सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 57, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंविधिविचार ] भाषानुवादसहित २९
जायते। तत्तांशगोचरज्ञानजननासमर्थस्याऽपीन्द्रियस्य तत्समर्थसंस्कारसाहित्यात् प्रत्यभिज्ञानजनकत्ववत् स्वतोऽपरोक्षज्ञानजननासमर्थस्याऽपि शब्दस्य विधुरपरिभावितकामिनीसाक्षात्कारस्थले तत्समर्थत्वेन क्लृप्तभावनाप्रचयसाहित्यादपरोक्षज्ञानजनकत्वं युक्तम्। ततश्च शब्दस्य स्वतः स्वविषये परोक्षज्ञानजनकत्वस्य भावनाप्रचयसहकृतज्ञानकरणत्वावच्छेदेन विधुरान्तःकरणवदपरोक्षज्ञानजनकत्वस्य च प्राप्तत्वात् पूर्ववन्नियमविधिरिति तदेकदेशिनः।
देवदत्तः' (वही यह देवदत्त है) इत्यादि प्रत्यभिज्ञानात्मकज्ञानके 'तद्' अंशका ग्रहण करनेमें इन्द्रियके समर्थ न होनेपर भी तत्तांशके ज्ञानमें समर्थ संस्कारके सान्निध्यसे—सहभावसे इन्द्रिय—चक्षु—प्रत्यभिज्ञानात्मकज्ञानकी कारण होती है, वैसे ही इस स्थलमें यद्यपि शब्द स्वयं अपरोक्षज्ञानके उत्पादनमें असमर्थ है, तथापि विधुरपुरुष * द्वारा परिभावित कामिनीके साक्षात्कारके समान निश्चित भावनाप्रचयके सहभावसे शब्दमें अपरोक्ष ज्ञानकी जनकता युक्त है। ऐसा सिद्ध होनेपर जनकता स्वरूपतः शब्दमें स्वविषय—वाच्यके परोक्षज्ञानकी जनकता और भावनाधिक्यके सहभावसे ज्ञानकरणमात्रमें विधुरके अन्तःकरणके समान अपरोक्षज्ञानकी जनकता प्राप्त है, अतः पूर्वोक्त विवरणमतके समान यह नियमविधि है—अपूर्वविधि नहीं है। इस प्रकार विवरणके एकदेशियोंका मत है। †
* यह आशय है कि कामिनीकी भावनासे युक्त विधुर पुरुषका अन्तःकरण कामिनीके अपरोक्ष साक्षात्कारमें हेतु रूपसे देखा जाता है, इस स्थलमें बाहरके पदार्थके ग्रहणमें यद्यपि अन्तःकरण स्वतन्त्र नहीं है अर्थात् चक्षु आदि बाह्य इन्द्रियोंकी अपेक्षा करता है, तो भी बाह्य वस्तुकी भावनासे युक्त होकर बाह्य वस्तुके साक्षात्कारमें हेतु होता है, इस प्रकार विशेष कार्य-कारणभावके ग्रहण करनेकी अपेक्षा लाघवसे और बाधकके न होनेसे भावनासहकृत यावत् ज्ञानके करण अपरोक्ष ज्ञानके साधन हैं, इस प्रकार सामान्य कार्य-कारण-भाव मानना उचित है। अतः शब्दके ज्ञान-करण होनेसे भावनाविशिष्ट शब्द भी अपरोक्ष ज्ञानका जनक हो सकता है, इसलिए स्वभावतः शब्द परोक्षज्ञानका कारण है, तो भी भावनासे युक्त होकर वही शब्द अपने विषयका अपरोक्ष साक्षात्कार करेगा, और भावनाविशिष्ट शब्दमें अपरोक्ष साक्षात्कारकी जनकता अप्राप्त नहीं है, परन्तु ऊपरके कार्य-करणभावके बलसे प्राप्त ही है, अतः 'श्रोतव्यः' यह नियमविधि ही है।
† यह एकदेशीका मत युक्त नहीं है, क्योंकि परोक्षज्ञान उत्पन्न करना ही शब्दका