सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
तन्नियमार्थो वा, किन्त्वतिदेशात् प्रयाजादिकमपि प्राप्नुयादिति तन्नि- वृत्त्यर्थः । गृहमेधीयाधिकरण-( १०-७-९ )-पूर्वपक्षरीत्येदमुदाहरणं यत्र क्वचिदुदाहर्तव्यमित्युदाहृतम् ।
न च नियमविधावपि पक्षप्राप्तावहननस्याऽप्राप्तांशपरिपूरणे कृते तदवरुद्धत्वात् पाक्षिकसाधनान्तरस्य नखविदलनादेर्निवृत्तिरपि लभ्यते इतीतरनिवृत्तिफलकत्वाविशेषान्नियमपरिसङ्ख्ययोः फलतो विवेको न युक्त
'आज्यभागौ यजति' यह विधि अपूर्व आज्यभागकी प्राप्ति करानेके लिए नहीं है, अथवा अप्राप्त अंशके पूरणरूप नियमके लिए भी नहीं है, किन्तु अतिदेशवाक्यके साधारण होनेसे आज्यभागके समान प्रयाज आदिकी भी प्राप्ति होगी, इसलिए प्रयाज आदिकी निवृत्ति 'आज्यभागौ' इत्यादि विधिका प्रयोजन है । [यहांपर परिसंख्याविधिके द्वितीय लक्षणकी सङ्गति इस प्रकार है—एक शेषी है—गृहमेधीय इष्टि, उसमें आज्यभाग और प्रयाज आदिरूप दो शेषोंकी अति- देशवाक्यसे प्राप्ति होनेपर उनमेंसे एक प्रयाज आदिरूप शेषकी निवृत्ति होती है, अतः द्वितीय लक्षण घट गया । यद्यपि अन्यतरत्वरूपसे परिसंख्याका एक ही लक्षण है, तो भी सुगमतासे लक्षणसमन्वय बतलानेके लिए विभाग करके दो लक्षण कहे गये हैं, यह जानना चाहिए । परन्तु पूर्वमीमांसामें सिद्धान्तरूपसे 'आज्यभागौ यजति' यह परिसंख्याविधि नहीं मानी गई है, अतः यहां इसका उदाहरण देना उचित नहीं है ? यदि इस प्रकारकी शङ्का किसीको हो, तो उसका निराकरण करनेके लिए 'गृहमेधीयाधिकरण' इत्यादिसे कहते हैं ] यद्यपि गृहमेधीयाधिकरणमें यह पूर्वपक्षरूपसे उदाहरण है, तथापि [ परिसंख्याविधिके स्वरूपके प्रदर्शनमें ] कहीं भी उदाहरण दे सकते हैं, इसलिए यहां इसका उदाहरणरूपसे कथन किया गया है ।
यदि कोई शङ्का करे कि नियमविधिमें भी एक पक्षमें प्राप्त जो अवघात है, उसके अप्राप्तांशकी परिपूर्ति करनेपर तदवरुद्ध होनेसे— अवघातसे ही तण्डुलकी उत्पत्तिसे होनेवाले आक्षेपकी शान्ति होनेसे— पाक्षिक नखविदलन आदि अन्य ( व्रीहिके छिलके दूर करके अन्य ) साधनोंकी निवृत्ति भी होती है, इससे—नियमविधिमें इतरकी निवृत्तिरूप