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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

ब्रह्मलक्षणविचार ] भाषानुवादसहित ५३

जगज्जन्मस्थितिलयेष्वेकैकं ब्रह्मलक्षणम् प्रत्येकं ब्रह्मलिङ्गत्वात् इत्याहुः कौमुदीकृतः ॥ १४ ॥

जगत्‌के जन्म, स्थिति और लय इनमें से प्रत्येक ब्रह्मका असाधारण धर्म है, अतएव प्रत्येक ब्रह्मका लक्षण हो सकता है यह कौमुदीकार का मत है ॥ १४ ॥

(२) विचार्यस्य च ब्रह्मणः जगज्जन्मस्थितिलयकारणत्वं लक्षणमुक्तं

* विचार्य ब्रह्मका—( जिस ब्रह्मका विचार प्रस्तुत हुआ है उसका ) जग-


* यहाँ पूर्व ग्रन्थसे सङ्गति इस प्रकार है—पूर्व ग्रन्थसे 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इस प्रथम सूत्रका अर्थ संगृहीत किया गया, ब्रह्मका विचार करना चाहिए, इससे ब्रह्म-साक्षात्कारके लिए जिस ब्रह्मविचारकी प्रतिज्ञा हुई, उस विचारके विषय—ब्रह्मका लक्षण करना अत्यन्त आवश्यक है। उसके अनन्तर विचार या विभाग आदि किया जाता है, अतः 'पूर्वं प्रतिज्ञातस्य प्रतिज्ञातस्य लक्षणं ततो विभागादिकम्' इस प्रकार शास्त्रीय परिपाटी है, इससे ब्रह्मके लक्षणके लिए 'जन्माद्यस्य यतः' इस द्वितीय सूत्रके अर्थका इस ग्रन्थसे संग्रह करते हैं।

प्रसङ्गतः लक्षणशब्दार्थका निर्वचन करते हैं, लक्षणशब्दका व्यवहार लक्षण—असाधारण धर्म और लक्ष्यमें देखा जाता है, क्योंकि 'लक्ष्यते अनेन' वा 'लक्ष्यते यत्' इति लक्षणम्, इस प्रकार करण और कर्म व्युत्पत्तिसे असाधारण धर्म और लक्ष्य स्वरूप बोधित होते हैं। प्रकृतमें करणव्युत्पत्तिके आधारपर विचार है, जो असाधारण धर्म होता है अर्थात् जिस धर्ममें अव्याप्ति अतिव्याप्ति और असम्भव दोष नहीं होते हैं, उस धर्मको लक्षण कहते हैं। जो लक्ष्यके एक देशमें—अवयवमें न रहे, उस धर्मको अव्याप्तिदोषसे युक्त कहते हैं, जैसे किसीने गौका लक्षण किया—जिसका कपिल रूप हो, वह गौ है, परन्तु यह नहीं बन सकता, क्योंकि श्वेत गौमें कपिल रूप नहीं है, अतः गोलक्ष्यके एक देशमें—श्वेत गौमें—इस लक्षणके न रहनेसे यह लक्षण अव्याप्तिदोषसे आक्रान्त हुआ। इसी प्रकार अतिव्याप्तिदोष युक्त उसे कहते हैं—जो लक्ष्य में रहकर अलक्ष्यमें भी रहे—जिसकी पूँछ हो, उसे गौ कहना, यह लक्षण यदि गायका किया जाय, तो नहीं बन सकता, क्योंकि महिष आदिकी भी पूँछ होती है, इसी प्रकार असम्भव दोषयुक्तलक्षण उसे कहते हैं—जो धर्म सर्वथा लक्ष्यमें न रहे, जैसे एकशफ जिस पशुका हो, वह गाय है, परन्तु बात ऐसी नहीं है, क्योंकि गायके दो शफ—खुर होते हैं, अतः यहाँ असम्भव दोष है। गौका इन तीनों दोषोंसे रहित 'सास्नावत्त्व' लक्षण है (सास्ना—गौके गलेके नीचेका लटका हुआ भाग)। लक्षणके दो भेद हैं—स्वरूपलक्षण और तटस्थलक्षण। स्वरूपलक्षण याने वस्तुका स्वरूप भी वस्तुका लक्षण है, ब्रह्मका स्वरूप है—सत्य, ज्ञान और आनन्द, इसलिए सत्य, ज्ञान और आनन्द ब्रह्मके स्वरूपलक्षण हैं, यद्यपि पहले असाधारण धर्म ही लक्षण कहा गया है, तथापि सत्य आदिमें अपनी अपेक्षासे ही धर्म-धर्मिभावकी कल्पना करके लक्ष्य-लक्षणभावका निर्वाह करना चाहिए, अतः 'आनन्दो विषयानुभवो नित्यत्वञ्चेति सन्ति धर्मा अपृथक्त्वेऽपि चैतन्यात् पृथगिवावभासन्ते' (आनन्द, विषयका अनुभव और नित्यता ये धर्म यद्यपि अपृथक्—अभिन्न ही हैं, तथापि चैतन्यसे भिन्न जैसे भासते हैं) इस प्रकार

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५४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते' इत्यादिश्रुत्या । जगज्जन्मस्थितिलयेषु

जन्म्स्थितिलयकारणत्वरूप लक्षण 'यतो वा इमानि०' (जिस ब्रह्मसे ये सब भूत उत्पन्न होते हैं) इत्यादि श्रुतिसे ही कहा गया है, [ फलितार्थ यह हुआ कि हम ब्रह्म उसे कहते हैं जो समस्त जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयका कारण हो, इसलिए ब्रह्ममें जो जगत्की उत्पत्ति, स्थिति (पालन) और लयकी कारणता है, वही असाधारण धर्म होनेसे ब्रह्मका लक्षण है।

वचन भी मिलता है। तटस्थ लक्षण उसे कहते हैं—लक्ष्यके यावत्कालमें न रहकर व्यावर्तक हो, जैसे कि पृथ्वीका गन्ध—तटस्थ लक्षण है, परन्तु यह सभी कालमें नहीं रहता है, क्योंकि महाप्रलयमें परमाणु और उत्पत्तिकालमें घट आदिमें नहीं रहता है, प्रकृतमें ब्रह्मका—जगत्की उत्पत्ति आदिका कारणत्व—तटस्थ लक्षण है। स्वरूप लक्षण तो ऊपर कहा गया ही समझना चाहिए।

'विचारयैस्य च' इसमें चकारका अर्थ—एव—अवधारण है और इसका आगेके 'इत्यादिश्रुत्या' शब्दके साथ सम्बन्ध है। भाव यह होगा कि हम जो ब्रह्मका जगज्जन्मादिकारणत्व लक्षण करते हैं, वह श्रुति ही कहती है, हम अपनी बुद्धिसे व्याप्ति आदि लक्षणके समान उसे नहीं कहते हैं। 'इत्यादिश्रुत्या'में आदि शब्दसे 'येन जातानि जीवन्ति यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व, तद् ब्रह्म' यह वाक्यशेष गृहीत होता है। मूलमें स्थित 'यतो वा' श्रुतिमें 'यत्' शब्दसे ब्रह्मवल्लीमें कहे गये सत्यज्ञानानन्दानन्तात्मक ब्रह्मका परिग्रह होता है, क्योंकि प्रधानका ही सर्वनाम परामर्श करता है, यही कारण है कि 'यत्' शब्दके प्रभावसे 'यतो वा' इत्यादिसे स्वरूपलक्षणका भी लाभ होता है, पञ्चमीके प्रकृत्यर्थक अथवा सामान्यकारणत्ववाची होनेसे अभिन्ननिमित्तोपादानत्वरूप लक्षण प्राप्त होता है। वाक्यशेषसहित 'यतो वा' इत्यादिश्रुतिको यह अर्थ होता है—'इमानि' इस इदं शब्दसे प्रत्यक्षसे उपस्थित सम्पूर्ण पदार्थोंका ग्रहण होता है, यद्यपि भूतशब्द पृथ्वी आदि महाभूत और प्राणियोंमें रूढ है, तथापि प्रकृतमें रूढिका परित्याग करके 'भवन्ति इति भूतानि' (जो उत्पन्न होते हैं वे सब भूत हैं) इस प्रकारकी व्युत्पत्तिसे कार्यमात्रका भूतशब्दसे लाभ करना चाहिए। 'जीवन्ति' शब्दका अर्थ है—स्थितिको पाते हैं। प्रयन्त्यभि-संविशन्ति—लीन होकर जिसके साथ तादात्म्य प्राप्त करते हैं, अर्थात् दिखनेवाले ये समस्त पदार्थ जिस चेतनसे उत्पन्न होनेसे जिसमें स्थित हैं और जिसमें लीन होकर जिसके साथ तादात्म्य लाभ करते हैं, वह—कारण ब्रह्म है और उसे विशेषरूपसे—सच्चिदानन्दैकरसपूर्णप्रत्यग्रूपसे प्रत्यक्ष करनेकी इच्छा करो अर्थात् पूर्वोक्त लक्षणके द्वारा ब्रह्मका विचाररूप। श्रुतिका एकरूपसे पाठ होनेके कारण उक्त एक ही लक्षण प्राप्त होता है, यदि 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, तद् ब्रह्म, येन जीवन्ति तद् ब्रह्म' इत्यादि भिन्न-भिन्नरूपसे पाठ होता, तो जगत्की उत्पत्तिका कारण जो है वह ब्रह्म है, स्थितिके प्रति जो कारण है, वह ब्रह्म है और लयके प्रति जो कारण है वह ब्रह्म है, इस प्रकार तीन लक्षण होते, परन्तु वैसा है नहीं, अतः यह शङ्का हो ही नहीं सकती।

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ब्रह्मलक्षणविचार ] भाषानुवादसहित ५५


एकैककारणत्वमप्यनन्यगामित्वाल्लक्षणं भवितुमर्हतीति चेत्, सत्यम्। लक्षण-

[ परन्तु जैसे जगज्जन्मस्थितिलयकारणत्वरूप एक लक्षण करते हैं, वैसे ] जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लय इन तीनोंमेंसे एक-एकका कारणत्व भी अनन्यगामी होनेसे ब्रह्मका लक्षण हो सकता है। [ शङ्काका भाव यह है कि जगत्के जन्म, स्थिति और लय इन तीनोंका जो कारण है, वह ब्रह्म है, इस प्रकार जन्म आदि तीनोंको मिलाकर एक लक्षण क्यों किया जाता है, क्योंकि 'जगज्जन्मकारणत्व, जगत्स्थितिकारणत्व और जगल्लयकारणत्व' अर्थात् जगत्की उत्पत्तिका कारण, जगत्की स्थितिका कारण और जगत्के लयका कारण, इस प्रकार तीन परस्पर निरपेक्ष ब्रह्मके लक्षण हो सकते हैं और ब्रह्मको छोड़कर अन्यत्र जाते भी नहीं हैं*, किन्तु केवल ब्रह्ममें ही रहते हैं, अतः निर्दुष्ट भी हैं, इसलिए एक लक्षण करना अयुक्त है ] सत्य है परस्पर निरपेक्ष ये तीन ही लक्षण हैं। इसीलिए † 'अत्ता चराचरग्रहणात्'


* यद्यपि जगज्जन्म आदिकी कारणता ब्रह्मके समान साङ्ख्याभिमत प्रधानमें भी है, अतः उक्त लक्षण अनन्यगामी नहीं हुआ, क्योंकि प्रधानको साङ्ख्यानुगामी लोग जगत्के उपादान-रूपसे जगज्जन्मके प्रति हेतु, जगत्का आधार होनेसे स्थितिका हेतु और लयका आश्रय होनेसे लयके प्रति भी हेतु मानते हैं, तथापि जगत्की उत्पत्ति आदिका कर्त्ता होकर उनके प्रति जो हेतु हो, वह ब्रह्म है, इस प्रकार लक्षणमें कर्तृत्वका निवेश करनेसे जड़ प्रधानमें अतिव्याप्ति नहीं है, अतः उक्त शङ्का केवल धूलिप्रक्षेप है। इसपर यदि शङ्का की जाय कि जन्म आदिके प्रति जो कर्त्ता है, वही ब्रह्म है, लक्षणके गर्भमें कारणका निवेश क्यों करना ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीवमें अतिव्याप्ति होगी, कारण कि जीव भी अदृष्टके द्वारा जगत्का कर्त्ता होता है, लक्षणमें कारणके प्रवेशसे जीवमें दोष नहीं होगा, क्योंकि स्वल्प जीव जगत्का कारण नहीं हो सकता है। (यहाँ कारणशब्द उपादानकारणपरक है, यह ख्याल रखना चाहिए) इसपर यह कहा जाय कि जीवमें अतिव्याप्ति दोषके निवारण करनेके लिए साक्षात् जगत्की उत्पत्तिके प्रति कर्त्ता—साक्षात्जगज्जन्मकर्तृत्वरूप ब्रह्मका लक्षण करते हैं, अतः परम्परा जगत्के कर्त्ता-जीवमें दोष नहीं होनेसे कारणत्वका लक्षणमें प्रवेश व्यर्थ है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उपादानत्वकी—अर्थात् जगत्के प्रति उपादानत्वकी—भी स्वतन्त्र लक्षण-रूपसे विवक्षा हो सकती है, माया ब्रह्मरूप उपादानमें घटक है और प्रधान आदि अप्रामाणिक हैं, अतः उनमें दोष नहीं है, यह भाव है।

† 'अत्ता चराचरग्रहणात्' इस सूत्रका निम्नलिखित अर्थ होता है—अत्ता—'यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः। मृत्युर्यस्योपरोचनं क इत्था वेद यत्र सः' (जिसके ब्रह्म—ब्राह्मण और क्षत्त—क्षत्रिय अदनीय हैं और मृत्यु उपरोचन (दाल आदि) है, ऐसा संहार करनेवाला

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५६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

त्रयमेवेदं परस्परनिरपेक्षम् । अत एव 'अत्ता चराचरग्रहणात्' इत्याद्यधिकरणेषु (उ० मी० अ० १ पा० २ अधि० १ सू० ९) सर्वसंहर्तृत्वादिकं ब्रह्मलिङ्गतयोपन्यस्तमिति कौमुदीकारः ।

उपादानत्वविज्ञत्ववस्त्वन्तरनिराक्रियाः ।
व्युत्क्रमाल्लघुधुमाचख्युरन्ये संवलितं त्रयम् ॥ १५ ॥

व्युत्क्रमसे अर्थात् जगज्जन्मस्थितिलयकारणत्वरूप लक्षणके घटक उलटे पदोंसे— (लयकारणत्व, स्थितिकरणत्व और उत्पत्तिकारणत्वके कथनसे) एक ही ब्रह्मरूप वस्तुमें उपादनत्व, सर्वज्ञत्व और अन्य वस्तुके निराकरणके लाभके लिए तीनोंको मिलाकर एक ही जगज्जन्मस्थितिलयकारणत्वरूप लक्षण है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १५ ॥

अन्ये तु जन्मकारणत्वस्य स्थितिकारणत्वस्य च निमित्तकारणसाधारण्यात् उपादानत्वप्रत्यायनाय प्रपञ्चस्य ब्रह्मणि लयो दर्शितः । अस्तु ब्रह्म

इत्यादि अधिकरणोंमें सर्वसंहतृत्व (सबका संहारकर्ता) आदिका ब्रह्मके लिङ्ग—ज्ञापकरूपसे उपन्यास किया है, इस प्रकार कौमुदीकार कहते हैं।

जन्मकारणता और स्थितिकारणताके निमित्तकारणसाधारण होनेसे उपादानकारणताका सूचन करनेके लिए ब्रह्ममें प्रपञ्चका विलय ['यतो वा' इत्यादि श्रुतिमें 'यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' शब्दसे] दिखलाया गया है, [यदि उपादानत्वका सूचन प्रपञ्चके विलयके प्रदर्शनके विना नहीं हो सकता है, तो केवल लयकारणत्व ही ब्रह्मका लक्षण करो, क्योंकि इसीसे ब्रह्ममें उपादान-कारणत्वका लाभ होगा, इसपर 'अस्तु' इत्यादिसे कहते हैं] ब्रह्म जगत्का उपादान भले ही हो, परन्तु जैसे घटकी उत्पत्तिमें मिट्टीरूप उपादान कारणसे 'अन्य निमित्तकारण-कुलाल होता है, वैसे जगत्की उत्पत्तिमें ब्रह्मरूप उपादानसे


परमात्मा, जिस निर्विशेषमें भेदकल्पनासे है, उस निर्विशेष परमात्माको उक्तरूपसे कौन जानता है अर्थात् कोई नहीं जानता) इस श्रुतिमें कहा गया अशनकर्ता परमात्मा ही है, क्योंकि चर और अचरका अत्तृत्व परिगृहीत है, अतः जीव आदिका परिग्रह नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वह चराचरका अत्ता नहीं हो सकता।

'इत्याद्यधिकरणमें' आदि शब्दसे अन्तर्याम्यधिकरण [उ० मी० अ० १ पा० २ अ० ५ सू० १८] और जगद्वाचित्वाऽधिकरण [उ० मी० अ० १ पा० ४ अधि० ५ सू० १६] ये दो अधिकरण लिये जाते हैं।

सर्वसंहर्तृत्वादिमें आदि शब्दसे सर्वनियन्तृत्वरूप सर्वस्थितिकर्तृत्व और सर्वजगदुत्पत्तिकर्तृत्व इन दोनोंका ग्रहण करना चाहिए।

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ब्रह्मलक्षणविचार ] भाषानुवादसहित ५७


जगदुपादानम्, तज्जन्मनि घटजन्मनि कुलालवत्, तत्स्थितौ राज्यस्थेमनि राजवच्च उपादानादन्यदेव निमित्तं भविष्यतीति शङ्काव्यवच्छेदाय तस्यैव जगज्जननजीवननियामकत्वमुक्तम् । तथा चैकमेवेदं लक्षणम् अभिन्ननिमित्तोपादानतयाऽद्वितीयं ब्रह्मोपलक्षयतीत्याहुः ॥ २ ॥

तत्रोपादानता विश्वविवर्तास्पदता चितः ।
स्वाभिन्नन्यूनसत्ताऽर्थो विवर्त इति कथ्यते ॥ १६ ॥

लक्षणमें जो उपादानता है, वह ब्रह्मकी समस्त प्रपञ्चरूपसे विवर्ताश्रयतारूप है और विवर्त उसे कहते हैं—जो उपादानरूपसे अभिमत वस्तुसे अभिन्न होकर न्यूनसत्तावाला हो ॥ १६ ॥

ब्रह्मणश्च उपादानत्वम् अद्वितीयकूटस्थचैतन्यरूपस्य न परमाणूनामिवारम्भकत्वरूपम्, न वा प्रकृतेरिव परिणामित्वरूपम्, किन्त्वविद्यया वियदादिप्रपञ्चरूपेण विवर्तमानत्वलक्षणम् ।


अन्य कर्तृरूप कोई निमित्तकारण होगा। जैसे पालनरूप राज्यकी स्थिरतामें पालनीय प्रजा आदिके उपादानसे भिन्न राजा निमित्त कारण है, वैसे ही जगत्‌की स्थिति और पालनमें उपादानसे अन्य नियन्तृरूपसे स्थितिहेतुभूत कोई निमित्त कारण होगा, इस प्रकारकी शङ्काका निराकरण करनेके लिए उसी एक ही ब्रह्ममें श्रुति द्वारा जगज्जननजीवननियामकता—जगत्‌के जन्म और पालनके प्रति कारणता कही गई है, अतः जगज्जन्मनियामकता और जगत्पालननियामकतासे जगदुपादानमें ही जगत्‌के जनन आदिके प्रति निमित्तकारणताके सिद्ध होनेपर यह श्रुति द्वारा कहा गया जगज्जन्म-स्थिति-लयकारणत्वरूप एक ही लक्षण होकर अभिन्ननिमित्तोपादानत्वरूपसे अद्वितीय ब्रह्मको उपलक्षित करता है—ब्रह्मसे भिन्न वस्तुके अस्तित्वकी शङ्काके निराकरण द्वारा अद्वितीय ब्रह्मका बोधन करता है । तीन लक्षण इस अर्थके प्रतिपादक नहीं हैं, यह भाव है ॥२॥

अद्वितीय कूटस्थ चैतन्यरूप ब्रह्ममें जो जगत्‌की उपादानकारणता है, वह परमाणुओंके समान आरम्भकत्वरूप नहीं है अथवा प्रकृतिके समान परिणामितारूप भी नहीं है, किन्तु अविद्यासे आकाश आदि प्रपञ्चके आकारसे विवर्तमानतारूप है ।

५८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

वस्तुतस्तत्समसत्ताकोऽन्यथाभावः परिणामः, तदसमसत्ताको विवर्त इति वा; कारणसलक्षणोऽन्यथाभावः परिणामः, तद्विलक्षणो विवर्त इति वा;

[ नैयायिकोंके मतमें द्व्यणुक आदि जगत्‌के प्रति परमाणु उपादान कारण होते हैं, परन्तु आरम्भकत्वरूपसे होते हैं तथा साङ्ख्यमतावलम्बी प्रकृतिको परिणामितारूपसे जगत्‌के प्रति उपादान कारण मानते हैं, इन दो मतोंके अनुसार अर्थात् आरम्भकत्व और परिणामित्व रूपसे ब्रह्मको जगत्‌के प्रति उपादान कारण नहीं मानना चाहिए, क्योंकि जो कूटस्थ अद्वितीय चैतन्यात्मा है, वह आरम्भक नहीं हो सकता और परिणामवादमें परिणाम और परिणामीका अभेद होनेसे ब्रह्ममें भी विकारिता और जन्म आदिकी प्रसक्ति होगी, अतः उक्त दोनों पक्ष सङ्गत नहीं हैं, इसलिए अविद्या द्वारा प्रपञ्चरूपसे विवर्तमानतारूप उपादानता ही ब्रह्ममें अभीष्ट है अर्थात् जैसे रज्जु आदिमें आरोपित सर्प आदिकी अधिष्ठानता है, वैसे ही ब्रह्ममें जगद्रूप विवर्ताधिष्ठानता है, यह भाव है। इसपर एक विचार होता है कि ब्रह्म और उसके विवर्त जगत्‌का परस्पर अभेद सिद्धान्तमें माना जाता है, अतः आरम्भवादमें आरभ्य और आरम्भकका अभेद न होनेसे उसके त्याग करनेपर भी परिणामवादमें अभेदका सम्भव होनेसे परिणामवाद और विवर्तवादमें कोई वैषम्य सिद्ध नहीं होता है ? इसलिए विवर्त और परिणामके भिन्न स्वरूप प्रदर्शनार्थ उनके पृथक् पृथक् लक्षण करते हैं— ]

उपादानरूपसे अभिमत वस्तुकासमान सत्तावाला अन्यथाभाव—पूर्वरूपकी अपेक्षा अन्यरूपसे अवस्थान—परिणाम है और उपादानसे विलक्षण-सत्तावाला अन्यथाभाव विवर्त है । अथवा कारण—उपादानकारणका समानलक्षण—समानधर्मी अन्यथाभाव परिणाम है और उपादानसे विलक्षण—असमानधर्मी—अन्यथाभाव विवर्त है * ।


* वस्तुतस्तत्सममानसत्ताकोऽन्यथाभावः—इस लक्षणमें वस्तुशब्दसे उस वस्तुका ग्रहण है, जो उपादानत्वरूपसे अभिमत हो, पूर्वरूपकी अपेक्षा अन्यरूपसे अवस्थान—अन्यथाभाव अर्थात् अवस्थाविशेष, यह कैसा होना चाहिए ? तत्समानसत्ताक—तेन समा सत्ता यस्य—अन्यथाभावस्य स तथा अर्थात् उपादानभूत वस्तुकी सत्ता और उससे उत्पन्न हुए कार्यकी सत्ता समान होनी चाहिए, यह भाव है। जैसे—मृत्तिकाका परिणाम है—घट, घटका उपादान कारण है—मृत्तिका और घट है मृत्तिकाका अन्यथाभाव, घटकी जो व्यावहारिक सत्ता है, वही उपादान कारण मृत्तिकाकी

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ब्रह्मलक्षणविचार ] भाषानुवादसहित ५९


[ टिप्पणी ]

है, अतः घटरूप मृत्तिकाके अन्यथाभावमें मृत्तिकारूप उपादानकी समानसत्ता होनेसे घट मृत्तिकाका परिणाम हुआ । ब्रह्मका जगत् परिणाम नहीं हो सकता है, क्योंकि ब्रह्मकी सत्ता त्रिकालाबाधित है अर्थात् पारमार्थिक है और जगत्‌की सत्ता व्यावहारिक है । उपादानका अन्यथाभाव उपादानकी सत्तासे यदि विषमसत्तावाला हो, तो वह विवर्त होगा, जैसे—शुक्तिका विवर्त है—रजत । शुक्ति और उसमें उत्पन्न प्रातीतिक रजतकी समान सत्ता नहीं है, क्योंकि शुक्तिकी व्यावहारिक सत्ता है और रजतकी प्रातिभासिक सत्ता है । इन लक्षणोंका परिष्कार इस प्रकार किया जाता है—उपादानत्वाभिमतवस्तुसत्तासमानसत्ताकत्वे सति तदवस्थाविशेषरूपत्वम्—तत्परिणामत्वम् । सत्यन्त अर्थात् विशेषण दल इसलिए दिया गया है कि विवर्तमें अतिव्याप्ति दोष न हो और विशेष्य दल इसलिए दिया गया है—घट आदिमें तन्तु आदिके परिणामत्वका निराकरण हो । इसी प्रकार विवर्तका लक्षण—'उपादानत्वाभिमतवस्तुसत्ताविषमसत्ताकत्वे सति तदवस्थाविशेषरूपत्वम्' है । परिणामका वारण करनेके लिए सत्यन्त विशेषण है और विशेष्यदल ब्रह्ममें मृत्परिणामत्वकी व्यावृत्तिके लिए है । ये उपर्युक्त दो लक्षण पारमार्थिक, व्यावहारिक और प्रातिभासिक सत्ताओंको मानकर किये गये हैं । यदि ये तीन सत्ताएँ न मानी जायें और घट, शुक्ति, रजत आदि सब जगह ब्रह्मस्वरूपसत्ता ही मान ली जाय, तो इस पक्षमें उक्त दो लक्षण परिणाम और विवर्तके नहीं होंगे, इसलिए 'कारणसलक्षणो' इत्यादिसे परिणाम और विवर्तका अन्य लक्षण करते हैं । इसका अर्थ होगा 'उपादानत्वाभिमतवस्तुलक्षणसमानलक्षणत्वे सति तदवस्थाविशेषत्वं तत्परिणामत्वम्' यहाँ जडरूप धर्मसे सालक्षण्य सजातीयत्व विवक्षित है अर्थात्—उपादानत्वरूपसे गृहीत जो वस्तु है उसके जडरूप धर्मसे सजातीय उपादानकी अन्य अवस्था परिणाम होगी, मृत्तिकाके परिणाम घटमें यह घटता है—उपादानभूत वस्तु है मृत्तिका और उसकी अन्य अवस्था है—घट, इन उपादान और उपादेयमें जडत्वरूप धर्मके अस्तित्वसे सजातीयता है । ब्रह्मके विवर्त जगत्‌में, चेतनत्वके न होनेसे, ब्रह्मरूप-उपादानसजातीयताका अभाव है, अतः ब्रह्मके विवर्त जगत्‌में परिणामका लक्षण नहीं गया, इसलिए अतिव्याप्ति दोष नहीं है । मृत्तिकामें घटके परिणामत्वका वारण करनेके अभिप्रायसे विशेष्य दलका प्रवेश है और प्रपञ्चमें संवित्का परिणामत्व न हो, अतः सत्यन्त विशेषण है, यह समझना चाहिए ।

विवर्तका लक्षण होगा—'उपादानत्वाभिमतवस्तुविलक्षणत्वे सति तदवस्थाविशेषत्वम्' अर्थात् उपादानत्वरूपसे परिगृहीत वस्तुसे विलक्षण होकर उस उपादानरूप वस्तुका अवस्थाविशेष विवर्त है, यहाँ चित्त्व और जडत्व रूप धर्मोंसे विलक्षणता विवक्षित है । शुक्ति-रजतमें, जो शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यका विवर्त है, उक्त लक्षणका समन्वय भली भांति होता है, शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्य ही अविद्याके समवधानसे रजताकारसे विवर्तभावको प्राप्त होता है, अतः चैतन्यसे रजत अवश्य विलक्षण हुआ, क्योंकि चैतन्यमें चित्त्वधर्म है और रजतमें जडत्व है, इसी प्रकार ब्रह्म और जगत्‌में भी चित्त्व और जडत्वसे वैलक्षण्य होनेसे ब्रह्मके विवर्त जगत्‌में भी लक्षणसमन्वय हो जायगा । चैतन्यमें जडविवर्तत्वके परिहारके लिए विशेष्यदल है और मृत्परिणाम घट आदिमें मृद्विवर्तत्वके निराकरणके लिए विशेषणांश है ।


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६०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

कारणाभिन्नं कार्यं परिणामः, तदभेदं विनैव तद्व्यतिरेकेण दुर्वचं कार्यं विवर्तः इति वा विवर्तपरिणामयोर्विवेकः ॥ ३ ॥

अथवा उपादान कारणसे अभिन्न कार्य परिणाम है और उपादानसे अभिन्न न होकर उपादानके बिना दुर्वच–जिसका निर्वचन करना सम्भव नहीं ऐसा कार्य विवर्त है । इस प्रकार विवर्त और परिणाममें भेद है* ॥३॥


  • अन्य रीतिसे भी विवर्त और परिणामके लक्षण कहते हैं—'उपादानकारणत्वाभिमतवस्तु-भिन्नत्वे सति तत्कार्यत्वम्, परिणामत्वम् । अर्थात् कारणरूपसे मानी जानेवाली वस्तुसे अभिन्न होकर उसका जो कार्य हो, वह परिणाम । घट मृत्तिकासे अभिन्न भी है और मृत्तिकाका कार्य भी है, अतः लक्षणसमन्वय है ।

और 'तदभेदं विनैव तद्व्यतिरेकेण दुर्वचं कार्यं विवर्तः' इस मूलसे कार्यरूप विवर्तका ही लक्षण किया गया है, क्योंकि मूलकारने लक्षणमें कार्यशब्दका प्रक्षेप किया है, अथवा लक्षणमें कार्यत्वकी अविवक्षा करनी चाहिए, इससे अनादि अविद्यामें भी, जो ब्रह्मविवर्त है, विवर्तत्वका लक्षण घट जायगा और अव्याप्ति नहीं होगी । 'तदभेदं विना' इसका अर्थ—वस्तुसत् अभेदके विना, अतः प्रातीतिक अभेद होनेपर भी असङ्गति नहीं है । इसलिए कार्यरूप विवर्तके लक्षणका परिष्कार हुआ—'उपादानत्वाभिमतवस्तुनः सकाशात् वस्तुतो भेदाभेदाभ्यां दुर्निरूपत्वे सति कार्यत्वम् । अविद्यामें अतिव्याप्तिका वारण करनेके लिए विशेष्यदल है । आरम्भवादमें और परिणामवादमें क्रमशः अभेद और भेदसे कार्यका निरूपण अशक्य होनेसे उस स्थलमें दोषवारण करनेके लिए 'भेदाऽभेदाभ्याम्' इतना लक्षण-कुक्षिमें निविष्ट है, सिद्धान्तमें कार्य और कारणमें अभेदका उपगम होनेसे असम्भवका वारण करनेके लिए 'वस्तुतः' कहा गया है ।

कार्य और कारणका परस्पर भेद है या अभेद है, इसका निर्वचन नहीं कर सकते, क्योंकि उनका यदि भेद माना जाय, तो उसपर यह शङ्का होती है कि 'घट ही मृत्तिका है, तन्तु ही पट हैं और सुवर्ण ही कुण्डल है, इस प्रकार सामानाधिकरण्य कैसे होगा, भेदमें सामानाधिकरण्य नहीं देखा जाता । अन्यथा रासभ और उष्ट्रका भी परस्पर सामानाधिकरण्य होने लगेगा, और विशेषरूपसे समालोचना करनेपर मृत्तिकासे पृथक् घट या तन्तुओंसे अतिरिक्त पट देखनेमें नहीं आता । यदि कारण और कार्य भिन्न होते तो अवश्य कार्य और कारणका पृथक्रूपसे अस्तित्व देखा जाता ।

दूसरी बात यह है कि कारकव्यापारके पूर्व क्षणमें भी मृत्तिकामें घटकी सत्ताका स्वीकार करना चाहिए, ऐसा न माननेपर शशशृङ्गके समान असत् पदार्थकी उत्पत्तिके अभावका प्रसङ्ग आवेगा और उत्पत्तिकालके पूर्वमें असत् कार्यको माननेमें उत्पत्ति क्रियाके प्रति कर्तृत्वकी उपपत्ति नहीं होगी और शशशृङ्ग आदि असत् पदार्थोंकी भी उत्पत्ति प्रसक्त होगी । इन युक्तियोंसे हम कार्यके अस्तित्वका स्वीकार करनेके लिए बाध्य होते हैं तो पूर्वमें कार्य और कारणके अभेदकी सिद्धि भी

ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ६१


अथ शुद्धमुपादानमीश्वरो जीव एव वा ।
शुद्धं सङ्क्षेपकमते ज्ञेयलक्षणवर्णनात् ॥ १७ ॥

अब संशय होता है कि शुद्ध ब्रह्म उपादान है या ईश्वररूप या जीवरूप ? इसमें शुद्ध ब्रह्म उपादान है, ऐसा संक्षेपशारीरककारका मत है, क्योंकि ज्ञेय ब्रह्मका ही लक्षण किया गया है ॥ १७ ॥

अथ शुद्धं ब्रह्म उपादानमिष्यते, ईश्वररूपम्, जीवरूपं वा । अत्र


अब ब्रह्ममें सामान्यरूपसे उपादानत्वके ज्ञात होनेके बाद जिज्ञासा होती है कि जिस ब्रह्मको समस्त जगत्‌के प्रति उपादान कारण मानते हो, क्या वह


अगत्या माननी होगी, और इसीसे उत्तर क्षणमें भी अभेदकी ही सिद्धि होगी, इस प्रकार सांख्य-मतानुयायी कहते हैं। कार्य और कारणका भेद माननेवाले नैयायिक लोग कहते हैं कि कार्यकारणका अभेद नहीं हो सकता, क्योंकि जो एक ही वस्तु है उसमें कार्यकारणभाव किसी भी प्रमाणके बलसे सिद्ध नहीं हो सकता अर्थात् एक वस्तुमें अपना कार्यत्व और कारणत्व ये विरुद्ध धर्म कैसे रह सकेंगे और कार्य और कारणका अभेद माननेसे अर्थक्रियाके भेदका अभाव भी होगा—अन्यथा जलका आहरण मृत्तिकासे भी प्रसक्त होगा, क्योंकि अभेदवादियोंके मतमें घट और मृत्तिका एक ही हैं। और मृत्तिकाके समान घटसे भी घटकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग आवेगा। इस प्रकार भेदवादी और अभेदवादीये दर्शित युक्तियोंसे परस्पर प्रतिक्षेप नहीं कर सकते हैं, अतः कार्यका कारणके साथ भेद है या अभेद है तथा कार्यके पूर्वकालमें कार्यका सत्त्व है या असत्त्व है, इसका निरूपण करना असम्भव होनेसे अर्थात् उसे अनृत ही मानना होगा। और जो कारण है, वह तो कार्यके पूर्वकाल और कार्यकालमें अनुवर्तमान है। अतः उसका कार्यसे पृथक्रूपतया निरूपण कर सकते हैं, इसलिए कार्यकी अपेक्षा कारण सत्य होगा, यद्यपि मृत्तिका आदि अवान्तर कारण तत्तत् कार्योंकी तुलनामें सत्यसे है, परन्तु पारमार्थिक सत्यता तो उनमें नहीं ही है, क्योंकि 'वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्' (घट आदि विकारोंका केवल वाणीसे ही व्यवहार होता है, अतः उनका नाम मात्र है, कोई अर्थ नहीं है—अर्थात् वस्तुके न रहनेपर भी 'पुरुषस्य चैतन्यम्' इत्यादिके समान 'घट है' इस प्रकार विकल्प मात्र होता है, तो सत्य क्या है? इसपर श्रुति कहती है 'मृत्तिकेत्येव' अर्थात् कारणरूपसे प्रतीयमान मृत्तिका ही सत् वस्तु है) इस प्रकारकी श्रुति ब्रह्मान्यतिरिक्त सब प्रपञ्चका असत्य और बाधितरूपसे बोधन करती है। यह श्रुति केवल दृष्टान्तरूपमें है—अर्थात् जैसे घट आदि स्थूल विकारोंमें अनुवर्तमान मृत्तिका सत्य है, वैसे ही समन्तात् दृश्यमान पदार्थोंमें अनुवर्तमान 'सत्' पदार्थ ही कारणरूपसे सत्य है और इतर असत्य हैं, इस प्रकार प्रपञ्च, अनिर्वाच्य होनेसे, अनृत है और दुर्वच है, इसलिए मूलकारने ठीक कहा है कि 'तद्व्यतिरेकेण दुर्वचम्' इत्यादि। यहाँ व्यतिरेक शब्दका अर्थ भेद है।

६२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद

सङ्क्षेपशारीरकानुसारिणः केचिदाहुः—शुद्धमेवोपादानम्, जन्मादिसूत्र-तद्भाष्ययोरुपादानत्वस्य ज्ञेयब्रह्मलक्षणत्वोक्तेः।

शुद्ध ब्रह्म है या ईश्वररूप ब्रह्म है अथवा जीवरूप ब्रह्म है ? * । इस प्रश्नके उत्तरमें संक्षेपशारीरकके मतमें श्रद्धा रखनेवाले कुछ लोग कहते हैं कि शुद्ध ब्रह्म † ही उपादान है, क्योंकि 'जन्माद्यस्य यतः' इस सूत्रमें


* शुद्ध ब्रह्म उपादान कारण है, इस विषयमें संक्षेपशारीरकमें यों श्लोक मिलता है— निमित्तं च योनिश्च यत्कारणं तत् परंब्रह्म सर्वस्य जन्मादिभाजः। इति स्पष्टमाचष्ट एषा श्रुतिर्नः कथं सिद्धवलक्षणं सिद्धिवान्धम्॥ [सं०शा०अ०१ श्लो० ५५३] इस श्लोकका अर्थ है—सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लयके प्रति उपादान और निमित्तभूत जो कारण है, वह परब्रह्म—शुद्धब्रह्म ही है, ऐसा 'यतो वा' इत्यादि श्रुति स्पष्टरूपसे कहती है अर्थात् यद्यपि ऐसा कारण लोकमें प्रसिद्ध नहीं है, तथापि जगज्जन्म आदिके उपादानरूपसे अपूर्व ब्रह्मका श्रुतिप्रतिपादन करती है, अतः यह लक्षणस्वरूपका असाधक किसी रूपसे भी नहीं होगा। इससे यह ज्ञात होता है कि संक्षेपशारीरकके सिद्धान्तसे शुद्ध ब्रह्म ही जगत्का उपादान माना गया है। और 'तद् ब्रह्म' इसके सान्निध्यसे 'यतो वा' इत्यादिसे जगत्के कारणत्वरूपसे प्रतिपादित ब्रह्म ही लेना चाहिए यह 'लोकप्रसिद्धार्थपदान्तराणाम्' (सं० शा० अ० १ श्लो० २९०) इत्यादि श्लोकमें विशेष स्पष्ट शब्दोंसे कहा गया है, अतः अधिक विषय वहींसे जानना चाहिए।

† यहाँ आदिशब्दसे 'सोऽकामयत' (उस ब्रह्माने इच्छा की प्रजारूपमें अनेक होऊँ) 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' (जो सर्वज्ञ है विशेषरूपसे ज्ञानवान् है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंका उद्धरण करना चाहिए। भाव यह है कि यदि शुद्ध ब्रह्म जगत्के प्रति उपादान है, तो उक्त वाक्य, जो ईश्वरके कारणत्वका प्रतिपादन करते हैं, अप्रमाण होंगे, क्योंकि शुद्ध ब्रह्ममें इच्छा और ज्ञानक्रियाकी कर्तृता नहीं हो सकती है, इसलिए शुद्ध ब्रह्म जगत्का उपादान नहीं है, यह श्रुतिसे प्रतीत होता है, परन्तु ईश्वररूप ब्रह्म जगत्का कारण प्रतीत होता है, इसपर संक्षेपशारीरककारके अनुयायी कहते हैं कि उक्त वाक्योंमें कहे गये शबलवाची आत्मशब्दकी शुद्धमें लक्षणा करते हैं, अतः उन वाक्योंसे भी शुद्ध ब्रह्म ही बोधित होता है। इस कल्पनामें केवल हेतु है—'जन्माद्यस्य यतः' यह सूत्र और इसका भाष्य। 'जन्माद्यस्य यतः' इस सूत्रका अर्थ है—समस्त जगत्के उत्पत्ति, स्थिति और लय जिससे होते हैं, वह ब्रह्म है। है, इस मतके पक्षपातियोंका कहना यह है कि 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' (साधनसम्पत्तियुक्त होनेके अनन्तर ब्रह्मसम्बन्धी विचार करना चाहिए) इस सूत्रमें ज्ञेयरूपसे उसी ब्रह्मकी प्रतिज्ञा की गई है, जो निर्गुण सच्चिदानन्दरूप है, अतः 'जन्माद्यस्य यतः' सूत्रसे निर्गुण ब्रह्मका

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ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ६३

तथा च 'आत्मन आकाशः सम्भूतः' इत्यादिकारणवाक्येषु शबलवाचिनामात्मादिशब्दानां शुद्धे लक्षणैवेति । सार्वत्म्यस्येशालिङ्गत्वात् यः सर्वज्ञ इति श्रुतेः । मायोपहितमीशं तदाहुर्विवरणानुगाः ॥ १८ ॥

'सैव ॠक् तत्साम' इत्यादि श्रुतिसे कहा गया सर्वात्मकत्व ईश्वरमें लिङ्ग है और 'यः सर्वज्ञः' इस प्रकार श्रुति है; अतः जगत्का उपादान मायोपाधिक चैतन्य अर्थात् ईश्वर ही है, ऐसा विवरणानुसारी कहते हैं ॥ १८ ॥

विवरणानुसारिणस्तु—'यः सर्वज्ञः सर्ववित् यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते' इति श्रुतेः सर्वज्ञत्वादिविशिष्टं मायाशबलमीश्वररूपमेव ब्रह्म उपादानम् ।

और उसके भाष्यमें जगदुपादानत्व ज्ञातव्य ब्रह्मका लक्षण कहा गया है । इसलिए 'आत्मन आकाशः०' ( आत्मासे आकाश उत्पन्न हुआ ) इत्यादि ‡ कारणप्रतिपादक वाक्योंमें शबलवाची—मायासे युक्त चैतन्यके बोधक—'आत्म' शब्दोंकी शुद्धमें लक्षणा ही है । 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्०' ( जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है, जिसका तप ज्ञानमय—स्वरूपज्ञानका विकार है, उस सर्वज्ञ ब्रह्मसे हिरण्यगर्भ, नाम, रूप और अन्न उत्पन्न होते हैं ) इस श्रुतिसे सर्वज्ञत्व आदि धर्मोंसे युक्त मायासे


हो लक्षण किया जाता है, यह अवश्य स्वीकार करना होगा, अन्यथा अप्रतिज्ञातके लक्षणका प्रसङ्ग होगा, अतः सूत्र-भाष्यकी मर्यादाका संरक्षण करनेके लिए उन शबलवाची आत्मार्थक शब्दोंकी शुद्धमें लक्षणा करनी होगी, यह संक्षेपशारीरककारके अनुयायियोंका मत है ।

‡ यद्यपि 'तद्विजिज्ञासस्व' इत्यादि वाक्यशेषसे शुद्ध ब्रह्म ही जिज्ञास्य है और उसका 'यतो वा' इत्यादि श्रुतिसे लक्षण किया गया है, अतः इस शङ्काका अवसर नहीं है कि शुद्ध ब्रह्म कारण है या जीवरूप या ईश्वर, तथापि जैसे शुद्ध ब्रह्म जिज्ञास्य है, वैसे ही जीव और ईश्वर, जो 'त्वम्' और 'तत्' शब्दसे वाच्य हैं, जिज्ञास्य हैं, क्योंकि वे भी शुद्ध ब्रह्मके ज्ञानके प्रति हेतु हैं, अतः उनमें भी जगत्के प्रति उपादानता है, इसलिए शङ्काका होना सम्भव है, और चैतन्यके तीन भेद भी शास्त्रमें मिलते हैं— जीव ईशो विशुद्धा चित् तथा जीवेशयोर्भिदा । अविद्या तचितोर्योगः षडस्माकमनादयः ॥ अर्थात् जीव, ईश्वर, शुद्ध चैतन्य ( ब्रह्म ), जीव और ईश्वरका भेद, अविद्या और चित्का सम्बन्ध, ये छः अनादि हैं, इनमें चैतन्यके तीन भेद प्रतीत होते हैं, अतः प्रश्न होता है ।

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६४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अत एव भाष्ये 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' (उ० मी० अ० १ पा० १

शबल अर्थात् मायारूप उपाधिसे विशिष्ट * ईश्वररूप ब्रह्म ही जगत्‌के प्रति उपादान है, ऐसा ज्ञात होता है।

इसीसे—ईश्वररूप ब्रह्म ही उपादान है, ऐसा स्वीकार करनेसे †'अन्त-


* 'मायाविशिष्ट ब्रह्म ही जगत्‌के प्रति उपादान है' यह विवरणका मत है, अतः इसकी परिपुष्टि करनेके लिए हम यहाँ विवरणकी कुछ पङ्क्तियाँ उद्धृत करते हैं—

'तस्मादनिर्वचनीयमायाविशिष्टं कारणं ब्रह्मेति प्राप्तम् ......... ... त्रैविध्यमत्र सम्भवति— रज्ज्वाः संयुक्तसूत्रद्वयवत् मायाविशिष्टं ब्रह्म कारणमिति वा 'देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्' इति श्रुतेः मायाशक्तिमत्कारणमिति वा, जगदुपादानमायाश्रयतया ब्रह्मकारणमिति वा। तत्र विशिष्टपक्षे तथैव ब्रह्मानेनोपलक्षितस्य ज्ञानानन्दादिस्वरूपलक्षणेन मायानिष्कर्पलक्षणद्वयेन विशुद्धब्रह्मसिद्धिः । उत्तरपक्षयोस्तु मायाया ब्रह्मपरतन्त्रत्वात् तत्कार्यमपि ब्रह्मपरतन्त्रं भवति; यथाऽंशु-तन्त्रतन्त्वारब्धोऽपि पटोऽशुतन्त्रः प्रतीयते । ततश्च उत्पद्यमानकार्यस्य यद् आश्रयोपाधिज्ञानानन्दलक्षणं च तद् ब्रह्मेति शुद्धब्रह्मलाभ इति”। (टीकानवकोपेत शा० पृ० ९०७ कल० मुद्रित) अर्थात् इससे अनिर्वचनीय मायासे विशिष्ट ब्रह्म ही जगत्‌का उपादान है, यह सिद्ध हुआ, इसमें तीन प्रकार भासते हैं—जैसे रज्जुके प्रति संयुक्त दो सूत्र कारण हैं, वैसे ही मायाविशिष्ट ब्रह्म कारण है—माया भी विशेषणरूपसे कारण है, अथवा 'देवात्मशक्तिम्' इत्यादि श्रुतिके अनुसार मायाशक्तिसे युक्त ब्रह्म कारण है, अथवा जगत्‌की उपादान मायाके आश्रयरूपसे ब्रह्म कारण है। प्रथम पक्षमें ब्रह्मका लक्षण—जगत्कारणस्वरूप मायामें जाता है, तथापि ज्ञानानन्दरूप स्वरूपलक्षणके प्रवेशसे शुद्ध ब्रह्म ही सिद्ध होगा। द्वितीयादि पक्षमें जैसे अंशुके (तन्तुके अवयवके) अधीन तन्तुसे आरब्ध पट अंशुतन्त्र ही है, वैसे ही ब्रह्मपरतन्त्र मायाका कार्य भी ब्रह्मपरतन्त्र ही होगा, इसलिए उत्पद्यमान कार्यका जो आश्रयोपाधि (अज्ञान सत्ताका हेतु) ज्ञान और आनन्द लक्षण है, वह ब्रह्म है, ऐसा सिद्ध होगा। इससे यह बात मालूम होती है—विवरणकार यद्यपि औपाधिक ब्रह्मको कारण मानते हैं, तथापि शुद्ध ब्रह्मकी सिद्धि तो किसी रूपसे होती ही है।

† 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इस सूत्रके भाष्यमें विचार किया गया है कि छान्दोग्यमें 'एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः' (जो यह सूर्यके अन्दर ज्योतिःस्वरूप पुरुष है) इत्यादिका उपक्रम करके 'य एषोन्तरऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' (जो यह चक्षुके भीतर पुरुष देखा जाता है) इत्यादि सुना जाता है। यहांपर संशय होता है—आदित्य और आँखके अन्दर रहनेवाला कोई विशिष्ट जीव है या ईश्वर है। पूर्वपक्षीके अभिप्रायसे जीवके प्राप्त होनेपर सिद्धान्त करते हैं कि आदित्य आदिमें रहनेवाला ईश्वर ही है, क्योंकि उन श्रुतियोंमें ईश्वरके धर्मोंका कथन मिलता है—सर्वात्मकत्व—सर्वतादात्म्यत्वरूप धर्म सर्वोपादान होनेसे ईश्वरमें ही है, जीवमें नहीं है, कारण कि जीव अल्पज्ञ और अल्पशक्ति होनेसे जगत्‌के प्रति कारण नहीं है। अतः सर्वात्मकत्व उसमें नहीं हैं, इसलिए आदित्य आदिके अन्दर रहनेवाला पुरुष जीव नहीं है। और

ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ६५


सू० २०) 'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' ( उ० मी० अ० १ पा० २ सू० १ ) इत्याद्यधिकरणेषु 'सैव ऋक् तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद् ब्रह्म सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः' इत्यादिश्रुत्युक्तं सर्वोपादानत्वप्रयुक्तं सर्वात्मकत्वं जीवव्यावृत्तमीश्वरलिङ्गमित्युपवर्णितम् ।

जीवेश्वरानुस्यूतचैतन्यमात्रस्य सर्वोपादानत्वे तु न तज्जीवव्यावृत्तमीश्वरलिङ्गं स्यात् । सङ्क्षेपशारीरके शबलोपादानत्वनिराकरणमपि माया-


स्तद्धर्मोपदेशात्' और 'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' ‡ इत्यादि अधिकरणोंके भाष्यमें 'सैव ऋक् तत्साम०' (वही—चक्षुके अन्दर रहनेवाला पुरुष ऋक् है, वही साम है, वही उक्थ है, वही यजु है और वही ब्रह्म—वेद है अर्थात् ऋक् आदिसे अतिरिक्त वेद है ) इत्यादि श्रुतिसे कहा गया जीवव्यावृत्त—जीवमें नहीं रहने वाला सर्वोपादानताप्रयुक्त जो सर्वात्मकत्व है, वह ईश्वरका लिङ्ग कहा गया है ।

यदि जीव और ईश्वरमें अनुगत केवल शुद्ध चैतन्य ही सबके प्रति उपादान कारण माना जाय, तो वह सर्वात्मकत्व जीव-व्यावृत्त ईश्वरलिङ्ग नहीं होगा। शबलवाची चैतन्यमें उपादानकारणताका निराकरण संक्षेपशारीरकमें जो किया गया है, वह भी मायाविशिष्ट चेतन उपादान कारण नहीं है, इस अभिप्रायसे है अर्थात् मायाके विम्बरूप ईश्वरके विशेषण होनेसे जो उसका


भगवान् भाष्यकारने '............ऋक् सामाद्यात्मकतां निर्धारयति । सा च परमेश्वरस्यैवोपपद्यते, सर्वकारणत्वात् सर्वात्मकत्वोपपत्तेः' इस पंक्तिसे सर्वोपादानत्वप्रयुक्त जो सर्वात्मकत्व है, वह 'आदित्य आदिमें रहनेवाला जीव नहीं है, प्रत्युत ईश्वर है' इस प्रकार जीवव्यावृत्त ईश्वरके परिग्रहमें लिंगरूपसे कहा गया है । 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इस सूत्रका अर्थ है—अन्तः आदित्य आदिके अन्दर रहनेवाला पुरुष [ ईश्वर ही है किससे ? इससे कि ] तद्धर्मोपदेशात् यहां ईश्वरके धर्मका उपदेश है ।

'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' इस सूत्रमें भी 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' ( यह सब ब्रह्म है ) इसका उपक्रम करके 'स क्रतुं कुर्वीत' ( वह उपासना करे ) इस प्रकार उपासनाका विधान किया है। अनन्तर 'मनोमयः प्राणशरीरः' ( मनोमय—मन-प्रधान और प्राणशरीरवाला ) इत्यादिसे वह उपास्य कहा गया है। इसमें मनोमय आदिसे जीवका ग्रहण होता है अथवा पर-ब्रह्मका ? इस प्रकार संशय होता है, पूर्वपक्षमें जीव प्राप्त होता है, परन्तु सिद्धान्तमें ईश्वर ही मनोमय आदिसे लिया गया है, क्योंकि 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादिसे सर्वात्मकत्वका अभिधान है।

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६६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

विशिष्टोपादानत्वनिराकरणाभिप्रायम्, न तु निष्कृष्टेश्वररूपचैतन्योपादानत्व-
निराकरणपरम् । तत्रैव प्रथमाध्यायान्ते जगदुपादानत्वस्य तत्पदार्थवृत्ति-
त्वोक्तेः । एवं च ईश्वरगतमपि कारणत्वं तदनुगतमखण्डचैतन्यं शाखा-
चन्द्रमसमिव तटस्थतयोपलक्षयितुं शक्नोतीति तस्य ज्ञेयब्रह्मलक्षणत्वोक्ति-
रिति मन्यन्ते ।


उपादानकुक्षिमें भी प्रवेश प्राप्त है, उसके निरासके लिए संक्षेपशारीरककारका प्रयास है, न कि बिम्बविशिष्ट चैतन्यरूप ईश्वर उपादान कारण नहीं है इस अभिप्रायसे । [ अतः संक्षेपशारीरककारके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है । परन्तु संक्षेपशारीरकमें 'शबल चेतन * जगत्का उपादान नहीं है' इस प्रकार साक्षात् औपाधिक चेतनमें जगत्कारणताका निषेध करके 'शुद्ध ब्रह्म ही जगत्का उपादान है, क्योंकि शुद्ध ब्रह्म ज्ञेयरूपसे उपन्यस्त है, ऐसा कहा गया है, अतः स्वारसिक अर्थको छोड़कर संक्षेपशारीरककारका स्वकपोलकल्पित विरुद्ध अर्थ कैसे करते हो ? यदि कोई इस प्रकारकी शङ्का करे, तो वह युक्त नहीं है, ] क्योंकि संक्षेपशारीरकमें ही प्रथम अध्यायके अन्तमें 'जगत्की उपादानता तत्पदार्थ—ईश्वरमें है' ऐसा कहा गया है । इस परिस्थितिमें—'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इत्यादि अधिकरणोंके पर्यालोचनसे अभिन्ननिमित्तोपादानत्वरूप लक्षणके बिम्बभूत ईश्वरगत होनेपर ईश्वरमें रहनेवाली भी कारणता तटस्थरूपसे शाखास्थ चन्द्रमाके समान बिम्बरूपचैतन्यानुगत अखण्डचैतन्यकी उपलक्षण हो सकती है, अतः उसका ज्ञेय ब्रह्मके लक्षणरूपसे कथन ( सूत्र और भाष्यमें )


* इस अभिप्रायका सूचक संक्षेपशारीरकका श्लोक देखिए—

स्वात्मानमेव जगतः प्रकृतिं यदेकम्,
सर्गे विवर्तयति तत्र निमित्तभूतम् ।
कर्माकलय्य रमणीयकपूयमिश्रम्,
पश्यन्नृणां परिवृढं तदितीर्यमाणम् ॥५५०॥ [ सं० शा० अ० १ ]

जो संसारकी उत्पत्तिमें एक चेतन निमित्तभूत है, वह प्राणियोंके पुण्य, पाप और मिश्र—इन त्रिविध कर्मोंका ठीक-ठीक आलोचन करता हुआ उनका ग्रहण करके तदनुसार स्वयं ही चेतनप्रकृतिरूप होकर मायासे जगदाकारेण विवर्तमान होता है, अतः वही सर्वज्ञ सर्वशक्ति-आदि स्वभाववाला ब्रह्म है और 'तद् ब्रह्म' आदि वाक्य भी इसी लक्षणको कहकर ब्रह्ममें ही समन्वित होता है ।

.ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहितं ६७


ईश्वरो वियदादौ स्यात् जीवेशौ लिङ्गतद्गते ।
मायाऽविद्याभिदावादाः केचिदेवं प्रचक्षते ॥१९॥

आकाश आदि महाभूतोंकी सृष्टिमें ईश्वर उपादान है और लिङ्गशरीर, लिङ्गस्थ धर्म और सुख आदिमें जीव और ईश्वर दोनों उपादान कारण हैं, इस प्रकार माया और अविद्यामें भेद माननेवालोंमें से कुछ लोग कहते हैं ॥ १९ ॥

वियदादिप्रपञ्च ईश्वराश्रितमायापरिणाम इति तत्रेश्वर उपादानम् । अन्तःकरणादिकं तु ईश्वराश्रितमायापरिणाममहाभूतोपसृष्टजीवाविद्याकृत-भूतसूक्ष्मकार्यमिति तत्रोभयोरुपादानत्वम् । अत एव ‘एवमेवास्य परि-परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति’ इति श्रुतौ कलाशब्दवाच्यानां प्राणमनःप्रभृतीनां विदुषो विदेहकैवल्यसमये विद्यानिवर्त्याविद्याकार्यांशाभिप्रायेण विद्ययोच्छेदो दर्शितः ।

‘गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठाः’ इति श्रुत्यन्तरे तदनिवर्त्यमायाकार्य-


है, [ अतः ‘जन्माद्यस्य’ इत्यादि सूत्र और उसके भाष्यके साथ विरोध नहीं है ] ऐसा विवरणके अनुयायियोंका मत है ।

आकाश आदि महाभूतप्रपञ्च ईश्वरमें रहनेवाली मायाका परिणाम है अतः आकाश आदि महाभूतप्रपञ्चका उपादान है—ईश्वर । अन्तःकरण आदि प्रपञ्च तो ईश्वराश्रित मायाके परिणामभूत आकाश आदि उपष्टम्भकलक्षण महाभूतोंसे संसृष्ट जीवकी अविद्यासे उत्पन्न हुए सूक्ष्म भूतोंका कार्य है, इसलिए ईश्वर और जीव दोनों अन्तःकरण आदिके उपादान कारण हैं । इसीसे अर्थात् जीवकी अविद्यासे परिणत सूक्ष्म भूत और उसके उपष्टम्भक मायाके परिणाम महाभूत उपादानरूपसे अन्तःकरण आदिमें प्रविष्ट होनेसे ‘एवमेवाऽस्य०’ (जैसे गङ्गा आदि नदियां समुद्रको प्राप्त कर उसमें विलीन हो जाती हैं, वैसे ही सर्वत्र आत्मभावको देखनेवाले इस विद्वान् पुरुषकी ये सोलह कलाएँ, जिनका चिदात्मा–पुरुष ही अधिष्ठान है, पुरुषको प्राप्त कर उसीमें लीन हो जाती हैं ) इस श्रुतिमें विद्वान्‌के विदेहकैवल्य-समयमें विद्यासे नष्ट होनेवाली अविद्याके कार्यांशके अभिप्रायसे कलाशब्दसे कहे जानेवाले प्राण, मन आदिका पुरुषमें विद्यासे विनाश बतलाया गया है ।

‘गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठाः’ (पन्द्रह कलाएँ प्रतिष्ठाके—पृथ्वी आदि


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६८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


महाभूतपरिणामरूपोपष्टम्भकांशाभिप्रायेण तेषां स्वस्वप्रकृतिषु लयो दर्शित इति मायाऽविद्याभेदवादिनः ।

लिङ्गादौ जीव एवेति केचित्तत्रैकदेशिनः ।
महाभूतलयोक्तिस्तु कलानामन्यदृष्टितः ॥२०॥

माया और अविद्यामें भेद माननेवालोंमें से कुछ लोग लिङ्गशरीर और अन्तःकरण आदिका उपादान जीव ही है कलाओंकी महाभूतोंमें लयोक्ति तो तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिसे है, ऐसा कहते हैं ॥ २० ॥

यथा वियदादिप्रपञ्च ईश्वराश्रितमायापरिणाम इति तत्र ईश्वर उपादानम्, तथाऽन्तःकरणादि जीवाश्रिताविद्यामात्रपरिणाम इति तत्र जीव एव उपादानम् ।

न चान्तःकरणादौ मायाकार्यमहाभूतानामप्यननुप्रवेशे उदाहृतश्रुतिद्वयव्यवस्थाऽनुपपत्तिः । कलानां विद्ययोच्छेदश्रुतिस्तत्त्वविद्द्दष्टिविषया ।


महाभूतोंके—प्रति गई अर्थात् उनमें लीन हुई) इस प्रकारकी अन्य श्रुतिमें जीवकी विद्यासे निवृत्त न होनेवाली मायाके कार्य महाभूतोंका परिणामरूप जो उपष्टम्भक अंश है, उसके आधारपर उन पञ्चदश कलाओंका अपनी-अपनी प्रकृतिमें विलय बतलाया गया है, यह उन लोगोंका मत है, जो माया और अविद्याको भिन्न-भिन्न मानते हैं ।

माया और अविद्याको भिन्न माननेवालोंमें से कुछ लोगोंका मत है कि जैसे आकाश आदि महाभूत प्रपञ्च ईश्वरकी आश्रित मायाका परिणाम है, अतः आकाश आदि महाभूतप्रपञ्चमें ईश्वर उपादान है, वैसे ही अन्तःकरण आदि जीवकी आश्रित केवल अविद्याके परिणाम हैं, इसलिए उनमें जीव ही उपादान है, ईश्वर उपादान नहीं है ।

यदि कोई कहे कि मायाके कार्य जो महाभूत हैं, उनका अन्तःकरण आदिमें अनुप्रवेश न माना जाय, तो पूर्वमें उदाहृत दो श्रुतियोंकी व्यवस्था नहीं होगी, नहीं, व्यवस्था होगी, क्योंकि 'एवमेवास्य' इत्यादि प्राण, मन आदि कलाओंका विद्यासे उच्छेदबोधन करनेवाली जो श्रुति है, वह तत्त्वविद्द्दष्टिविषयक है अर्थात् आत्मतत्त्वको जाननेवाला जो पुरुष है, उसकी जो दृष्टि-तत्त्व-साक्षात्कार तद्विषयक है—पुरुषमें कलालयश्रुति साक्षात्कारके अभिप्रायसे है,

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ब्रह्मकी कारणताको विचार ] भाषानुवादसहित ६९


'गताः कलाः' इति श्रुतिस्तु तत्त्वविदि म्रियमाणे समीपवर्तिनः पुरुषाः नश्यद्घटवत्तदीयशरीरादीनामपि भूम्यादिषु लयं मन्यन्ते इति तटस्थपुरुषप्रतीतिविषयेति व्यवस्थायाः कलालयाधिकरणभाष्ये स्पष्टत्वात्, इति मायाऽविद्याभेदवादिष्वेकदेशिनः ॥

मायाऽविद्यैक्यवादेऽपि जीवतादात्म्यदर्शनात् ।
जीव एव हि लिङ्गादेरुपादानमितीतरे ॥ २१ ॥

माया और अविद्याका अभेद मानने वालोंमें भी कुछ लोग अन्तःकरण आदिकी जीवके साथ तादात्म्यप्रतीति होनेसे अन्तःकरण आदिका जीव ही उपादान है, ऐसा कहते हैं ॥ २१ ॥

तदभेदवादिष्वपि केचित्—यद्यपि वियदादिप्रपञ्चस्य ईश्वर उपादानम्, तथाऽप्यन्तःकरणादीनां जीवतादात्म्यप्रतीतेः जीव एवोपादानम् ।
अत एवाऽध्यासभाष्ये अन्तःकरणादीनां जीवे एवाऽध्यासो दर्शितः ।

यह भाव है। और 'गताः कलाः०' इत्यादि श्रुति तो तत्त्वज्ञानीके मर जानेपर समीपस्थ पुरुष जैसे चूर्णावशेष घटका विनाश भूमिमें देखते हैं, वैसे ही उसके शरीर आदिका भूमि आदिमें लय मानते हैं। इस प्रकार तटस्थपुरुषविषयक है, ऐसी व्यवस्था कलालयाधिकरणभाष्यमें स्पष्टरूपसे की गई है।

माया और अविद्याको जो अभिन्न मानते हैं, उनमेंसे कुछ लोग कहते हैं—यद्यपि आकाश आदि महाभूतप्रपञ्चका ईश्वर ही उपादान है, तथापि अन्तःकरण आदिमें जीवके तादात्म्यकी प्रतीति होनेसे उनका—अन्तःकरण आदिका—जीव ही उपादान है *।

इसीसे अध्यासभाष्यमें अन्तःकरण आदिका जीवमें ही अध्यासभ्रम बत-


* माया ही अविद्या है और वह ईश्वरकी उपाधि है अर्थात् मायाशबलित चैतन्य ईश्वर है और प्रतिबिम्बभूत जीवोंकी उपाधियाँ अन्तःकरण हैं, इस रीतिसे माया और अविद्याको अभिन्न मानकर व्यवस्था करनेवालोंमें से भी भेदवादियोंके समान कुछ लोग अन्तःकरण आदिमें जीवको उपादान मानते हैं। 'तदभेदवादिष्वपि' इसमें 'अपि' शब्दसे पूर्व मतके साथ किसी अंशमें समानता है, यह प्रतीत होता है और उस विशेषताका 'तथापि' ग्रन्थसे स्पष्टीकरण होता है अर्थात् जैसे ईश्वरमें रहनेवाली मायाके परिणामी होनेसे महाभूतोंके प्रति ईश्वर उपादान है वैसे ही माया और अविद्याके अभिन्न होनेसे अविद्यापरिणामी अन्तःकरण आदि भी ईश्वरा-

७० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद

विवरणे च प्रतिकर्मव्यवस्थायां ब्रह्मचैतन्यस्योपादानतया घटादिसङ्गित्त्वम्, जीवचैतन्यस्य तदसङ्गित्त्वेऽप्यन्तःकरणादिसङ्गित्त्वं च वर्णितमित्याहुः ॥

लाया गया है । और विवरणमें भी प्रतिकर्मव्यवस्थाके प्रतिपादक † ग्रन्थमें ब्रह्मके उपादान होनेसे ब्रह्मचैतन्यका घटके साथ तादात्म्य है, और घटादिके प्रति उपादान न होनेसे जीवका घटादिके साथ तादात्म्य न रहनेपर भी अन्तःकरण आदिके साथ जीवकी सङ्गिता—तादात्म्य है' इस प्रकार वर्णन किया गया है ।


श्रित मायाके ही परिणाम हैं । अतः उनके प्रति ईश्वर ही उपादान क्यों न माना जाय ? इस प्रकारकी शङ्काका परिहार 'तथापि' इत्यादिसे किया गया है—'अहं काणः' ( मैं काना हूँ ) 'अहं कर्ता', ( मैं कर्ता हूँ ) 'अहं मूकः', ( मैं मूक हूँ ) और 'अहं स्थूलः' ( मैं स्थूल हूँ ) इत्यादि रूपसे शरीरके अन्दर रहनेवाले अन्तःकरण आदिका जीवके साथ तादात्म्य प्रतीत होता है, वह तभी उपपन्न हो सकता है, जब उनका जीवमें अध्यास माना जाय, ऐसा माननेपर तदधिष्ठानत्वरूप उपादानत्व भी जीवमें ही है।

† प्रतिकर्म-व्यवस्था—जीवके प्रति विषयव्यवस्थाका दिग्दर्शन करानेवाला विवरणग्रन्थका प्रकरण । माया और अविद्याका अभेद माननेमें विवरणकारने 'अत्र केचिदाहुः—अतोऽविद्यामयं वक्तव्यं न मायामयमिति' इत्यादि ग्रन्थसे लेकर 'इति युक्तं मायामयम्' यहाँ तक अनेक युक्तियों और प्रमाणोंका उपन्यास किया है। (पृ० २०७ कल० मुद्रित भामत्यादिटीकानव-कोपेत शाङ्करभाष्य) जानकारीके लिए उसमें से कुछ सारांश यहांपर देते हैं—माया और अविद्याका अभेद नहीं मान सकते, क्योंकि माया अपने आश्रयको मुग्ध नहीं करती और कर्ताकी इच्छाके अनुसार अनुवर्तन करती है। अविद्या वैसी नहीं है अर्थात् स्वाश्रयको मुग्ध करती हुई कर्ताकी इच्छाके विरुद्ध प्रवृत्त होती है। और लोकमें अविद्या तथा मायाका अन्योन्य भेद प्रसिद्ध है ? इस प्रश्नके उत्तरमें विवरणकार कहते हैं कि इनका भेद हम लक्षणके भेदसे या व्यवहारके भेदसे नहीं कर सकते हैं, क्योंकि अनिर्वचनीयतया तत्त्वावभासप्रतिबन्ध विपर्यायावभासरूप लक्षण माया और अविद्यामें सामान्यरूपसे रहता ही है (लक्षणार्थ यह हुआ कि अनिर्वचनीय होकर यथार्थ वस्तुके परिज्ञानमें प्रतिबन्ध करे और विपरीत वस्तुका भान करे उसे अविद्या या माया कहते हैं)। और मायाशब्दका मन्त्र या औषध आदि सत्य वस्तुमें प्रयोग होता है, यह बात नहीं है, क्योंकि मिथ्यारूपसे देखे जानेवाली वस्तुमें भी माया शब्दका प्रयोग होता है। और समीपस्थ पुरुषको मन्त्र आदिका परिज्ञान भी नहीं है, अधिक क्या कहा जाय ? मन्त्र आदिमें मायाशब्दका प्रयोग भी तो लोकमें देखा नहीं जाता और 'मायां तु प्रकृतिम्' (मायाको प्रकृति जानो) इस श्रुतिमें मायाशब्दका प्रयोग प्रकृतिमें है। अतः प्रकृतिभूत माया और अविद्याके लिए एक ही लक्षण अवगत होता है। माया अपने आश्रयमें मोह नहीं करती और अविद्या करती है, इस प्रकार जो लक्षण-भेद कहा गया है, वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि मायाका आश्रय द्रष्टा माना जाय, तो वह मुग्ध होता ही है और यदि

ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ७१


इष्ट ईश उपादानं सर्वस्मिन् व्यावहारिके ।
प्रातिभासिककार्ये तु जीव इत्यपरे जगुः ॥२२॥

सम्पूर्ण व्यावहारिक पदार्थोंका उपादान ईश्वर है और प्रतिभासिक पदार्थोंका उपादान जीव है, ऐसा अन्य लोग कहते हैं ॥ २२ ॥

“एतस्माज्जायते प्राणो मनस्सर्वेन्द्रियाणि च ।
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी” ॥

इत्यादिश्रुतेः कृत्स्नव्यावहारिकप्रपञ्चस्य ब्रह्मैव उपादानम् । जीवस्तु प्रातिभासिकस्य स्वप्नप्रपञ्चस्य च । ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’

‘एतस्माज्जायते०’ ( इस प्रकृत ईश्वरलूप उपादानसे प्राण, मन, सम्पूर्ण इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज और सम्पूर्ण पदार्थोंकी आधारभूत पृथ्वी उत्पन्न हुई ) इत्यादि श्रुतिसे सम्पूर्ण व्यावहारिक घट आदि प्रपञ्चका ब्रह्म ही उपादान कारण है और प्रातीतिक स्वप्नके प्रपञ्चोंका अर्थात् स्वप्न सृष्टिमें देखे जानेवाले प्रतीतिकालावस्थायी भ्रमात्मक पदार्थोंका जीव ही उपादान कारण है, क्योंकि ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’ * इस अधिकरणमें ‘जगत्का उपादान


धर्त्ता माना जाय, तो उसके मायावी होनेसे उसमें व्यामोहका अभाव है, यह नहीं कह सकते । और इच्छाके अनुसार माया कर सकते हैं और अविद्या नहीं कर सकते यह युक्ति भी भेदमें नहीं दे सकते, क्योंकि मन्त्र और औषध आदिमें कर्ताका स्वातन्त्र्य है, मायामें नहीं है अविद्यामें भी द्विचन्द्र आदि भ्रम कर्ताकी इच्छाके अधीन होते हैं । और शास्त्रीयव्यवहारसे भी माया एवं अविद्याका भेद नहीं है, क्योंकि ‘भूयश्चान्ते विश्वमायानिवृत्तिः’ इत्यादि श्रुतिसे यथार्थ ज्ञानसे निवर्त्य अविद्यामें मायाशब्दका प्रयोग होता है । ‘तरत्यविद्यां विततां हृदि यस्मिन्निवेशिते। योगी मायाममेयाय तस्मै विद्यात्मने नमः ॥’ इस श्रुतिमें भी माया और अविद्या-का सामानाधिकरण्यसे ( एकार्थकत्वसे ) निर्देश कर तत्त्वज्ञानसे तैरना बतलाया है । इसी प्रकार भगवान् सूत्रकारने ‘मायामात्रन्तु कात्स्न्ये॑नानभिव्यक्तस्वरूपत्वात्’ इस सूत्रमें स्वप्नमें भी मायाशब्दका प्रयोग किया है । भाष्यकारने भी ‘अविद्यामायाऽविद्यात्मिका मायाशक्तिः’ ( अविद्या-माया है मायाशक्ति भी अविद्यारूप है ) इस वाक्यसे माया और अविद्याका अभेद दर्शाया है अतः यह स्पष्ट हुआ कि माया और अविद्याका अभेद है, भेद नहीं है ।

* ‘कृत्स्नप्रसक्तिर्निरवयवत्वशब्दकोपो वा’ इस सूत्रका अर्थ है, यदि ब्रह्मका सर्व अंशसे परिणाम माना जाय, तो कृत्स्नप्रसक्ति होगी अर्थात् जैसे दधिके आकारसे परिणत दुग्धकी अपने स्वरूपसे हानि होती है, वैसे ही ब्रह्मकी अपने रूपसे हानि होगी । और एक देशसे

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७२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

( उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ७ सू० २६ ) इत्यधिकरणे ब्रह्मणो जगदुपादानत्वे तस्य कात्स्न्येन जगदाकारेण परिणामे विकारातिरेकेण ब्रह्माभावो वा, एकदेशेन परिणामे निरवयवत्वश्रुतिविरोधो वा प्रसज्यते इति पूर्वपक्षे 'आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि' ( उ० मी० अ० २ पा० १ सू० २८ ) इति सूत्रेण विवर्तवादाभिप्रायेण स्वप्नदृशि जीवात्मनि स्वरूपानुपमर्दनेनाऽनेकाकारस्वाप्नप्रपञ्चसृष्टिवत् ब्रह्मणि वियदादिसृष्टिरुपपद्यते इति सिद्धान्तितत्वादित्यन्ये ।


ब्रह्म है' इस सिद्धान्तमें शङ्का की है कि क्या ब्रह्म सर्वांशसे जगदाकारमें परिणत होता है या एकदेशसे ? प्रथम पक्षमें ( जैसे दधिरूपमें दूधके परिणत होनेसे दूध रहता ही नहीं है, वैसे ही ) ब्रह्मके सर्वांशसे जगद्रूपमें परिणत होनेपर जगत्से पृथक् ब्रह्मका अस्तित्व नहीं रहेगा; यदि द्वितीय पक्ष अर्थात् एकदेशसे ब्रह्मका परिणाम माना जाय, तो ब्रह्मके निरवयवत्वका प्रतिपादन करनेवाली ( 'अजो नित्यः शाश्वतो' ( आत्मा उत्पन्न नहीं होता है, नित्य—अवयवरहित और सनातन है ) इस श्रुतिके साथ विरोध होगा। अतः दोनों मार्गोंसे ब्रह्म जगत्का उपादान नहीं हो सकता है, इस प्रकार पूर्वपक्षके प्राप्त होनेपर † 'आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि' इस सूत्रसे विवर्तवादके अभिप्रायसे 'जैसे जीवके स्वरूपके बिगड़े बिना ही स्वप्न देखनेवाले जीवात्मामें अनेक आकार-प्रकारवाली स्वप्न पदार्थोंकी सृष्टि बनती है, वैसे ही ब्रह्मके स्वरूपमें कुछ भी विकृति न होकर आकाश आदि प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है' इस प्रकारका सिद्धान्त किया गया है, ऐसा भी कुछ लोगोंका मत है ।


परिणाम माना जाय, तो निरवयवत्वशब्दकोप होगा अर्थात् ब्रह्मकी निरवयवताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिके साथ विरोध होगा।

† आत्मनि चैवं विचित्राश्च हि। इस सूत्रमें प्रथम 'च' शब्दका अर्थ यथा ( जैसे ) है और द्वितीयका अर्थ तथा ( वैसे ही ) है और 'हि' शब्द हेतु अर्थमें है। इसलिए जैसे आत्मनि-स्वप्नद्रष्टा जीवमें विचित्र—विलक्षण रथ आदि सृष्टि प्रतीत होती है, और उसके स्वरूपका विनाश नहीं होता है, क्योंकि स्वप्नावस्थाकी निवृत्तिके बाद भी साक्षीरूपसे जीव चैतन्य पूर्ववत् ही रहता है, वैसे ही ब्रह्ममें भी स्वरूपविनाशके बिना विचित्र आकाश आदि सृष्टि उत्पन्न होती है।

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