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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 590 में से

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विधिविचार ] भाषानुवादसहित १७


भिचारस्याऽदोषत्वात् । जातिस्मरस्य जन्मान्तरश्रवणात् फलसम्भवेन व्यतिरेकव्यभिचाराभावात् । अन्यथा व्यभिचारेणैव हेतुत्ववाधे श्रुत्याऽपि तत्साधनताज्ञानासम्भवात् । घटसाक्षात्कारे चक्षुरतिरेकेण त्वगिन्द्रियमिव ब्रह्मसाक्षात्कारे श्रवणातिरेकेण उपायान्तरमस्तीति शङ्कायां व्यतिरेकव्यभिचारस्याऽप्यदोषत्वात् । तथा च प्राप्तत्वान्नाऽपूर्वविधिः ।


न होनेपर भी मिट्टीमें अन्वयव्यभिचार नहीं है ।] पूर्वजन्मके वेदान्तश्रवणसे आत्मसाक्षात्काररूप फलका संभव होनेसे पूर्व जन्मका स्मरण करनेवाले वामदेवमें व्यतिरेकव्यभिचार नहीं है । यदि इस रीतिसे अन्वय और व्यतिरेक व्यभिचारका परिहार न माना जाय, तो इन दो व्यभिचारोंसे ही वेदान्तश्रवणमें आत्मसाक्षात्कारकी साधनताका बाध होनेसे श्रुतिसे भी वेदान्तश्रवणमें साक्षात्कारकी साधनताका ज्ञान नहीं हो सकेगा * । [ब्रह्मके साक्षात्कारमें जैसे श्रवण कारण है, वैसे ही तपश्चर्या या उत्तमजन्मप्राप्ति आदि अन्य कारण भी हैं । ऐसी परिस्थितिमें 'वामदेवको उत्तमजन्मप्राप्ति आदि अन्य कारणोंसे ज्ञान उत्पन्न हुआ होगा' इस प्रकारकी शङ्का होनेसे वामदेवमें श्रवणका व्यतिरेकव्यभिचारज्ञान श्रवणकी साक्षात्कारसाधनताका प्रतिबन्धक नहीं हो सकता । एक पदार्थके ज्ञानमें परस्पर निरपेक्ष दो कारणोंके न होनेसे ब्रह्मसाक्षात्कारमें कारणान्तर नहीं है, यह बात नहीं है; क्योंकि लोकमें एक पदार्थके परिज्ञानमें परस्पर निरपेक्ष दो कारण भी देखे जाते हैं, इस भावको 'घटसाक्षात्कारे' इत्यादिसे बतलाते हैं—] जैसे घटके प्रत्यक्षमें चक्षुसे अन्य त्वगिन्द्रिय भी कारण है, वैसे ही ब्रह्मके साक्षात्कारमें श्रवणसे अतिरिक्त अन्य कारण है, इस प्रकारकी शङ्का होनेपर व्यतिरेकव्यभिचार भी दोषावह नहीं है । इससे—विधिके बिना भी श्रवणमें ब्रह्मसाक्षात्कारसाधनताके प्राप्त होनेसे श्रवणविधि अपूर्वविधि नहीं है अर्थात् नियमविधि है ।


* यह निश्चित है कि अन्वयव्यभिचार या व्यतिरेकव्यभिचारके निश्चयसे हेतुत्वका बाध होता है, अतः यदि प्रदर्शित रीतिसे अन्वयव्यभिचार और व्यतिरेकव्यभिचारका परिहार न किया जाय, तो श्रवणविधिसे भी श्रवणमें तत्त्वज्ञानकी साधनता प्राप्त न होगी, अतः श्रवणकी अपूर्वविधि अप्रमाण होगी, यह भाव है ।

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