भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

विधिविचार ] भाषानुवादसहित ३१

गान्धर्वशास्त्रवत् चित्तसहकारितयेष्यते ॥
आत्माऽपरोक्षे श्रवणं, तत्रैव नियमम्परे ॥ ९ ॥

जैसे षड्ज आदिका अपरोक्षज्ञान अन्तःकरणकी सहकारिता द्वारा गान्धर्वशास्त्रसे उत्पन्न होता है, वैसे ही अन्तःकरणकी सहकारितासे श्रवण आत्माका अपरोक्षज्ञान उत्पन्न कर सकता है, अतः अपरोक्षज्ञानके लिए ही श्रवणको नियमविधि मानते हैं, इस प्रकार भी कुछ लोगोंका मत है ॥ ९ ॥

अपरोक्षज्ञानार्थत्वेनैव श्रवणे नियमविधिः; 'द्रष्टव्यः' इति फलकीर्तनात् । तादर्थ्यं च तस्य करणभूतमनःसहकारितयैव, न साक्षात् । शब्दादपरोक्षज्ञानानङ्गीकरणात् ।
न च तस्य तेन रूपेण तादर्थ्यं न प्राप्तमित्यपूर्वविधित्वप्रसङ्गः । श्रावणेपु षड्जादिषु समारोपितपरस्पराविवेकनिवृत्त्यर्थं गान्धर्वशास्त्रश्रवण-

अपरोक्ष ब्रह्मसाक्षात्कारके लिए ही श्रवणमें नियमविधि है, क्योंकि 'द्रष्टव्यः' इस प्रकार श्रवणके फलका कथन है [भाव यह है 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि वाक्यसे विहित श्रवण आदिका 'द्रष्टव्य' शब्दसे दर्शन ही फल कहा गया है और दर्शनशब्दका प्रयोग साक्षात्कार ज्ञानमें ही होता है ।] और श्रवणमें अपरोक्षज्ञानार्थता करणभूत मनकी सहकारितासे ही हो सकती है साक्षात् नहीं हो सकती, क्योंकि शब्दसे अपरोक्ष—साक्षात्कार नहीं होता और उसका अङ्गीकार भी नहीं किया गया है ।

परन्तु यह तुम्हारा कथन तभी युक्त हो सकता है, जब वेदान्तश्रवणमें साक्षात्कारके करणभूत मनकी सहकारिता रूपसे अपरोक्षानुभवार्थता कहीं प्राप्त देखी गई हो, परन्तु वह किसी प्रमाणसे प्राप्त ही नहीं है, इसलिए यह नियमविधि नहीं है, प्रत्युत अपूर्वविधि ही है, यदि इस प्रकार कोई शङ्का करे तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि श्रोत्रेन्द्रियजन्य प्रत्यक्षकेविषयीभूत अर्थात् कानसे प्रत्यक्ष किये जानेवाले षड्ज* आदि ध्वनिविशेषोंमें


* षड्ज आदि स्वरोंका पूर्वमें निरूपण किया जा चुका है, जिसने सङ्गीतशास्त्रका अभ्यास न किया हो, ऐसे पुरुषको स्वरोंका विशदरूपसे भान नहीं होता, परन्तु सभी स्वर एकसे प्रतीत होते हैं—उन स्वरोंका परस्पर भेद प्रतीत नहीं होता है और गन्धर्व-शास्त्रका अभ्यास करनेपर उन स्वरोंका ठीक ठीक भेद प्रतीत होता है, इसी प्रकार मनसे, जो भीतर की इन्द्रिय है, अनुभव किये जानेवाले शरीर, प्राण और चिदात्मा आदिमें परस्पर

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