द्वारा विज्ञानकी—आत्मज्ञानकी उत्पत्ति करेगा अदृष्ट द्वारा नहीं । क्योंकि जब तक दृष्ट द्वारकी सम्भावना हो, तब तक अदृष्ट द्वारका अङ्गीकार करना उचित नहीं है । इसीसे—'तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्' ( उसके ज्ञानके लिए गुरुके पास ही जावे ) इस उपगमनविधिसे ही अपने आप—गुरुके बिना स्वतः प्रयत्नसे किये गये वेदान्तविचारकी व्यावृत्ति हो सकती है, तो पुनः 'श्रोतव्यः' को स्वप्रयत्नसाध्य विचारके निरासके लिए विधि माननेकी आवश्यकता नहीं है । [ परन्तु पहले कहा जा चुका है कि उपगमनविधि विचारविधिकी अङ्ग है, अतः विचारविधि यदि न मानी जाय तो उपगमनविधिका स्वरूप ही न बनेगा, इसलिए विचारविधिका स्वीकार अवश्य करना चाहिए ? नहीं—इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानके प्रति गुरूपसदन जब द्वारकी ( मध्यवर्ती व्यापारकी ) अपेक्षा करेगा, तब लोकसिद्ध गुरुके अधीन विचार ही द्वाररूपसे प्राप्त हो सकता है, अतः श्रोतव्यविधिकी अपेक्षा ही नहीं है, तो उपगमनविधि विचारविधिकी अङ्ग नहीं है और विचारके समान उपगमन भी विद्याका अङ्ग हो सकता है, इससे पूर्वोक्त शङ्काका अवसर नहीं है । ] यदि अध्ययनविधि न मानी जाय, तो विधीयमान जो उपगमन है, वह अक्षरग्रहणके लिए नहीं है, इससे वह अक्षरग्रहणके लिए गुरुमुख-उच्चारणके अनन्तर उच्चारणकी अर्थात् अध्ययनकी ( वेदाध्ययनमें पहले वेदमन्त्रको गुरु कहते हैं अनन्तर शिष्य उसीका उच्चारण