सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
DevanagariHindipublished590 पृष्ठ
पृष्ठ 47, कुल 590 में से
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विधिविचार ] भाषानुवादसहित १९
माकर्ण्य तदवगमाय तत्र सावधानं मनस एव प्रणिधाने कदाचित् पुरुषः प्रवर्तेतेति वेदान्तश्रवणे प्रवृत्तिः पाक्षिकी स्यात् । 'अप्राप्य मनसा सह' इति श्रुतिः 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' 'दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या' इत्यपि श्रवणेनाऽनवहितमनोविषयेति शङ्कासम्भवात् ।
अथवा 'जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः'
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परोक्षज्ञान करनेके अन्तर उसी निर्विशेषस्वरूपके अपरोक्ष परिज्ञानके लिए अवधान पूर्वक मनके प्रणिधानमें ही कदाचित् पुरुष प्रवृत्त होगा, इससे श्रवणमें पाक्षिक प्रवृत्ति होगी । वेदान्तश्रवणके समान मनके व्यापारमें पुरुषकी प्रवृत्ति न होगी, क्योंकि 'अप्राप्य मनसा सह' (सत्य, ज्ञान आदि शब्द शक्तिवृत्तिसे ब्रह्मका प्रतिपादन न करके मनके साथ ही निवृत्त होते हैं- लक्षणावृत्तिका आश्रयण करते हैं) यह श्रुति ब्रह्मकी मनोविषयताका निषेध करती है अर्थात् ब्रह्मका ग्रहण मनसे नहीं हो सकता, यह स्पष्टरूपसे कहती है, अतः मनके व्यापारमें पुरुषकी प्रवृत्ति कैसे होगी ? ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' (मनसे ही ब्रह्म जानना चाहिए) 'दृश्यते०' (सावधान मनसे आत्मा देखा जाता है) इत्यादि श्रुतियोंके सद्भावसे 'मनसा सह' इत्यादि श्रुति अनवहित* मनका अवलम्बन करती है, इस प्रकार कल्पना हो सकती है† ।
अथवा‡ 'जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य०' (बड़े बड़े ऋषियों द्वारा सेवित
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\* अनवहित- एकाग्रतासे रहित ।
† 'निश्चयसम्भवात्' के स्थानमें 'शङ्कासम्भवात्' इस कथनका भाव यह है कि निर्गुण ब्रह्मके साक्षात्कारमें मन करण नहीं है, क्योंकि निर्गुण ब्रह्म औपनिषद- उपनिषत्प्रमाणमात्रसे वेद्य कहा गया है। सोपाधिक आत्माके साक्षात्कारमें भी मन कारण नहीं है, क्योंकि सोपाधिक आत्मसाक्षात्कार नित्यसाक्षिरूप है । इसलिए 'मनसैवानुद्रष्टव्यम्' इसमें 'मनसा' यह जो साधन तृतीया है, वह वाक्यजन्यवृत्तिसाक्षात्कारके प्रति साधनताके अभिप्रायसे है, यह शाब्दापरोक्षवादमें कहा जायगा । इससे- आत्मसाक्षात्कारके प्रति मनके करण न होनेसे 'मनके ही व्यापारमें कदाचित् पुरुषकी प्रवृत्ति होगी' इससे कहा गया नियमविधिका व्यावर्थ्य अयुक्त है ।
‡ इसका तात्पर्य यह है कि व्याकरण आदि छः अङ्गोंके साथ वेदाध्ययन करनेके बाद 'तरति शोकमात्मवित्' (आत्माको जाननेवाला दुःखसे मुक्त हो जाता है) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे 'आत्माका यथार्थ ज्ञान मुक्तिका साधन है' यह ज्ञात होता है, परन्तु लोकमें प्रायः देखा जाता है कि साङ्गवेदका अध्ययन करनेपर भी विचारके बिना आत्मतत्त्वज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होती, क्योंकि अनेक अभिप्रायोंसे आत्मरूप अर्थका प्रतिपादन करनेवाले वेदान्तोंमें तात्पर्यकी
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