सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 64, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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त्वानुपगमाच्च तयोर्द्वारत्वानुपपत्तेः। ब्रह्मज्ञानस्य विचाररूपातिरिक्तकारणजन्यत्वे तत्प्रामाण्यस्य परतस्त्वापत्तेश्च। तस्मात्तात्पर्यनिर्णयद्वारा पुरुषापराधनिरासार्थत्वेनैव विचाररूपे श्रवणे नियमविधिः। 'द्रष्टव्यः' इति तु दर्शनार्हत्वेन स्तुतिमात्रम्, न श्रवणफलसङ्कीर्तनमिति सङ्क्षेपशारीरकानुसारिणः॥
कारणघटित द्वारत्वकी उपपत्ति ही उनमें नहीं हो सकती है। और यदि यह मानें कि ब्रह्मज्ञान शब्दप्रमाणसे अतिरिक्त विचाररूप कारणसे उत्पन्न होता है, तो ब्रह्मज्ञानके प्रामाण्यको परतस्त्व प्राप्त होगा। परन्तु इसे स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि वेदान्तसिद्धान्तमें ज्ञान स्वतः प्रमाण माना गया है अर्थात् ज्ञानमें रहनेवाला प्रामाण्य ज्ञान-ग्राहक सामग्रीसे ही ग्राह्य होता है, इतरसे नहीं, यही प्रामाण्यका स्वतस्त्व है। और यदि ज्ञानग्राहक शब्द आदि सामग्रीसे अन्य विचारको ज्ञानके प्रति कारण मानें, तो ज्ञानके प्रामाण्यमें परतस्त्वकी आपत्ति स्पष्टरूपसे प्राप्त होगी और सिद्धान्तकी हानि होगी, इसलिए ब्रह्म-ज्ञानके प्रति विचारको परम्परया या साक्षात् कारण नहीं मान सकते। इससे—ब्रह्मज्ञानके विचारफल न होनेसे—तात्पर्यके निर्णय द्वारा (वेदान्तोंका अद्वितीय ब्रह्मके प्रतिपादनमें तात्पर्य है, अन्यत्र नहीं है इस प्रकारके निश्चय द्वारा) पुरुषके तात्पर्यभ्रम आदि अपराधोंके निरास द्वारा ही विचाररूप श्रवणमें नियमविधि है, अर्थात् तात्पर्यनिर्णय द्वारा पुरुषोंके दोषोंका निरास ही विचारका फल है, और श्रवणसे ही इस फलका सम्पादन करना चाहिए, अन्य साधनोंसे नहीं, यह भाव है। परन्तु 'द्रष्टव्यः' (अपरोक्ष साक्षात्कार करना चाहिए) इस प्रकार श्रवणके फलका कथन है, इसलिए श्रवणसे-विचारसे अपरोक्ष साक्षात्कार हो सकता है? यदि इस प्रकार कोई शङ्का करे तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि आत्मा द्रष्टव्य है—दर्शनके योग्य है, इस प्रकार यह दर्शन केवल स्तुतिमात्र है, वस्तुतः श्रवणसे अपरोक्ष ज्ञान होता है, इस प्रकार श्रवणके फलका कथन नहीं है, यह संक्षेपशारीरकानुयायियोंका मत है ❊।
अवच्छेदक होनेसे अन्यथासिद्धिशून्यत्वके न रहनेसे प्रतिबन्धकाभाव कारण नहीं हो सकता है, इसलिए प्रतिबन्धकाभावमें भी द्वारता नहीं है, अतः तद्द्वारा विचार ब्रह्मज्ञानका कारण नहीं हो सकता है, यह भाव है।
* इस अभिप्रायके सूचक संक्षेपशारीरकके निम्नलिखित श्लोक हैं—