सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 83, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मलक्षणविचार ] भाषानुवादसहित ५५
एकैककारणत्वमप्यनन्यगामित्वाल्लक्षणं भवितुमर्हतीति चेत्, सत्यम्। लक्षण-
[ परन्तु जैसे जगज्जन्मस्थितिलयकारणत्वरूप एक लक्षण करते हैं, वैसे ] जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और लय इन तीनोंमेंसे एक-एकका कारणत्व भी अनन्यगामी होनेसे ब्रह्मका लक्षण हो सकता है। [ शङ्काका भाव यह है कि जगत्के जन्म, स्थिति और लय इन तीनोंका जो कारण है, वह ब्रह्म है, इस प्रकार जन्म आदि तीनोंको मिलाकर एक लक्षण क्यों किया जाता है, क्योंकि 'जगज्जन्मकारणत्व, जगत्स्थितिकारणत्व और जगल्लयकारणत्व' अर्थात् जगत्की उत्पत्तिका कारण, जगत्की स्थितिका कारण और जगत्के लयका कारण, इस प्रकार तीन परस्पर निरपेक्ष ब्रह्मके लक्षण हो सकते हैं और ब्रह्मको छोड़कर अन्यत्र जाते भी नहीं हैं*, किन्तु केवल ब्रह्ममें ही रहते हैं, अतः निर्दुष्ट भी हैं, इसलिए एक लक्षण करना अयुक्त है ] सत्य है परस्पर निरपेक्ष ये तीन ही लक्षण हैं। इसीलिए † 'अत्ता चराचरग्रहणात्'
* यद्यपि जगज्जन्म आदिकी कारणता ब्रह्मके समान साङ्ख्याभिमत प्रधानमें भी है, अतः उक्त लक्षण अनन्यगामी नहीं हुआ, क्योंकि प्रधानको साङ्ख्यानुगामी लोग जगत्के उपादान-रूपसे जगज्जन्मके प्रति हेतु, जगत्का आधार होनेसे स्थितिका हेतु और लयका आश्रय होनेसे लयके प्रति भी हेतु मानते हैं, तथापि जगत्की उत्पत्ति आदिका कर्त्ता होकर उनके प्रति जो हेतु हो, वह ब्रह्म है, इस प्रकार लक्षणमें कर्तृत्वका निवेश करनेसे जड़ प्रधानमें अतिव्याप्ति नहीं है, अतः उक्त शङ्का केवल धूलिप्रक्षेप है। इसपर यदि शङ्का की जाय कि जन्म आदिके प्रति जो कर्त्ता है, वही ब्रह्म है, लक्षणके गर्भमें कारणका निवेश क्यों करना ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जीवमें अतिव्याप्ति होगी, कारण कि जीव भी अदृष्टके द्वारा जगत्का कर्त्ता होता है, लक्षणमें कारणके प्रवेशसे जीवमें दोष नहीं होगा, क्योंकि स्वल्प जीव जगत्का कारण नहीं हो सकता है। (यहाँ कारणशब्द उपादानकारणपरक है, यह ख्याल रखना चाहिए) इसपर यह कहा जाय कि जीवमें अतिव्याप्ति दोषके निवारण करनेके लिए साक्षात् जगत्की उत्पत्तिके प्रति कर्त्ता—साक्षात्जगज्जन्मकर्तृत्वरूप ब्रह्मका लक्षण करते हैं, अतः परम्परा जगत्के कर्त्ता-जीवमें दोष नहीं होनेसे कारणत्वका लक्षणमें प्रवेश व्यर्थ है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उपादानत्वकी—अर्थात् जगत्के प्रति उपादानत्वकी—भी स्वतन्त्र लक्षण-रूपसे विवक्षा हो सकती है, माया ब्रह्मरूप उपादानमें घटक है और प्रधान आदि अप्रामाणिक हैं, अतः उनमें दोष नहीं है, यह भाव है।
† 'अत्ता चराचरग्रहणात्' इस सूत्रका निम्नलिखित अर्थ होता है—अत्ता—'यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः। मृत्युर्यस्योपरोचनं क इत्था वेद यत्र सः' (जिसके ब्रह्म—ब्राह्मण और क्षत्त—क्षत्रिय अदनीय हैं और मृत्यु उपरोचन (दाल आदि) है, ऐसा संहार करनेवाला