भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 590 में से

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ब्रह्मकी कारणताका विचार ] भाषानुवादसहित ६५


सू० २०) 'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' ( उ० मी० अ० १ पा० २ सू० १ ) इत्याद्यधिकरणेषु 'सैव ऋक् तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद् ब्रह्म सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः' इत्यादिश्रुत्युक्तं सर्वोपादानत्वप्रयुक्तं सर्वात्मकत्वं जीवव्यावृत्तमीश्वरलिङ्गमित्युपवर्णितम् ।

जीवेश्वरानुस्यूतचैतन्यमात्रस्य सर्वोपादानत्वे तु न तज्जीवव्यावृत्तमीश्वरलिङ्गं स्यात् । सङ्क्षेपशारीरके शबलोपादानत्वनिराकरणमपि माया-


स्तद्धर्मोपदेशात्' और 'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' ‡ इत्यादि अधिकरणोंके भाष्यमें 'सैव ऋक् तत्साम०' (वही—चक्षुके अन्दर रहनेवाला पुरुष ऋक् है, वही साम है, वही उक्थ है, वही यजु है और वही ब्रह्म—वेद है अर्थात् ऋक् आदिसे अतिरिक्त वेद है ) इत्यादि श्रुतिसे कहा गया जीवव्यावृत्त—जीवमें नहीं रहने वाला सर्वोपादानताप्रयुक्त जो सर्वात्मकत्व है, वह ईश्वरका लिङ्ग कहा गया है ।

यदि जीव और ईश्वरमें अनुगत केवल शुद्ध चैतन्य ही सबके प्रति उपादान कारण माना जाय, तो वह सर्वात्मकत्व जीव-व्यावृत्त ईश्वरलिङ्ग नहीं होगा। शबलवाची चैतन्यमें उपादानकारणताका निराकरण संक्षेपशारीरकमें जो किया गया है, वह भी मायाविशिष्ट चेतन उपादान कारण नहीं है, इस अभिप्रायसे है अर्थात् मायाके विम्बरूप ईश्वरके विशेषण होनेसे जो उसका


भगवान् भाष्यकारने '............ऋक् सामाद्यात्मकतां निर्धारयति । सा च परमेश्वरस्यैवोपपद्यते, सर्वकारणत्वात् सर्वात्मकत्वोपपत्तेः' इस पंक्तिसे सर्वोपादानत्वप्रयुक्त जो सर्वात्मकत्व है, वह 'आदित्य आदिमें रहनेवाला जीव नहीं है, प्रत्युत ईश्वर है' इस प्रकार जीवव्यावृत्त ईश्वरके परिग्रहमें लिंगरूपसे कहा गया है । 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इस सूत्रका अर्थ है—अन्तः आदित्य आदिके अन्दर रहनेवाला पुरुष [ ईश्वर ही है किससे ? इससे कि ] तद्धर्मोपदेशात् यहां ईश्वरके धर्मका उपदेश है ।

'सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्' इस सूत्रमें भी 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' ( यह सब ब्रह्म है ) इसका उपक्रम करके 'स क्रतुं कुर्वीत' ( वह उपासना करे ) इस प्रकार उपासनाका विधान किया है। अनन्तर 'मनोमयः प्राणशरीरः' ( मनोमय—मन-प्रधान और प्राणशरीरवाला ) इत्यादिसे वह उपास्य कहा गया है। इसमें मनोमय आदिसे जीवका ग्रहण होता है अथवा पर-ब्रह्मका ? इस प्रकार संशय होता है, पूर्वपक्षमें जीव प्राप्त होता है, परन्तु सिद्धान्तमें ईश्वर ही मनोमय आदिसे लिया गया है, क्योंकि 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इत्यादिसे सर्वात्मकत्वका अभिधान है।

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