भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 590 में से

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पृष्ठ 82
५४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' इत्यादिश्रुत्या । जगज्जन्मस्थितिलयेषु

जन्म्स्थितिलयकारणत्वरूप लक्षण 'यतो वा इमानि०' (जिस ब्रह्मसे ये सब भूत उत्पन्न होते हैं) इत्यादि श्रुतिसे ही कहा गया है, [ फलितार्थ यह हुआ कि हम ब्रह्म उसे कहते हैं जो समस्त जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयका कारण हो, इसलिए ब्रह्ममें जो जगत्की उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और लयकी कारणता है, वही असाधारण धर्म होनेसे ब्रह्मका लक्षण है।

वचन भी मिलता है। तटस्थ लक्षण उसे कहते हैं—लक्ष्यके यावत्कालमें न रहकर व्यावर्तक हो, जैसे कि पृथ्वीका गन्ध—तटस्थ लक्षण है, परन्तु यह सभी कालमें नहीं रहता है, क्योंकि महाप्रलयमें परमाणु और उत्पत्तिकालमें घट आदिमें नहीं रहता है, प्रकृतमें ब्रह्मका—जगत्की उत्पत्ति आदिका कारणत्व—तटस्थ लक्षण है। स्वरूप लक्षण तो ऊपर कहा गया ही समझना चाहिए।

'विचारयैस्य च' इसमें चकारका अर्थ—एव—अवधारण है और इसका आगेके 'इत्यादिश्रुत्या' शब्दके साथ सम्बन्ध है। भाव यह होगा कि हम जो ब्रह्मका जगज्जन्मादिकारणत्व लक्षण करते हैं, वह श्रुति ही कहती है, हम अपनी बुद्धिसे व्याप्ति आदि लक्षणके समान उसे नहीं कहते हैं। 'इत्यादिश्रुत्या'में आदि शब्दसे 'येन जातानि जीवन्ति यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व, तद् ब्रह्म' यह वाक्यशेष गृहीत होता है। मूलमें स्थित 'यतो वा' श्रुतिमें 'यत्' शब्दसे ब्रह्मवल्लीमें कहे गये सत्यज्ञानानन्दानन्तात्मक ब्रह्मका परिग्रह होता है, क्योंकि प्रधानका ही सर्वनाम परामर्श करता है, यही कारण है कि 'यत्' शब्दके प्रभावसे 'यतो वा' इत्यादिसे स्वरूपलक्षणका भी लाभ होता है, पञ्चमीके प्रकृत्यर्थक अथवा सामान्यकारणत्ववाची होनेसे अभिन्ननिमित्तोपादानत्वरूप लक्षण प्राप्त होता है। वाक्यशेषसहित 'यतो वा' इत्यादिश्रुतिको यह अर्थ होता है—'इमानि' इस इदं शब्दसे प्रत्यक्षसे उपस्थित सम्पूर्ण पदार्थोंका ग्रहण होता है, यद्यपि भूतशब्द पृथ्वी आदि महाभूत और प्राणियोंमें रूढ है, तथापि प्रकृतमें रूढिका परित्याग करके 'भवन्ति इति भूतानि' (जो उत्पन्न होते हैं वे सब भूत हैं) इस प्रकारकी व्युत्पत्तिसे कार्यमात्रका भूतशब्दसे लाभ करना चाहिए। 'जीवन्ति' शब्दका अर्थ है—स्थितिको पाते हैं। प्रयन्त्यभि-संविशन्ति—लीन होकर जिसके साथ तादात्म्य प्राप्त करते हैं, अर्थात् दिखनेवाले ये समस्त पदार्थ जिस चेतनसे उत्पन्न होनेसे जिसमें स्थित हैं और जिसमें लीन होकर जिसके साथ तादात्म्य लाभ करते हैं, वह—कारण ब्रह्म है और उसे विशेषरूपसे—सच्चिदानन्दैकरसपूर्णप्रत्यग्रूपसे प्रत्यक्ष करनेकी इच्छा करो अर्थात् पूर्वोक्त लक्षणके द्वारा ब्रह्मका विचाररूप। श्रुतिका एकरूपसे पाठ होनेके कारण उक्त एक ही लक्षण प्राप्त होता है, यदि 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, तद् ब्रह्म, येन जीवन्ति तद् ब्रह्म' इत्यादि भिन्न-भिन्नरूपसे पाठ होता, तो जगत्की उत्पत्तिका कारण जो है वह ब्रह्म है, स्थितिके प्रति जो कारण है, वह ब्रह्म है और लयके प्रति जो कारण है वह ब्रह्म है, इस प्रकार तीन लक्षण होते, परन्तु वैसा है नहीं, अतः यह शङ्का हो ही नहीं सकती।

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