सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 81, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मलक्षणविचार ] भाषानुवादसहित ५३
जगज्जन्मस्थितिलयेष्वेकैकं ब्रह्मलक्षणम् प्रत्येकं ब्रह्मलिङ्गत्वात् इत्याहुः कौमुदीकृतः ॥ १४ ॥
जगत्के जन्म, स्थिति और लय इनमें से प्रत्येक ब्रह्मका असाधारण धर्म है, अतएव प्रत्येक ब्रह्मका लक्षण हो सकता है यह कौमुदीकार का मत है ॥ १४ ॥
(२) विचार्यस्य च ब्रह्मणः जगज्जन्मस्थितिलयकारणत्वं लक्षणमुक्तं
* विचार्य ब्रह्मका—( जिस ब्रह्मका विचार प्रस्तुत हुआ है उसका ) जग-
* यहाँ पूर्व ग्रन्थसे सङ्गति इस प्रकार है—पूर्व ग्रन्थसे 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इस प्रथम सूत्रका अर्थ संगृहीत किया गया, ब्रह्मका विचार करना चाहिए, इससे ब्रह्म-साक्षात्कारके लिए जिस ब्रह्मविचारकी प्रतिज्ञा हुई, उस विचारके विषय—ब्रह्मका लक्षण करना अत्यन्त आवश्यक है। उसके अनन्तर विचार या विभाग आदि किया जाता है, अतः 'पूर्वं प्रतिज्ञातस्य प्रतिज्ञातस्य लक्षणं ततो विभागादिकम्' इस प्रकार शास्त्रीय परिपाटी है, इससे ब्रह्मके लक्षणके लिए 'जन्माद्यस्य यतः' इस द्वितीय सूत्रके अर्थका इस ग्रन्थसे संग्रह करते हैं।
प्रसङ्गतः लक्षणशब्दार्थका निर्वचन करते हैं, लक्षणशब्दका व्यवहार लक्षण—असाधारण धर्म और लक्ष्यमें देखा जाता है, क्योंकि 'लक्ष्यते अनेन' वा 'लक्ष्यते यत्' इति लक्षणम्, इस प्रकार करण और कर्म व्युत्पत्तिसे असाधारण धर्म और लक्ष्य स्वरूप बोधित होते हैं। प्रकृतमें करणव्युत्पत्तिके आधारपर विचार है, जो असाधारण धर्म होता है अर्थात् जिस धर्ममें अव्याप्ति अतिव्याप्ति और असम्भव दोष नहीं होते हैं, उस धर्मको लक्षण कहते हैं। जो लक्ष्यके एक देशमें—अवयवमें न रहे, उस धर्मको अव्याप्तिदोषसे युक्त कहते हैं, जैसे किसीने गौका लक्षण किया—जिसका कपिल रूप हो, वह गौ है, परन्तु यह नहीं बन सकता, क्योंकि श्वेत गौमें कपिल रूप नहीं है, अतः गोलक्ष्यके एक देशमें—श्वेत गौमें—इस लक्षणके न रहनेसे यह लक्षण अव्याप्तिदोषसे आक्रान्त हुआ। इसी प्रकार अतिव्याप्तिदोष युक्त उसे कहते हैं—जो लक्ष्य में रहकर अलक्ष्यमें भी रहे—जिसकी पूँछ हो, उसे गौ कहना, यह लक्षण यदि गायका किया जाय, तो नहीं बन सकता, क्योंकि महिष आदिकी भी पूँछ होती है, इसी प्रकार असम्भव दोषयुक्तलक्षण उसे कहते हैं—जो धर्म सर्वथा लक्ष्यमें न रहे, जैसे एकशफ जिस पशुका हो, वह गाय है, परन्तु बात ऐसी नहीं है, क्योंकि गायके दो शफ—खुर होते हैं, अतः यहाँ असम्भव दोष है। गौका इन तीनों दोषोंसे रहित 'सास्नावत्त्व' लक्षण है (सास्ना—गौके गलेके नीचेका लटका हुआ भाग)। लक्षणके दो भेद हैं—स्वरूपलक्षण और तटस्थलक्षण। स्वरूपलक्षण याने वस्तुका स्वरूप भी वस्तुका लक्षण है, ब्रह्मका स्वरूप है—सत्य, ज्ञान और आनन्द, इसलिए सत्य, ज्ञान और आनन्द ब्रह्मके स्वरूपलक्षण हैं, यद्यपि पहले असाधारण धर्म ही लक्षण कहा गया है, तथापि सत्य आदिमें अपनी अपेक्षासे ही धर्म-धर्मिभावकी कल्पना करके लक्ष्य-लक्षणभावका निर्वाह करना चाहिए, अतः 'आनन्दो विषयानुभवो नित्यत्वञ्चेति सन्ति धर्मा अपृथक्त्वेऽपि चैतन्यात् पृथगिवावभासन्ते' (आनन्द, विषयका अनुभव और नित्यता ये धर्म यद्यपि अपृथक्—अभिन्न ही हैं, तथापि चैतन्यसे भिन्न जैसे भासते हैं) इस प्रकार