सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 67, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंविधिविचार ] भाषानुवादसहित ३९
न्तरप्रतिषेधाच्च । 'आसुप्तेरामृतेः कालं नयेद्वेदान्तचिन्तया' इत्यादि-स्मृतेश्च । न च ब्रह्मज्ञानानुपयोगिनो व्यापारान्तरस्य एकस्मिन् साध्ये श्रवणेन सह समुच्चित्य प्राप्त्यभावान्न तन्निवृत्त्यर्थः परिसङ्ख्याविधिर्युज्यते इति वाच्यम् , 'सहकार्यन्तरविधिः' ( उ० मी० अ० ३ पा० ४ अधि० १४ सू० ४७ ) इत्यादिसूत्रे 'यस्मात् पक्षे भेददर्शनप्राबल्यान्न प्राप्नोति, तस्मान्नियमविधिः' इति तद्भाष्ये च कृतश्रवणस्य शाब्दज्ञानमात्रात्
वाचो विमुञ्चथ' ( हे मुमुक्षु लोगो ! जिस आधारमें आकाश आदि समस्त जगत् अध्यस्त है, उसी आधारभूत एकरूप आत्माको जानो और अनात्मप्रतिपादक शब्दोंका त्याग करो ) इस श्रुतिसे आथर्वणमें कण्ठसे ही अर्थात् अभिधावृत्तिसे ही शास्त्रान्तरश्रवणका प्रतिषेध किया है, और 'आसुप्तेरामृतेः कालम्०' ( सुप्ति और मृति पर्यन्त कालको वेदान्तके चिन्तनसे वितावे ) इस प्रकारकी स्मृति भी है अर्थात् यह स्मृति भी अन्य व्यापारका प्रतिषेध करती है । परन्तु* ब्रह्मज्ञानरूप एक साध्यमें श्रवणके साथ साथ अनुपयुक्त अन्य व्यापारकी प्राप्ति नहीं होनेसे उसकी निवृत्तिके लिए परिसंख्याविधि युक्त नहीं है ? नहीं, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'सहकार्यन्तरविधिः' इत्यादि सूत्रमें और 'यस्मात् पक्षे भेददर्शनप्राबल्यात् न प्राप्नोति, तस्मान्नियमविधिः' इस प्रकारके उस सूत्रके भाष्यमें—जिसने श्रवण किया
* शङ्का और उत्तर करनेवालोंका अभिप्राय यह है कि परिसंख्याविधि वहीं होती है, जहाँ एक वस्तुके उत्पादनमें एक साथ दो साधनोंकी प्राप्ति हो । परन्तु प्रकृतमें ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यहाँ ब्रह्मज्ञानका उत्पादन करना है, इसके उत्पादनमें श्रवण कारण है, न कि अन्य व्यावहारिक व्यापार, इसलिए एक साथ दो साधनोंकी प्राप्ति न होनेसे अन्य व्यापारकी निवृत्तिके लिए परिसंख्याविधि कैसे होगी ? इसका उत्तर प्रतिबन्दी है अर्थात् भाष्यकारने निदिध्यासनमें नियमविधि मानी है, इसमें कारण केवल यही बतलाया है—श्रवणके बाद शाब्दज्ञानसे अपनेको धन्य समझनेवाला निदिध्यासनमें, जो साक्षात्कारका उपयोगी है, कदाचित् प्रवृत्त न होकर अन्य अनुपयुक्त लौकिक व्यापारमें प्रवृत्त हो जाय, इसलिए निदिध्यासनमें नियमविधिका अङ्गीकार है। उत्तरवादीका भाव यह है—साक्षात्कारके जननमें पक्षमें असाधनकी प्राप्तिकी सम्भावनामात्रसे निदिध्यासनके अप्राप्तांशकी परिपूर्तिसे जैसे नियमविधि मानी गई है, वैसे ही प्रकृतमें श्रवणके साथ समुच्चयसे सम्भावनामात्रसे असाधन की प्राप्ति है, इससे उसकी निवृत्तिके लिए अवश्य श्रवणको परिसंख्याविधि मानना चाहिए ।