भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 29, कुल 590 में से

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पृष्ठ 29

श्रीगणेशाय नमः।

सिद्धान्तलेशसङ्ग्रह

[ भाषानुवादसहित ]


प्रथम परिच्छेद

अधिगतभिदा पूर्वाचार्यानुपेत्य सहस्रधा
सरिदिव महीभेदान् सम्प्राप्य शौरिपदोद्गता ।
जयति भगवत्पादश्रीमन्मुखाम्बुजनिर्गता
जननहरणी सूक्तिर्ब्रह्माद्वयैकपरायणा ॥ १ ॥


जैसे भगवान् श्रीहरिके चरण-कमलसे निकली हुई गङ्गाजीने अनेक प्रदेशोंको प्राप्त होकर हजारों भेद धारण किये, वैसे ही व्याख्यान करनेवाले अनेक पूर्वाचार्योंको व्याख्येयरूपसे प्राप्त होकर हजारों भेदोंको प्राप्त हुई, शुद्ध अद्वितीय ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली अत एव जन्मका नाश करनेवाली भगवान् शङ्कराचार्यके सुन्दर मुख-कमलसे निकली हुई (भाष्यरूपा) सुललित वाणी सर्वोत्कृष्ट है अर्थात् मैं उसे प्रणाम करता हूँ * ॥ १ ॥


* ग्रन्थाध्ययनमें मनुष्योंकी प्रवृत्ति होनेके लिए ग्रन्थके आरम्भमें विषय, प्रयोजन, अधिकारी और सम्बन्ध ये चार अनुबन्ध बतलाये जाते हैं। प्रकृत श्लोकमें 'ब्रह्माद्वयैकपरायणा' विशेषणसे प्रपञ्चशून्य सच्चिदानन्द ब्रह्म सूक्तिपदसे सूचित भाष्यका विषय तथा 'जननहरणी' पदसे मुक्तिरूप प्रयोजन बतलाया गया है। मुक्तिको चाहनेवाला इसका अधिकारी है और मुक्ति प्राप्य और अधिकारी प्राप्त करने वाला है इस प्रकार प्राप्यप्रापकभाव सम्बन्ध है, यह अर्थतः सूचित होता है। अतः निरवधिक सुख चाहनेवालेको इस ग्रन्थके अध्ययनमें अवश्य प्रवृत्त होना चाहिए, क्योंकि 'यह मेरा इष्ट साधन है' ऐसा ज्ञान प्रवर्तक होता है। निरवधिक सुखसे बढ़कर अन्य कोई इष्ट नहीं हो सकता। इस प्रकार भाष्यरूप शास्त्रके विषय, प्रयोजन आदि अनुबन्धोंका प्रतिपादन करते हुए ग्रन्थकारने भाष्यके प्रकरण—एकदेशरूप होनेसे अपने ग्रन्थके भी वे ही विषय, प्रयोजन आदि हैं, यह सूचित किया है।

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