सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 35, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंविधिविचार ] भाषानुवादसहित ७
तत्राऽश्वरशनाग्रहणे 'इमामगृभ्णन्' इति मन्त्रो लिङ्गादेव रशनाग्रहणप्रकाशनसामर्थ्यरूपान्नित्यं प्राप्नोतीति न तत्प्राप्त्यर्थः, तदप्राप्तांशपरिपूरणार्थो वा विधिः, किन्तु लिङ्गाविशेषात् गर्दभरशनाग्रहणेऽपि मन्त्रः प्राप्नुयादिति तन्निवृत्त्यर्थः। तथा गृहमेधीयस्य दर्शपूर्णमासप्रकृतिकत्वादतिदेशादेवाऽऽज्यभागौ नित्यं प्राप्नुत इति न तत्र विधिः तत्प्राप्त्यर्थः,
और गर्दभरशनाग्रहणका अनुष्ठान होता है। ऐसी स्थितिमें रशनाके ग्रहणरूप अर्थके प्रकाशनसामर्थ्यरूप लिङ्गप्रमाणसे ही 'इमामगृभ्णन्' इत्यादि मन्त्रकी अश्वरशनाग्रहणमें नित्य प्राप्ति है। इससे 'अश्वाभिधानीमादत्ते' यह विधि अश्वरशनाग्रहणमें उक्त मन्त्रकी अपूर्वप्राप्ति करानेके लिए अपूर्वविधि नहीं है। अथवा उसके अप्राप्तांशके परिपूरणरूप प्रयोजनके लिए नियमविधि भी नहीं है, किन्तु अर्थप्रकाशनरूप लिङ्गके सामान्य होनेसे गर्दभकी रशना (रस्सी) के ग्रहणमें भी 'इमाम०' इत्यादि मन्त्र प्राप्त होगा, इसलिए रासभकी रशनाके ग्रहणमें उस मन्त्रकी प्राप्तिकी निवृत्ति करनेके लिए 'अश्वाभिधानी०' इत्यादि परिसंख्याविधि है। [ परिसंख्याविधिके प्रथम लक्षणका समन्वय इस प्रकार करना चाहिए—दो शेषी हैं—अश्वरशनाग्रहण और रासभरशनाग्रहण, उन दोनों शेषियोंमें लिङ्गप्रमाणसे 'इमामगृभ्णन्' इत्यादि शेषरूप मन्त्र नित्य प्राप्त है और शेषीकी—गर्दभरशनाके ग्रहणकी निवृत्ति भी होती है—'इमामगृभ्णन्' इत्यादि मन्त्रसे अश्वरशनाग्रहण ही करना चाहिए, गर्दभरशनाका ग्रहण नहीं करना चाहिए ] उसी प्रकार दर्श और पूर्णमास* गृहमेधीय इष्टिकी प्रकृति हैं, इसलिए प्रकृतिवत् विकृतिः कर्तव्या (प्रकृति यागमें जो उपयुक्त है, वही विकृति यागमें भी लेना चाहिए) इस प्रकारके अतिदेश वाक्यसे प्रकृति यागमें प्राप्त आज्यभाग गृहमेधीय विकृति यागमें प्राप्त होंगे ही, इसलिए
* दर्श-पूर्णमास शब्दसे छः याग लिए जाते हैं—आग्नेय याग, उपांशु याग, अग्नीषोमीय याग, आग्नेय याग और दो सांनाय्य याग। प्रथम तीन याग पूर्णिमाके दिन होते हैं और अन्तिम तीन याग अमावास्याके दिन होते हैं। आग्नेय याग पूर्णिमा और अमावास्या दोनों दिन होता है, इसलिए 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत' इत्यादिमें दर्शपूर्णमासशब्दसे उक्त छः यागोंका ग्रहण है। द्विवचनकी उपपत्ति दो त्रिकमें रहनेवाले त्रित्व-त्रित्वरूप दो धर्मोंके अभिप्रायसे विवक्षित है। दर्श और पूर्णमास सभी दृष्टियोंकी प्रकृति हैं, क्योंकि 'दर्शपूर्णमासाविष्टौनां प्रकृतिः' [ आप० श्रौ० २४।३।३२ ] इत्यादि सूत्र इस अर्थमें प्रमाणभूत है।