भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 590 में से

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१८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद


अत एव 'आवृत्तिरसकृदुपदेशात्' (४।१।१) इत्यधिकरणभाष्ये 'दर्शनपर्यवसानानि हि श्रवणादीन्यावर्त्यमानानि दृष्टार्थानि भवन्ति, यथाऽवघातादीनि तण्डुलनिष्पत्तिपर्यवसानानि' इति श्रवणस्य ब्रह्मदर्शनार्थस्य दृष्टार्थतया दर्शपूर्णमासिकावघातन्यायप्राप्तावृत्त्युपदेशः। अपूर्वविधित्वे तु स न सङ्गच्छते, सर्वौषधावघातवत्। अग्निचयने—'सर्वौषधस्य पूरयित्वाऽवहन्ति अथैतदुपदधाति' इत्युपधेयोलूखलसंस्कारार्थत्वेन विहितस्याऽवघातस्य दृष्टार्थत्वाभावात् नाऽऽवृत्तिरिति हि तन्त्रलक्षणे (११।१।६) स्थितम्; अतो नियमविधिरेवाऽयम्। तदभावे हि यथा वस्तु किञ्चिच्चक्षुषा वीक्षमाणस्तत्र स्वागृहीते सूक्ष्मे विशेषान्तरे केनचित् कथिते तदवगमाय तस्यैव चक्षुषः पुनरपि सप्रणिधानं व्यापारे प्रवर्तते, एवं मनसा 'अहम्' इति गृह्यमाणे जीवे वेदान्तैरध्ययनगृहीतैरुपदिष्टं निर्विशेषब्रह्मचैतन्यरूपत्व-


इसीसे जैसे तण्डुलकी उत्पत्ति ही जिनका प्रयोजन है, ऐसे अवघात आदि दृष्टार्थक होनेसे जब तक चावल न निकलें तब तक पुनः पुनः किये जाते हैं, वैसे ही साक्षात्कार जिनका प्रयोजन है, ऐसे दृष्टार्थक श्रवण आदिकी ब्रह्मसाक्षात्कारपर्यन्त आवृत्ति होती है, इस प्रकार 'आवृत्तिरसकृदुपदेशात्' इस आवृत्त्यधिकरणके भाष्यमें ब्रह्मसाक्षात्कारके लिए किये गये श्रवणके दृष्टार्थक होनेसे दर्शपूर्णमाससम्बन्धी अवघातन्यायके आधारपर श्रवणादिकी आवृत्तिका उपदेश किया गया है। श्रवणमें यदि अपूर्वविधि मानी जाय, तो सब ओषधियोंके अवघातके समान आवृत्तिका उपदेश सङ्गत न होगा, क्योंकि अग्निचयनमें 'सर्वौषधस्य०' (ऊखलमें सब ओषधियोंको भरकर कूटे अनन्तर उस ऊखलका स्थापन करे) इस प्रकार उपधेय ऊखलके संस्कारके लिए विहित अवघात, दृष्टार्थक न होनेसे, पुनः पुनः नहीं किया जाता, इस प्रकार पूर्वमीमांसाके ग्यारहवें अध्यायमें विचार किया गया है। इससे श्रवणके प्राप्त होनेसे यह नियमविधि ही है। यदि नियमविधि न मानें, तो जैसे किसी रत्न आदि वस्तुका निरीक्षण करनेवाला पुरुष, किसी दूसरेके कहनेपर अपनेसे अदृष्ट उसकी अन्य सूक्ष्म विशेषताका परिज्ञान करनेके लिए, फिर भी उसी चक्षुके सप्रणिधान व्यापारमें प्रवृत्त होता है, वैसे अन्तःकरण द्वारा अहंरूपसे गृहीत जीवमें 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस अध्ययनविधिसे प्राप्त वेदान्तोंसे उपदिष्ट निर्विशेषब्रह्मचैतन्यस्वरूपताका

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