भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 590 में से

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पृष्ठ 78
५०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद ,

[ टिप्पणी ]

भवितव्यमित्यत आह—तद्विषया लिङादय इति । सत्यं श्रूयन्ते लिङादयः, न त्वमी विधिविषयाः, तद्विषयत्वेऽप्रामाण्यप्रसङ्गात् । हेयोपादेयविषयो हि विधिः । स एव च हेय उपादेयो वा, यं पुरुषः कर्तुमकर्तुमन्यथा वा कर्तुं शक्नोति । तत्रैव च समर्थः कर्ताधिकृतो नियोज्यो भवति । न चैवंभूतान्यात्मश्रवणमननोपासनदर्शनानीति विषयतदनुष्ठात्रोर्विधिव्यापकयोरभावाद्बिधेरभाव इति प्रयुक्ता अपि लिङादयः प्रवर्त्तनायामसमर्था उपल इव क्षुरतैक्ष्ण्यं कुण्ठमप्रमाणीभवन्ति इति । 'अनियोज्यविषयत्वात्' इति । समर्थो हि कर्ताधिकारी नियोज्यः, असमर्थे तु न कर्तृता ततो नाधिकृतोऽतो न नियोज्य इत्यर्थः । यदि विधेरभावान्न विधिवचनानि, किमर्थानि तर्हि वचनान्येतानि विधिच्छायानीति पृच्छति—'किमर्थानि' इति । न चानर्थकानि युक्तानि, स्वाध्यायविध्यधीनग्रहणत्वासुपपत्तेरिति भावः । उत्तरम्—स्वाभाविकेति । अन्यतः प्राप्ता एव हि श्रवणादयो विधिस्ररूपैर्वाक्यैरनूद्यन्ते, न चानुवादोऽप्यप्रयोजनः, प्रवृत्तिविशेषकरत्वात् । तथाहि—तत्तदिष्टानिष्टविषयेप्साजिहासापहृतहृदयतया बहिर्मुखो न प्रत्यगात्मनि समाधातुमर्हति । आत्मश्रवणादिविधिसरूपैस्तु वचनैर्मनसो विषयस्रोतः खिलीकृत्य प्रत्यगात्मस्रोत उद्घात्यते इति प्रवृत्तिविशेषकरताऽनुवादानामस्तीति सप्रयोजनतया स्वाध्यायविध्यधीनग्रहणत्वमुपपद्यत इति । [ भामती कल्पतरु पृ० १२९ पं० २२ निर्णयसा० ] इसी भामतीके नीचे कल्पतरुकारने व्याख्यारूपसे कहा है कि 'दर्शनार्थं कर्तव्यत्वेनान्वयव्यतिरेकावगतान् श्रवणादीननुवदन्ति वचांसि तद्गतप्राशस्त्यलक्षणया तेषु रुचिमुत्पाद्यानात्मचिन्तायामरुचिं कुर्वन्ति, प्रवृत्त्यतिशयं जनयन्तीत्यर्थः । [ वेदान्तकल्पतरु पृ० १३० नि० सा० पं० २८ ] इस ग्रन्थका भाव यह है—'आत्मेत्येवोपासीत' ( आत्माकी उपासना करे ) इत्यादि विधि सुनी जाती है, इसलिए वेदान्तोंको विधायक मानना चाहिए । ये किसी प्रमत्त—पागल व्यक्तिसे कहे गये हैं, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि साम्प्रदायिकता तुल्य है, इसलिए विधेय हो सकते हैं, इसपर कहते हैं—'तद्विषया लिङादयः' । यद्यपि लिङ् आदि सुने जाते हैं, परन्तु वे विधिविषयक नहीं हैं, अन्यथा अप्रामाण्य प्रसक्त होगा। हेय और उपादेयमें विधि होती है। और वही हेय और उपादेय होता है जिसमें पुरुष उलटफेर कर सके, और उसीमें नियोज्य अधिकारी समर्थ होता है, आत्माके श्रवण, मनन और निदिध्यासन आदि वैसे नहीं हैं, अतः विधिव्यापक विषय और अनुष्ठाताका अभाव होनेसे लिङ् आदिके प्रयुक्त होनेपर भी प्रवर्त्तनामें असमर्थ होते हुए पत्थरके ऊपर प्रयुक्त छुरेकी धारके समान कुण्ठित होकर अप्रमाण होते हैं। जो समर्थ है, वही कर्ता और अधिकारी होता है, सामर्थ्यके अभावमें न कर्तृता है और न अधिकारिता ही है, यह तात्पर्य है। यदि विधि न होनेसे ये विधिवचन नहीं हैं तो ये वचन विधिसदृश क्यों हैं? ऐसा ( भाष्यमें ) पूछते हैं—'किमर्थानि'। इत्यादिसे । यदि अनर्थक विधिवाक्य होते, तो स्वाध्यायविधिसे ग्रहण नहीं हो सकता था, इसलिए अनर्थक नहीं हैं, यह भाव है। भाष्यकार उत्तर देते हैं—'स्वाभाविकेति' अन्यसे—लोकसे—प्राप्त होनेके कारण श्रवण आदिका विधिसदृश वाक्योंसे अनुवाद किया जाता है, और अनुवादका प्रयोजन है—प्रवृत्ति करना अर्थात् मनुष्यकी श्रवण आदिमें। भाव यह है कि लौकिक इष्ट और अनिष्ट वस्तुकी प्राप्ति और परिहारमें जिसका हृदय लगा हुआ है, ऐसा बहिर्मुख पुरुष प्रत्यक् आत्मामें अपने चित्तका

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