भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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६६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

विशिष्टोपादानत्वनिराकरणाभिप्रायम्, न तु निष्कृष्टेश्वररूपचैतन्योपादानत्व-
निराकरणपरम् । तत्रैव प्रथमाध्यायान्ते जगदुपादानत्वस्य तत्पदार्थवृत्ति-
त्वोक्तेः । एवं च ईश्वरगतमपि कारणत्वं तदनुगतमखण्डचैतन्यं शाखा-
चन्द्रमसमिव तटस्थतयोपलक्षयितुं शक्नोतीति तस्य ज्ञेयब्रह्मलक्षणत्वोक्ति-
रिति मन्यन्ते ।


उपादानकुक्षिमें भी प्रवेश प्राप्त है, उसके निरासके लिए संक्षेपशारीरककारका प्रयास है, न कि बिम्बविशिष्ट चैतन्यरूप ईश्वर उपादान कारण नहीं है इस अभिप्रायसे । [ अतः संक्षेपशारीरककारके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है । परन्तु संक्षेपशारीरकमें 'शबल चेतन * जगत्का उपादान नहीं है' इस प्रकार साक्षात् औपाधिक चेतनमें जगत्कारणताका निषेध करके 'शुद्ध ब्रह्म ही जगत्का उपादान है, क्योंकि शुद्ध ब्रह्म ज्ञेयरूपसे उपन्यस्त है, ऐसा कहा गया है, अतः स्वारसिक अर्थको छोड़कर संक्षेपशारीरककारका स्वकपोलकल्पित विरुद्ध अर्थ कैसे करते हो ? यदि कोई इस प्रकारकी शङ्का करे, तो वह युक्त नहीं है, ] क्योंकि संक्षेपशारीरकमें ही प्रथम अध्यायके अन्तमें 'जगत्की उपादानता तत्पदार्थ—ईश्वरमें है' ऐसा कहा गया है । इस परिस्थितिमें—'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इत्यादि अधिकरणोंके पर्यालोचनसे अभिन्ननिमित्तोपादानत्वरूप लक्षणके बिम्बभूत ईश्वरगत होनेपर ईश्वरमें रहनेवाली भी कारणता तटस्थरूपसे शाखास्थ चन्द्रमाके समान बिम्बरूपचैतन्यानुगत अखण्डचैतन्यकी उपलक्षण हो सकती है, अतः उसका ज्ञेय ब्रह्मके लक्षणरूपसे कथन ( सूत्र और भाष्यमें )


* इस अभिप्रायका सूचक संक्षेपशारीरकका श्लोक देखिए—

स्वात्मानमेव जगतः प्रकृतिं यदेकम्,
सर्गे विवर्तयति तत्र निमित्तभूतम् ।
कर्माकलय्य रमणीयकपूयमिश्रम्,
पश्यन्नृणां परिवृढं तदितीर्यमाणम् ॥५५०॥ [ सं० शा० अ० १ ]

जो संसारकी उत्पत्तिमें एक चेतन निमित्तभूत है, वह प्राणियोंके पुण्य, पाप और मिश्र—इन त्रिविध कर्मोंका ठीक-ठीक आलोचन करता हुआ उनका ग्रहण करके तदनुसार स्वयं ही चेतनप्रकृतिरूप होकर मायासे जगदाकारेण विवर्तमान होता है, अतः वही सर्वज्ञ सर्वशक्ति-आदि स्वभाववाला ब्रह्म है और 'तद् ब्रह्म' आदि वाक्य भी इसी लक्षणको कहकर ब्रह्ममें ही समन्वित होता है ।