सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 79, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंविधिविचार ] भाष्यनुवादसहिते ५१
[ टिप्पणी ]
आधान नहीं कर सकता है, परन्तु आत्माके विधायकसदृश वाक्योंसे, तो मनकी विषयवृत्तिका परिहार करके प्रत्यगात्मामें मानसिक वृत्तिके प्रवाहका उद्घाटन करेगा, अतः प्रवृत्तिविशेष- कारिता अनुवादवाक्योंमें है, इसलिए उनका प्रयोजन होनेसे स्वाध्यायविधिसे ग्रहण उपपन्न हो सकता है । कल्पतरुवाक्यका अर्थ है—अपरोक्ष ज्ञानके लिए कर्तव्यरूपसे ज्ञात श्रवण -आदिका अनुवाद करते हुए विधिसदृश वाक्य श्रवण आदिमें प्राशस्त्यका बोधन करके उनमें रुचि उत्पन्न करते हैं और अनात्मविचारमें अरुचि उत्पन्न करते हुए प्रवृत्तिके अतिशयको उत्पन्न करते हैं ।
और भी 'द्रष्टव्यः' ( दर्शन करना चाहिए ) इस विधिका खण्डन करते हुए वाचस्पति- मिश्र कहते हैं—'अत्र चात्मदर्शनं न विधेयम्' तद्धि दृशेरुपलब्धिवचनत्वात् श्रावणं वा स्यात् प्रत्यक्षं वा । प्रत्यक्षमपि लौकिकमहंप्रत्ययो वा भावनाप्रकर्षपर्यन्तजं वा । तत्र श्रावणं न विधेयम्; स्वाध्यायविधिनैवास्य प्रापितत्वात्, कर्मश्रावणवत् । नापि लौकिकप्रत्यक्षम्, तस्य नैसर्गिकत्वात्, न चौपनिषदात्मविषयं भावनाधेयवैशद्यं विधेयम्, तस्योपासनाविधानादेव वाजिनवदनुनिष्पादितत्वात् । इतना कहकर आगे कहते हैं—'द्रष्टव्यः' इत्यादयस्तु विधिसरूपा न विधय इति । ( 'द्रष्टव्यः' इससे यहाँ वेदान्तमें आत्माके दर्शनका भी विधान नहीं है, क्योंकि दृश् धातुका अर्थ ज्ञान होनेसे यह विकल्प होता है कि वह श्रावण ज्ञानका ( कानसे होनेवाले ज्ञानका ) विधान करता है या प्रत्यक्ष ज्ञानका विधान करता है, प्रत्यक्ष ज्ञानमें भी लौकिक अहंप्रत्ययका अथवा भावनाके प्रकर्षसे होनेवाले प्रत्यक्षका ? इसमें श्रावण ज्ञानका विधान नहीं कर सकते, क्योंकि वह तो स्वाध्यायविधिसे ही प्राप्त है, और प्रत्यक्ष ज्ञानका भी विधान नहीं, कर सकते, क्योंकि लौकिक प्रत्यक्ष तो स्वभावतः होता ही है औपनिषद आत्मविषयक भावना वैशद्य भी विधेय नहीं है, क्योंकि वह उपासनाके विधानसे ही वाजिनके समान पीछेसे उत्पन्न होगा ( दूधको फाड़नेसे जो घना भाग होता है उसे आमिक्षा—पनीर कहते हैं और जो पानी बचता है, उसे वाजिन कहते हैं, इस स्थलमें जैसे आमिक्षाके विधानसे ही वाजिन बन जाता है उसके विधानकी आवश्यकता नहीं है, वैसेही उपासनाके विधानसे भावनावैशद्य भी उत्पन्न होगा इसलिए उसका भी विधान करना कोई आवश्यक नहीं है, यह भाव है । इस प्रकारके विकल्पोंसे दर्शनका विधान सिद्ध नहीं कर सकते हैं, इसलिए 'द्रष्टव्यः' आदि—श्रोतव्यः, मन्तव्यः और निदिध्यासितव्यः—विधिके सदृश ही हैं, वस्तुतः विधि नहीं है, यह भाव है । इसमें आदि- शब्दसे आचार्य वाचस्पतिमिश्रने मनन आदिके विधित्वका खण्डन किया है, यह भली भांति अवगत होता है, इस वाचस्पतिमिश्रके मतकी परिपुष्टिके लिए भामतीव्याख्याकारने एक श्लोक भी लिखा है। वह यों है—
"वेदान्ता यद्युपासां विदधति, विधिसंशोधिमीमांसयैव
प्राच्या तर्हारितार्था इति विफलमिदं ब्रह्मजिज्ञासनं स्यात् ।
अप्युत्युच्चातिनीचो जनिमृतिभयभाम्रवैधधीसाध्यमोक्षः
कर्मोत्थैः स्वर्गपश्वाद्यतिमधुरफलैः कोऽपराधः कृतो नः ॥१॥
[ पृ० ११३ क० नि० ]