भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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३८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेदे


ब्रह्मज्ञानार्थं वेदान्तश्रवणे प्रवृत्तस्य चिकित्साज्ञानार्थं चरकसुश्रुतादि- श्रवणे प्रवृत्तस्येव मध्ये व्यापारान्तरेऽपि प्रवृत्तिः प्रसज्यत इति तन्निवृत्ति- फलकः 'श्रोतव्यः' इति परिसङ्ख्याविधिः । 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' (छा० २ । २३ । १) इति छान्दोग्ये अनन्यव्यापारत्वस्य मुक्त्युपायत्वावधारणात् सम्पूर्वस्य तिष्ठतेः समाप्तिवा- चितया ब्रह्मसंस्थाशब्दशब्दिताया ब्रह्मणि समाप्तेरनन्यव्यापाररूपत्वात् । 'तमेवैकं जानथ अन्या वाचो विमुञ्चथ' इत्याथर्वणे कण्ठत एव व्यापारा-


औषधोंके परिज्ञानके लिए चरक, सुश्रुत आदि आयुर्वेदके ग्रन्थोंके विचार- में प्रवृत्त हुए पुरुषके समान ब्रह्मज्ञानके लिए वेदान्तविचारमें प्रवृत्त हुए पुरुषकी बीच-बीचमें विचारके उपराम कालमें अन्य व्यापारोंमें भी प्रवृत्ति हो सकती है, अतः उनकी निवृत्तिके लिए 'श्रोतव्यः' यह परिसंख्याविधि है। भाव यह है कि औषधोंके परिज्ञानके लिए वैद्यकके ग्रन्थोंके श्रवणमें पुरुषकी प्रवृत्ति होती है, क्योंकि औषधका ज्ञान केवल वैद्यकग्रन्थोंसे ही होता है, अन्य ग्रन्थोंसे नहीं होता। इस परिस्थितिमें यद्यपि दवाके ज्ञानके लिए वैद्यकग्रन्थोंके श्रवणके बिना अन्य व्यापारकी प्रसक्ति नहीं है, तो भी विषयवासनाओंके बलसे मध्यमें इतर व्यापारोंमें पुरुषकी प्रवृत्ति होती है, इसी प्रकार ब्रह्मतत्त्वके यथार्थज्ञानके लिए वेदान्तश्रवणमें प्रवृत्त पुरुष जन्म-जन्मान्तरकी भेदवासनाओंसे आकृष्ट होकर कदाचित् मध्य-मध्यमें अन्य लौकिक और वैदिक व्यापारोंमें भी प्रवृत्त हो सकता है, अतः मध्यमें प्राप्त अन्य व्यापारोंकी निवृत्ति करनेके लिए 'श्रोतव्यः' यह परिसंख्याविधि है।

[ परन्तु जैसे सुश्रुत, चरक आदिके श्रवणमें प्रवृत्त पुरुषको अन्य व्यापार— अन्य शास्त्र श्रवण आदि करनेपर भी चिकित्साका ज्ञान होता है, वैसे ही वेदान्तके श्रवणमें प्रवृत्त पुरुषको बीच-बीचमें अन्य व्यापार करनेपर भी ब्रह्मज्ञान हो सकता है, इसलिए परिसंख्याविधिका स्वीकार निष्फल है ? नहीं, निष्फल नहीं है ] क्योंकि 'ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' ( ब्रह्मनिष्ठ पुरुष अमृतत्व प्राप्त करता है ) इस श्रुतिसे छान्दोग्यमें अनन्यव्यापारत्वका ही मुक्तिके प्रति उपायंरूपसे अवधारण किया गया है, कारण कि सम्पूर्वक 'स्था' धातुके समाप्तिवाची होनेसे ब्रह्मसंस्थाशब्दसे बोधित—ब्रह्ममें समाप्ति अनन्यव्यापाररूप है। और 'तमेवैकं जानथ अन्या