सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंविधिविचार ] भाषानुवादसहित ३७
चिकित्साशास्त्रवत् प्राप्तव्यापारान्तरवारिणी ।
श्रवणे परिसङ्ख्येयमिति वार्तिकवेदिनः ॥ १२ ॥
जैसे ओषधियोंके ज्ञानके लिए आयुर्वेदके अध्ययनमें प्रवृत्त पुरुषको मध्यमें अन्य व्यापार प्राप्त होता है, वैसे ही ब्रह्मज्ञानार्थ प्रवृत्त पुरुषको मध्यमें अन्य व्यापार प्राप्त हो सकता है, अतः प्राप्त अन्य-व्यापारका निवारण करनेवाली परिसंख्या-विधि ही श्रवणमें है, ऐसा वार्तिकके अभिज्ञोंका मत है ॥ १२ ॥
पुरुषोपराधमलिना धिषणा निरवद्यचक्षुरुदयापि यथा ।
न फलाय भर्तृमथिया भवति श्रुतिसम्भवापि तु तथात्मनि धीः ॥१४॥
पुरुषोपराधविगमे तु पुनः प्रतिबन्धकव्युदसनातू सफला ।
मणिमन्त्रयोरपगमे तु यथा सति पावकाद् भवति धूमलता ॥१५॥
पुरुषोपराधविनिवृत्तिफलः सकलो विचार इति वेदविदः ।
अनपेक्षतामनुरुध्य गिरः फलवद् भवत् प्रकरणं तदतः ॥१६॥
पुरुषोपराधशतसङ्कुलता विनिवर्त्तते प्रकरणेन गिरः ।
स्वयमेव वेदशिरसो वचनाद् अथ बुद्धिरुद्भवति मुक्तिफला ॥१७॥
इत्यादि (सं० शा० पृ० २३ पुनः मुद्रित) । पहले श्लोकका भाव है—
भर्तृनामक कोई राजाका प्रीतिपात्र सेवक था । उससे द्वेष करनेवाले राजाके अन्य नौकर छलसे उसे अन्यत्र कहीं ले गये, और उस स्थलपर उसको छोड़कर राजाके पास आकर बोले कि आपका वह नौकर मर गया है । इसके अनन्तर कभी उस राजाने उसे अपने उपवनमें देखा । राजा उसे देखकर पिशाचकी भ्रान्तिसे डर गया और भाग गया। इस अवस्थामें निर्दोष चक्षुसे होनेवाला सेवक-विषयक राजाका ज्ञान—'यह मेरा नौकर ही है पिशाच नहीं है' इस प्रकार निश्चयात्मक ज्ञान—उत्पन्न नहीं कर सका, क्योंकि 'मर गया' इस विपरीत संस्कारसे उसका प्रतिबन्ध हो गया था । इसी प्रकार निर्दोष श्रुतिसे उत्पन्न 'मैं ब्रह्म हूँ' इस तरहका ज्ञान भी प्रमाताके पूर्वकालीन विपरीत भावनासे प्रतिबद्ध होनेके कारण ब्रह्मविषयक निश्चयात्मक ज्ञानको उत्पन्न नहीं कर सकता, इसलिए पहले प्रतिबन्धकका निरास करना अत्यन्त अपेक्षित है ।
असम्भावना और विपरीतभावना आदि पुरुषके दोषोंका निराकरण होनेपर असम्भावना आदि प्रतिबन्धकोंके विनाशतः उक्त ज्ञान सफल है, जैसे—मणि और मन्त्रोंके अपगमसे वह्निसे धूमलता उत्पन्न होती है ॥१५॥
चूँकि सम्पूर्ण धर्म और ब्रह्मविचार पुरुषके अपराधकी निवृत्तिके लिए हैं, ऐसा वेदविद् कहते हैं, इसीलिए 'अर्थेऽनुपलब्धे तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात्' (जै० १।१।५) इस सूत्रमें वेदवाक्यकी नितांत अनपेक्षताका बाध न करके शास्त्र और प्रकरण सफल होते हैं, ऐसा कहा गया है ॥ १६ ॥
प्रकरण या शास्त्रसे पुरुषके दोषोंका विनाश होनेपर मुक्तिरूप फलका उत्पादन करनेवाली 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंसे स्वयं ही बुद्धि उत्पन्न होती है ॥१७॥
इस प्रकार ऊपरके सभी श्लोकोंका भाव है, इनके देखनेसे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि विचारका फल-प्रतिबन्धकका विनाश ही संक्षेपशारीरककार मानते हैं ।